एक और पेपर लीक: छात्र आक्रोशित

Published
Sat, 05/16/2026 - 15:50
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पूरे देश भर में मेडिकल स्नातक पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए आयोजित नीट की परीक्षा पेपर लीक की वजह से रद्द कर दी गयी है। 3 मई को हुई इस परीक्षा में लगभग 23 लाख छात्रों ने हिस्सा लिया था। एन.टी.ए. द्वारा आयोजित करायी जाने वाली प्रवेश परीक्षाओं के पेपर लीक होने की यह पहली घटना नहीं है बल्कि बीते कुछ वर्षों में इस संस्था द्वारा आयोजित लगभग हर परीक्षा पेपर लीक व अन्य विवादों में फंसती रही है। 
    
इस बार परीक्षा से कुछ वक्त पहले ही एक गैस पेपर हस्तलिखित बिकने लगा। इस गैस पेपर में परीक्षा से जुड़े ज्यादातर प्रश्न मौजूद थे। 30 लाख रु. से लेकर 30 हजार रु. तक इस पेपर को बेचा गया। जब इसकी खबर फैली तो अंततः सरकार को परीक्षा रद्द कर सीबीआई जांच का आदेश देना पड़ा। पहले भी एन टी ए द्वारा आयोजित परीक्षाओं के पेपर लीक की जांच होती रही है पर स्थिति बदलने का नाम नहीं ले रही है। यह अब हर वर्ष दोहराये जाने वाला प्रहसन बन चुका है कि पहले पेपर लीक होता है फिर जांच के नाम पर कुछ छात्र-अधिकारी-नेता पकड़े जाते हैं और फिर जांच को भुला दिया जाता है। 
    
नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) को देश में प्रवेश परीक्षाओं को आयोजित करने, पेपर छापने, परीक्षा कराने की जिम्मेदारी मिली है। पर यह संस्था निजी प्राइवेट एजेंसी को पेपर छापने, परीक्षा कराने का ठेका देकर अपना काम पूरा कर लेती रही है। एनटीए के अधिकारियों से लेकर इन प्राइवेट एजेंसियों के तार कोचिंग माफियाओं-नेताओं व पेपर लीक कराने वालों से जुड़े रहते रहे हैं। जो पेपर लीक करा भारी पैसा कमाते रहे हैं। इस तरह परीक्षा प्रक्रिया का निजीकरण हर वर्ष लाखों-करोड़ों छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ कर रहा है। 
    
अक्सर ही पेपर लीक से जुड़े माफियाओं से संघ-भाजपा से जुड़े लोगों की सांठ-गांठ मिलती रही है। व्यापम से लेकर नीट, नेट सरीखी ढेरों परीक्षाओं के पेपर हर वर्ष लीक होते रहे हैं। दरअसल सरकार में बैठे लोगों के हस्तक्षेप, कोचिंग माफियाओं की मिलीभगत, निजी एजेंसी के लोगों के भ्रष्टाचार के बगैर इतनी बड़ी परीक्षाओं के पेपर लीक नहीं हो सकते। 
    
एनटीए की इस लापरवाही का खामियाजा हर वर्ष लाखों-करोड़ों आम छात्र उठाते हैं। मेडिकल प्रवेश हेतु ये छात्र वर्ष भर काफी पैसा-समय खर्च कर तैयारी करते हैं। ये पूरी मेहनत से पेपर देने के लिए लम्बी यात्रा करते हैं। और जब पेपर हो जाता है तब उन्हें पता चलता है कि पेपर लीक होने के कारण रद्द हो गया है। इस तरह सरकार लाखों छात्रों के साथ क्रूर मजाक कर रही है। 
    
शिक्षा के व्यवसायीकरण-निजीकरण के साथ परीक्षाओं के केन्द्रीयकरण का यह अनिवार्य परिणाम निकलना था कि पेपर लीक हों। जब लाखों खर्च कर तैयारी कराने वाली कोचिंगों, लाखों डोनेशन लेकर प्रवेश देने वाले कालेजों की भरमार हो तो भला पेपर बेच कर मुनाफा कमाने का धंधा पनपने से कैसे रुक सकता था। अक्सर तो कोचिंग कारोबारी-मेडिकल कालेज-एनटीए के अधिकारी व भ्रष्ट नेताओं सबके हित पेपर लीक करने व भारी कमाई में एक साथ जुड़ जाते रहे हैं। संघ-भाजपा के नेताओं की जल्द अमीर बनने की चाहत अतिरिक्त कारक बनती रही है। देश के पैमाने पर एक परीक्षा होने से लीक हुए पेपर का भाव व कमाई दोनों बढ़ जाते रहे हैं। ढेरों दफा पेपर बिक्री छोटे दायरे में होती रहती है पर जब ये दायरा लांघ जाती है तो परीक्षा रद्द करना मजबूरी बन जाता है। 
    
इस तरह महज कुछ अधिकारियों-नेताओं के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा, उन्हें जेल में डाल समस्या की विकरालता कम की जा सकती है पर समस्या खत्म नहीं हो सकती। समस्या के खात्मे के लिए शिक्षा के निजीकरण-व्यवसायीकरण पर रोक लगाने, निजी एजेंसी बंद करने के साथ पूंजीवादी व्यवस्था का अंत जरूरी है। 
    
छात्र लम्बे वक्त से एनटीए को खत्म करने, निजी एजेंसियों को ठेके पर रोक लगाने की मांग करते रहे हैं पर सरकार सुनने को तैयार नहीं है। अब एक बार फिर छात्रों का गुस्सा सड़कों पर उतर रहा है और सरकार एक बार फिर मामले को शांत कर ठंडे बस्ते में डाल अगले पेपर लीक की तैयारी कर रही है। 

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