श्रम न्यायालय के फैसलों के विरोध में प्रदर्शन

/labour-court-ke-decesion-ke-against-mein-protest

गुड़गांव/ दिनांक 4 दिसम्बर 2025 को बेलसोनिका यूनियन व इंकलाबी मजदूर केन्द्र ने गुरूग्राम श्रम न्यायालय द्वारा दिये गये फैसलों के विरोध में लघु सचिवालय गुरूग्राम पर विरोध प्रदर्शन कर, उपायुक्त गुरूग्राम के मार्फत देश के राष्ट्रपति को दोनों फैसलों को रद्द करने के लिये ज्ञापन दिया। 
    
मारूति मजदूरों ने वर्ष 2011-2012 में संवैधानिक अधिकार के तहत यूनियन बनाने का संघर्ष किया था। मारूति प्रबंधन ने एक षड्यंत्र के तहत 18 जुलाई 2012 को एक घटना को अंजाम दिया था जिसके तहत लगभग 148 मजदूरों को जेल में ठूंस दिया गया था व 546 स्थाई मजदूरों को बिना कोई जांच कार्यवाही के सीधे नौकरी से बर्खास्त कर दिया था तथा लगभग 2000 ठेका श्रमिकों को सीधे नौकरी से निकाल दिया था। उस समय मारूति के चेयरमैन ने इसे ‘‘वर्ग युद्ध’’ का नाम दिया था। उस घटना के बाद जेल में बंद किये गए मजदूरों की अंतरिम जमानत के लिये माननीय हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी तो हाईकोर्ट ने यह कहकर जमानत याचिका को खारिज कर दिया था कि इससे विदेशी पूंजी निवेश प्रभावित होगा। लगभग 9 साल बाद बर्खास्त किये गये 546 श्रमिकों के केस में श्रम न्यायालय गुरूग्राम ने एक मजदूर के केस में दिनांक 1 दिसम्बर 2025 को अपना फैसला सुनाते हुये, मारूति प्रबंधन द्वारा बर्खास्तगी पर अपनी मुहर लगाते हुये यह टिपपणी की कि ‘‘राष्ट्र निर्माण’’ के लिये निकाले गये इन मजदूरों की बर्खास्तगी जायज है। श्रम न्यायालय ने अपने फैसले में ट्रंपियन दुनिया व गलाकाटू प्रतियोगिता का हवाला भी दिया और कहा कि इतिहास गवाह है कि केवल वही अर्थव्यवस्थाएं उन्नति कर पायी हैं जो अपने श्रमिकों को अनुशासन में रख सकीं, इसलिये लाभकारी कानूनों की आड़ में श्रम न्यायालय अनुशासनहीनता को बढ़ावा नहीं देगा।
    
वहीं दूसरी तरफ बेलसोनिका यूनियन के फैसले में श्रम न्यायालय ने कहा है कि ठेका मजदूर व स्थाई मजदूर अलग-अलग संस्थान के श्रमिक हैं और दोनों की नियुक्ति अलग-अलग संस्थानों द्वारा की जाती है और स्थाई और ठेका मजदूर एक यूनियन में संगठित नहीं हो सकते। अतः ट्रेड यूनियन रजिस्ट्रार द्वारा दिनांक 23 सितम्बर 2023 को यूनियन पंजीकरण रद्द करने का आदेश सही है। 
    
यह फैसला उस समय आया है जब देश की केन्द्रीय सत्ता में हिन्दू फासीवादी पिछले 11 वर्षों से काबिज हैं और पुराने श्रम कानूनों को खत्म कर लेबर कोड्स को लागू कर दिया गया है। 
    
मारूति मजदूरों के मुकदमे पर आये इस फैसले ने श्रम न्यायालय में लम्बित अन्य मजदूरों के फैसलों की नजीर पेश कर दी है। राष्ट्र निर्माण के नाम पर अब मजदूरों का संगठित होने का अधिकार भी छीन लिया जाएगा। 
    
विरोध-प्रदर्शन में शामिल वक्ताओं ने कहा कि अब न्यायालयों की स्थिति वहां पहुंच गई है कि मजदूरों के मामलों में जो बातें पहले पर्दों के पीछे होती थीं वह अब न्यायालयों के फैसलों में हो रही हैं। श्रम न्यायालय को फैसला करना था कि मारूति प्रबंधन ने इन मजदूरों को बिना कोई घरेलू जांच किये श्रम कानूनों को दरकिनार कर निकाला है, लेकिन श्रम न्यायालय ने श्रम कानूनों को दरकिनार कर राष्ट्र निर्माण का हवाला देकर इन मजदूरों की बर्खास्तगी को जायज ठहरा दिया। आपरेशन सिंदूर को एक फोन कॉल में व्यापार का हवाला देकर रुकवाने वाले साम्राज्यवादी सरगना अमेरिकी साम्राज्यवादी के राष्ट्रपति का नाम अब श्रम न्यायालय भी लिखने लगा है। फिर कहां गई हमारे संविधान की संप्रभुता सम्पन्न गणराज्य की बातें? क्या मजदूरों का कोई राष्ट्र नहीं है? इस फैसले से साफ है कि राष्ट्र पूंजीपतियों की मंडी है जहां मजदूरों का श्रम खरीदा जाता है। अब न्यायालय भी अपने नंगे रूप में राष्ट्र निर्माण के नाम पर पूंजीपतियों की हिमायत कर रहा है और बता रहा है कि श्रम न्यायालय कोई निष्पक्ष संस्था नहीं है बल्कि वह भी पूंजिपति वर्ग का चाकर ही है। 
    
मारूति मजदूरों का फैसला सभी कानूनों को दरकिनार कर दिया गया एक वर्गीय फैसला है। यह न्यायपालिका का बड़ी पूंजी के आगे सीधा समर्पण है। मजदूरों को भी अपनी वर्गीय एकता बनाकर सड़क की लड़ाई का आह्वान करना होगा। 
    
इस प्रदर्शन में बेलसोनिका यूनियन के बर्खास्त मजदूरों, इंकलाबी मजदूर केन्द्र के सदस्यों, कार्यकर्ताओं के अलावा मारूति स्ट्रगलिंग कमेटी के कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। -गुड़गांव संवाददाता 
 

आलेख

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।

/amerika-aur-china-thyuusidaidsa-phaans

शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

/cocaroach-janta-party-hindu-fascist-v-sahi-raah

जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है

/hindu-fascist-chunav-aayog-and-vidhansabha-chunaav

हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल  निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं। 

/imperialism-and-abhijat-workers-class

दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।