जातिवाद पर चोट

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आज के समाज में जातिवाद की जड़ें गहरी मिट्टी में गड़ी हैं। इनकी जड़ों को समूल नष्ट करने के लिए कई समाज सुधारकों-क्रांतिकारियों-समाज सेवकों ने अपने सारे जीवन को लगा दिया पर जातिवाद की कुछ टहनियां मात्र सूखी हैं पर जड़ें आज भी मजबूत हैं और इनकी जड़ों को सींचने वाले सरकारों से लेकर कई संगठन स्थापित कर दिए गये हैं। ऊपरी तौर पर जातिवाद को समूल नष्ट करने का आह्वान किया जाता रहा है, दिखावापन होता रहा है पर आंतरिक तौर पर उसे मजबूत और सशक्त किया जाता रहा है। जातिवादी मानसिकता पुनः पनपने का एक कारण संघ-भाजपा के शासन में पुरानी संस्कृति को स्थापित करना और उसको लागू करना है। 
    
चाहे वह राजस्थान में दलित बच्चे द्वारा स्कूल में पानी के घड़े को छूने पर पिटाई का मामला हो या बागेश्वर के कराडिया गांव की घटना जहां आटे की चक्की को छूने पर दलित की हत्या कर दी जाती है। बागेश्वर में हत्यारा पेशे से शिक्षक था जिसका कर्तव्य समाज सुधारना होना चाहिए था वह ही घोर जातिवादी अत्याचार कर रहा था। 
    
ताजा घटना हल्द्वानी के दमुवाढूंगा क्षेत्र की है जहां पर एक दलित परिवार अपने बच्चों के साथ राशन कार्ड की केवाईसी करवाने के लिए सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान पर जाता है। दुकान बंद होने के समय दुकान में न बैठकर दुकानदार महिला अपने पास ही घर पर उनको ले जाती है। जैसे ही घर पर बैठकर उनकी केवाईसी की कार्यवाही शुरू करती है वैसे ही उसके पति घर के अंदर प्रवेश करते हैं तो दलित परिवार को सोफे पर बैठा देखकर आग बबूला हो जाते हैं और उस दलित परिवार पर जाति सूचक शब्दों की झड़ी लगा देते हैं और उनको अपमानित करके घर से बाहर धकेल देते हैं और उसके बाद अपनी पत्नी को भी भला-बुरा कहकर उनको सोफे पर बैठाने को लेकर गाली-गलौज करते हैं। 
    
इसके बाद पीड़ित परिवार इस मामले को लेकर निकट की पुलिस चौकी जाता है। वहां पर काफी देर बहस होने के बाद आखिरी निर्णय पर पहुंचते हैं जहां पर सवर्ण व्यक्ति स्वयं माफी न मांग कर बाकी रिश्तेदारों के दबाव में आकर लिखित में माफीनामा देता है तब जाकर यह मामला शांत होता है पर पीड़ित पक्ष यह मान लेता है कि यह छोटी सी गलती थी और माफ कर देता है। यह हुआ अशांत मन को शांत करना पर इससे जातिवाद की जड़ सूख नहीं जाती हैं। ऐसे लोग जातिवाद का बीज अपनी आने वाली पीढ़ी दर पीढ़ी संस्कृति के तौर पर आगे बढ़ाते रहते हैं। ऐसी मानसिकता को समाज से खत्म कर डालने की आवश्यकता है ताकि इसका कोई नामलेवा भी ना हो और ऐसा पूंजीवाद में संभव नहीं है। फिर हम ऐसे समाज समाजवाद की ओर अग्रसर क्यों ना हों जहां पर मानव जाति इस अपमान भरी जिंदगी से अपने आप को मुक्त कर पाए। आज देश समाज को वर्ग विहीन समाज की आवश्यकता है और हमें इस संकल्प को पूरा करने की ओर बढ़ना चाहिए।         -शेखर चंद्र, हल्द्वानी

आलेख

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शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

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पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

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मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।