संचार साथी नहीं सरकारी जासूसी

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पिछले दिनों मोदी सरकार ने गुपचुप तरीके से सभी मोबाइल फोन निर्माताओं को निर्देश दिया कि वे सभी फोनों में ‘संचार साथी एप’ अनिवार्य रूप से इंस्टाल करें। यहां तक कि यह एप लोग फोन से हटा भी न सकें। बाद में फिलहाल फोन निर्माताओं के विरोध के बाद सरकार ने निर्देश वापस ले लिया है। पर सरकार जल्द ही दूसरे रास्तों से इसे लागू कराने का प्रयास करेगी। 
    
संचार साथी नामक सरकारी एप शुरू में चोरी हुए या गुम हुए फोन को ढूंढने के लिए बनाया गया था। इसे इंस्टाल करना स्वैच्छिक था। बाद में और संशोधन कर सरकार ने इसे पेगासस सरीखे पूर्ण निगरानी एप में बदल दिया। अब यह मोबाइल फोन के समस्त डाटा (काल, मैसेज, स्टोरेज, लोकेशन) तक पहुंच बनाने वाला बन गया। 
    
यानी यदि इस एप को कोई अपने फोन में इंस्टाल करता है तो वह सरकार को आपसे संबंधित सभी सूचनायें भेज सकता है। दस केन्द्रीय एजेंसियां मनमाने तरीके से फोन टेप कर सकती हैं। अधिकारीगण फोन के कैमरे व माइक्रोफोन को भी टेप कर सकते हैं। इस तरह व्यक्ति की समस्त निजता सरकार के सामने उजागर हो जायेगी। 
    
सरकार इस एप को लोगों को उनकी पहचान पर निकाले गये सिम, हैंडसेट पर मौजूद आई एम ई आई नंबर के सही होने या गलत होने सरीखे फ्राड से बचाने के लिए प्रचारित करती रही है। साथ ही फोन खोने पर उसे ढूंढने में इसकी मदद होने की बात करती रही है। पर अब उसका इरादा एक कदम आगे बढ़कर सबके फोनों में इसे जबरन डाल कर जासूसी करने का है। 
    
फिलहाल एप्पल-सैमसंग ने सरकार के निर्देश का विरोध इस आधार पर किया है कि इस एप से उनकी मोबाइल डिवाइस का प्रदर्शन खराब हो जायेगा व सरकार के हस्तक्षेप की छूट के चलते उसमें सुरक्षा खामी पैदा हो जायेंगी। साथ ही लगातार डेटा भेजने से बैटरी खपत बढ़ जायेगी। यानी कम्पनियों की चिंता लोगों की निजता का उल्लंघन नहीं अपनी डिवाइस की क्षमता प्रभावित होने की रही है। 
    
मोदी सरकार गुपचुप तरीके से सबके फोनों की निगरानी, लोगों का ही डेटा खर्च कर, करने में पूरी तरह मुस्तैद है। इस तरह सरकार मोबाइल के भीतर छेड़खानी करने में भी सफल होगी। साथ ही उसकी इस कवायद से मोबाइल हैक करना आसान हो जायेगा। साइबर अपराधी भी अधिक सफलता हासिल कर सकेंगे। 
    
इस कदम की जानकारी न तो संसद को देने की सरकार ने कोई जरूरत समझी और न ही जनता को सूचित करने की ही उसे कोई आवश्यकता लगी। गुपचुप तरीके से मोबाइल कम्पनियों को निर्देश दे दिया गया। 
    
जनता पर हर तरह से हमलावर मोदी सरकार का यह भय ही है जो उसे सबकी निजता खत्म कर चौतरफा निगरानी की ओर ले जा रहा है। सरकार नेपाल-श्रीलंका के युवा विद्रोहों में सोशल मीडिया के उपयोग से भयभीत है। भारत में निगरानी तंत्र मजबूत कर वह ऐसे विद्रोहों को रोकने का ख्वाब पालती है। वह भूल जाती है कि निगरानी तंत्र कड़ा कर वो जनता का गुस्सा कुछ देर कुचल सकती है पर यह कुचलने की कार्यवाही और अधिक गुस्से को पैदा करेगी, जिसे रोकना उसके बस में नहीं है। मोदी सरकार का हश्र भी पड़ोसी देशों के शासकों सरीखा ही होगा। 

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