बनभूलपुरा के पीड़ितों की मदद हेतु अभियान

हल्द्वानी बनभूलपुरा में 8 फरवरी 2024 को प्रशासन द्वारा मदरसा व मस्जिद को हाईकोर्ट में सुनवाई होने के बावजूद भी बुलडोजर से तोड़ने के कारण उपजे विवाद के बाद हुए उपद्रव में पुलिस की गोली लगने से व अन्य वजहों से 7 लोगों की मौत व दर्जनों घायल हो गए थे। उसके बाद बनभूलपुरा समेत पूरे हल्द्वानी शहर में कर्फ्यू लगाया गया था। बनभूलपुरा इलाके में तलाशी अभियान के दौरान करीब 300 मुस्लिम समुदाय के लोगों के घरों के दरवाजे तोड़ कर पुलिस ने घरों में घुसकर घर का सारा सामान तोड़ फोड़ दिया था। यहां तक कि ताले लगे घरों में भी तोड़ फोड़ की गई थी। जो भी लोग घर पर मिले चाहे वो बच्चा हो या बूढ़ा, महिला हो या पुरुष सभी को अपराधी मानकर उनके साथ मारपीट की गई, पुलिस द्वारा कई लोगों के हाथ-पैर तोड़कर उन्हें सबक सिखाने की पूरी कोशिश की गई। 5000 अज्ञात लोगों पर मुकदमा दर्ज कराया गया। पुलिस ने अब तक 5 महिलाओं सहित 100 से ज्यादा लोगों को बिना किसी जांच के जेल भेज दिया है जिसमें ज्यादातर लोग मजदूर-मेहनतकश जनता के लोग हैं। ऐसे में तमाम न्यायप्रिय इंसाफपसन्द लोगों व संगठनों ने मिलकर कौमी एकता मंच का गठन कर पीड़ितों को न्याय दिलाने की मांग की है।         
क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र, परिवर्तनकामी छात्र संगठन, इंकलाबी मजदूर केन्द्र व नागरिक अखबार द्वारा प्रारम्भिक राहत प्रदान करने का काम किया गया जिसके तहत पीड़ित लोगों के लिए राशन, घायलों के इलाज में क्षमताभर मदद की गई। परन्तु अभी मुकदमे व गिरफ्तारी के शिकार लोगों की कानूनी मदद का काम बाकी है। इसलिए बनभूलपुरा के पीड़ित लोगों की मदद हेतु उत्तराखण्ड के विभिन्न शहरों में मदद एकत्र की गयी व भाजपा सरकार के मजदूर-मेहनतकश-अल्पसंख्यक विरोधी रुख का भण्डाफोड़ किया गया।
    
14-15 अप्रैल को क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, इंकलाबी मजदूर केन्द्र, प्रगतिशील भोजनमाता संगठन व प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र ने कौमी एकता, दोस्ती, शांति, साझी विरासत के लिए हरिद्वार की सोनिया बस्ती, लक्सर बादशाहपुर में अभियान चलाया और हल्द्वानी बनभूलपुरा के पीड़ित लोगों के लिए चंदा भी किया।
    
6 अप्रैल 2024 को इंकलाबी मजदूर केंद्र एवं ठेका मजदूर कल्याण समिति पंतनगर के कार्यकर्ताओं द्वारा संजय कालोनी मजदूर बस्ती में, ‘‘बनभूलपुरा की पीड़ित जनता को न्याय दिलाने को आगे आओ’’ शीर्षक से पर्चा वितरण कर प्रचार अभियान चलाया गया। पीड़ित जनता की मदद के लिए आर्थिक सहयोग इकट्ठा किया गया।
    
इस अभियान की कड़ी में इंकलाबी मजदूर केंद्र फरीदाबाद की टीम द्वारा 18 मार्च 2024 को एस्कार्ट मुजेसर रेल पटरी के पास वाली मजदूरों-मेहनतकशों की बस्ती आजाद नगर में और 19 मार्च 2024 को फरीदाबाद के सेक्टर-32 में मजदूरों-मेहनतकशों की बस्ती राजीव नगर में कौमी एकता जन जागरूकता और चंदा अभियान चलाया। जिसमें मजदूरों-मेहनतकशों ने बढ़ चढ़कर भूमिका अदा की और सहयोग भी दिया।
    
27 अप्रैल को खेड़ा बस्ती, रुद्रपुर में दुकानदारों के बीच बनभूलपुरा के पीड़ितों की मदद के लिए इंकलाबी मजदूर केन्द्र व क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन के कार्यकर्ताओं ने अभियान चलाया।
    
बनभूलपुरा के पीड़ित लोगों के साथ एकजुटता कायम करते हुए इन सभी संगठनों के प्रतिनिधियों ने पीड़ितों की क्षमता भर मदद का संकल्प व्यक्त किया। -विशेष संवाददाता

आलेख

/uddharak-ideology-ki-talaas

इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

/war-and-diplomacy-uthal-puthal-se-bhari-duniyaa

गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।