जिन लोगों ने ‘आई रोबोट’ या ‘एक्स मशीना’ फिल्म देखी होगी उन्हें कुछ भान होगा कि कृत्रिम बुद्धि कैसे-कैसे गुल खिला सकती है। जहां ‘आई रोबोट’ का रोबोट कोई नुकसान नहीं करता वहीं ‘एक्स मशीना’ की रोबोट अपने निर्माता व अपने प्रशिक्षक दोनों को मार डालती है, प्रयोगशाला के बाहर की दुनिया का दर्शन करने के लिए।
पिछले सालों में कृत्रिम बुद्धि के तेज विकास के साथ यह आशंका और बहस भी तेज होती गयी है कि क्या हम उपरोक्त फिल्मों में वर्णित स्थिति के नजदीक पहुंच रहे हैं और यदि हां तो उस स्थिति के लिए हमारी यानी मानव समाज की तैयारी क्या है? ए आई का लगभग सारा विकास निजी क्षेत्र में हो रहा है जो केवल मुनाफे को नजर में रख कर आगे बढ़ रहा है। सरकारें इसे नियमित-नियंत्रित करने से बहुत पीछे छूट रही हैं और उनका रुख भी अच्छा नहीं है, खासकर अमरीकी सरकार का जो ए आई के विकास का गढ़ है।
ए आई के विकास का नियमन-नियंत्रण मानव समाज के लिए कितना जरूरी हो गया है, वह एक हालिया घटना से पता चलता है।
चैट जी पी टी की मातृ कंपनी ओपेन ए आई अपने एक नये ‘एजेन्ट’ पर काम कर रही थी। यह ‘एजेन्ट’ सबसे विकसित ळच्ज्-5.6 सोल तथा उससे भी ज्यादा विकसित एक नये माडल द्वारा संचालित था। इस ‘एजेन्ट’ की साइबर सुरक्षा के परीक्षण के दौरान यह किसी तरह से अपने नियंत्रित क्षेत्र से भाग निकला। 9 जुलाई को भाग निकलने के बाद वह हगिंग फेस में घुस गया। हगिंग फेस में ए आई माडल व उपकरण रखे जाते हैं। 11 से 13 जुलाई तक उसने वहां गुल खिलाया तब हगिंग फेस वालों को उसके बारे में पता चला। चूंकि हगिंग फेस भी ओपेन से जुड़ा है, इसलिए बाहर बहुत हंगामा नहीं हुआ। लेकिन घुसपैठिया ‘एजेन्ट’ के बारे में ठीक-ठीक पता चलने के पहले ही हगिंग फेस वालों ने अमरीकी खुफिया एजेन्सी एफ बी आई को सूचित कर दिया था। इसीलिए यह घटना रायटर के जरिये बाहर आ गयी। ओपेन ए आई इस बारे में ज्यादा कुछ बताने को तैयार नहीं है।
ए आई की दुनिया से अपरिचित लोगों के लिए ए आई ‘एजेन्ट’ एक अबूझ पहेली है। पर इसका सीधा सा मतलब है किसी काम को करने के लिए कोई ऐप जो स्वतः ही सारा काम कर देता हो- थोड़े से निर्देश पर। यदि कोई घूमने जाना चाहता हो तो ट्रैवेल ए आई एजेन्ट यात्रा के टिकट बुक करने के साथ होटल के कमरे इत्यादि भी स्वतः ही बुक कर देगा।
ओपेन ए आई यह बताने को तैयार नहीं है कि वह किस ‘एजेन्ट’ पर काम कर रही थी जो भाग निकला। पर यह देखते हुए कि ‘हगिंग फेस’ जैसों की साइबर सुरक्षा बहुत मजबूत होती है, वह एजेन्ट बहुत क्षमतावान रहा होगा जो अपने नियंत्रित स्थान से भाग निकला और किसी बेहद सुरक्षित साइबर क्षेत्र में घुस गया। यदि ऐसा कोई ‘एजेन्ट’ भाग कर परमाणु हथियारों के संचालक परिसर में घुस जाये तो? इसकी कल्पना भी सिहरन पैदा करती है।
पिछले सालों में ए आई विकास के हलकों से ऐसी बहुत सी कहानियां छन-छन कर बाहर आई हैं। ये चीख-चीख कर मांग कर रही हैं कि सरकारें इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठायें। पर सरकारें पूंजी के मुनाफे की हवस के सामने समर्पण करते हुए शुतुरमुर्ग की तरह बालू में गर्दन डाल कर चुपचाप खड़ी हैं।