युद्ध और जनता : मरती जनता, बढ़ता मुनाफा

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बीसवीं सदी ने दो विनाशकारी विश्व युद्धों को देखा था। अब हम इक्कीसवीं सदी में रह रहे हैं। 21वीं सदी का भी एक चौथाई अब खत्म होने को है। अक्सर ही बातें होती हैं कि तीसरा विश्व युद्ध क्या होने को है? खासकर चीन के साम्राज्यवादी उभार, वैश्विक व्यापार युद्धों और दुनिया भर में चल रहे क्षेत्रीय युद्धों की परिस्थितियों में यह सवाल वाजिब भी बन जाता है। फिलहाल, इस सवाल को छोड़ भी दिया जाये, तब भी सच्चाई यह है कि पिछले अस्सी सालों में भले ही विश्व युद्ध न हुआ हो, किन्तु युद्धों का सिलसिला कभी नहीं थमा। न ही युद्धों में मारी जाती निर्दोष आम जनता की संख्या में कोई कमी आई है। सबसे बढ़कर सैन्य उत्पादन से जुड़ी एकाधिकारी कम्पनियों का मुनाफा भी दिन-दूना रात-चौगुना गति से बढ़ रहा है। 
    
पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट ओस्लो के अनुसार 2024 का वर्ष शीतयुद्ध की समाप्ति (1989) के बाद से चौथा सबसे युद्धरत वर्ष रहा है। 2023 व 2024 के दो वर्षों में प्रति वर्ष औसतन 1 लाख, 30 हजार लोग अलग-अलग युद्धों में मारे गये थे। सबसे खास आंकड़ा स्टॉकहॉम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) की दिसम्बर, 2025 में आई एक रिपोर्ट के माध्यम से मिलता है। सिपरी की रिपोर्ट के अनुसार 2024 में सैन्य उत्पादन के क्षेत्र की शीर्ष 100 कम्पनियों की आय (रेवेन्यु) 5.9 प्रतिशत बढ़कर 679 अरब अमेरिकी डालर पर पहुंच गयी है। तुलना के लिए बता दें 2024 में भारत का सकल घरेलू उत्पाद (विश्व बैंक के अनुसार) लगभग 3910 अरब अमेरिकी डालर रहा था। 
    
सैन्य उत्पादों की बिक्री से मुनाफा कमाने वाली इन शीर्ष सौ कम्पनियों में से अधिकांश अमेरिका और यूरोप की हैं। इन सौ कम्पनियों में 39 कम्पनियां अमेरिका की हैं, जिनमें से 30 कम्पनियों ने मुनाफे में वृद्धि दर्ज की है। कुल मिलाकर अमेरिकी सैन्य उत्पादक कम्पनियों का मुनाफा 3.8 प्रतिशत बढ़कर 334 अरब अमेरिकी डालर पहुंच गया है। सूची में शामिल 26 यूरोपीय कम्पनियों में से 23 ने मुनाफे में वृद्धि दर्ज की है। समग्रता में इन सभी यूरोपीय कम्पनियों का मुनाफा 13 प्रतिशत बढ़़कर 151 अरब अमेरिकी डालर पहुंच गया है। 
    
रूस-यूक्रेन युद्ध में यूक्रेन को छोटे हथियार मुहैया करने में लगी चेक रिपब्लिक की कम्पनी ‘चेकोस्लोवाक ग्रुप’ का मुनाफा तो 193 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 3.6 अरब अमेरिकी डालर रहा। इस युद्ध में (2024 तक) मारे गये 77 हजार लोग और हथियार बेच रहे एकाधिकारी समूहों का मुनाफा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। स्वयं यूक्रेन की कम्पनी जे.एस.सी. यूक्रेनियन डिफेंस इण्डस्ट्री का मुनाफा 41 प्रतिशत बढ़कर 3 अरब अमेरिकी डालर रहा। साथ ही, इस युद्ध में शामिल रूस की दो प्रमुख कम्पनियों रोस्टेक व यूनाइटेड शिपबिल्डिंग कारपोरेशन का संयुक्त मुनाफा 23 प्रतिशत बढ़कर 31.2 अरब डालर तक पहुंच गया। 
    
उपरोक्त रिपोर्ट के अनुसार केवल एशिया-ओसिनिया क्षेत्र का व्यवहार ही कुछ अपवाद रहा है। सूची में शामिल इस क्षेत्र की कम्पनियों का मुनाफा 1.2 प्रतिशत घटकर 130 अरब अमेरिकी डालर रहा। लेकिन इस आंकड़ें में काफी क्षेत्रीय विविधता है। गिरावट मुख्यतः चीनी कम्पनियों के मुनाफे में कमी की वजह से है। सूची में शामिल 8 चीनी कम्पनियों का मुनाफा 10 प्रतिशत घटा है। लेकिन यहां यह गौर करने की बात है कि चीन तकनीक पर बहुत निवेश कर रहा है। हालांकि इस तकनीकी विकास का एक पक्ष सैन्य क्षमता को बढ़ाना भी है। यह बात वैसे अन्य अग्रणी देशों के लिए भी सच है।
    
चीन के अलावा अन्य एशियाई कम्पनियों के मुनाफे में बढ़ोत्तरी ही देखने को मिली है। जापान की 5 कम्पनियों का मुनाफा 40 प्रतिशत बढ़कर 13.3 अरब डालर और 4 दक्षिण कोरियाई कम्पनियों का मुनाफा 31 प्रतिशत बढ़कर 14.1 अरब डालर रहा। गौरतलब है कि जापान वही देश है, जिसने परमाणु बमों की विभीषिका झेली थी और जो कभी स्वयं को वैश्विक शांति का अग्रदूत प्रदर्शित करता था। 
    
पहली बार इस सूची में 9 कम्पनियां मध्य पूर्व की भी शामिल हुई हैं, जिनका कुल मुनाफा 31 अरब डालर रहा, जो कि 14 प्रतिशत की वृद्धि प्रदर्शित करता है। इजरायल की सूची में शामिल 3 कम्पनियों का मुनाफा 16 प्रतिशत बढ़कर 16.2 अरब डालर रहा। इजरायल की कंपनियों के इस मुनाफे की झंकार में फिलिस्तीनी बच्चों की चीत्कार साफ सुनी जा सकती है। 
    
उपरोक्त सूची में भारत की भी 3 कम्पनियां शामिल हैं, जिनका मुनाफा 8.2 प्रतिशत बढ़कर 7.5 अरब डालर रहा। वर्तमान में यह तीनों कम्पनियां सरकारी नियंत्रण वाली हैं। लेकिन इस क्षेत्र में भारी मुनाफे का लालच निजी भारतीय पूंजीपतियों को भी इस क्षेत्र में खींच लाया है। भाजपा सरकार द्वारा सैन्य उत्पादन क्षेत्र को निजी पूंजी के लिए खोलना निजी पूंजीपतियों के इसी लालच को तुष्ट करने के लिए था। टाटा एडवांस्ड सिस्टम, भारत फोर्ज, अडाणी डिफेंस एण्ड ऐरोस्पेस ऐसी ही कुछ कम्पनियां हैं, जो इस क्षेत्र में प्रवेश कर चुकी है। 
    
पूंजीवाद में युद्ध और कारोबार को अलग कर पाना बहुत मुश्किल है। बहुधा समझ ही नहीं आ पाता है कि व्यापार के लिए युद्ध चल रहा है या फिर युद्ध के लिए व्यापार। ग्लोबल पीस इंडेक्स के अनुसार 2024 में 56 युद्धग्रस्त क्षेत्र दुनिया भर में रहे हैं, जिनमें लगभग 92 देश शामिल रहे। कुछ संस्थाएं 2025 में 61 युद्धग्रस्त क्षेत्रों और 110 देशों के शामिल होने की बात कर रही हैं। कुल मिलाकर आधी दुनिया बाहरी या घरेलू युद्धों में फिलहाल ही शामिल है। 
    
दुनिया भर में हजारों लोग हर वर्ष युद्धों में मारे जा रहे हैं। दुनिया भर के प्रमुख देश अपना वार्षिक रक्षा बजट बढ़ाते जा रहे हैं; भारत इस मामले में विश्व में पांचवें स्थान पर पहुंच चुका है। स्पष्ट है कि पूंजीवादी व्यवस्था दुनिया को यौद्धिक विनाश की ओर ले जा रही है। किन्तु यह विनाश आम जनता के लिए है, पूंजीपतियों के लिए यह मुनाफे का सौदा है। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्धों में अमेरिकी सैन्य और गैर-सैन्य उत्पादक कम्पनियों ने भारी मुनाफा कमाया था। आज भी यही हो रहा है। 
    
युद्ध और मुनाफे की यह जुगलबंदी पूंजीवाद के रहते हमेशा जारी रहेगी। पूंजीवाद के खात्मे का युद्ध ही इस जुगलबंदी को समाप्त कर सकता है।   

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