आपातकाल : तब और अब

Published
Tue, 06/16/2026 - 15:50
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25-26 जून आते ही हिन्दू फासीवादी एक बार फिर 1975 के आपातकाल का शोर मचाने लगेंगे। इस शोर से वे आज की हकीकत को छिपाने का हर संभव प्रयास करेंगे, जो किन्हीं मायनों में तब के आपातकाल से बदतर है।
    
इस बदतर हालत को एक उदाहरण से समझा जा सकता है। तब सर्वोच्च न्यायालय ने ए डी एम जबलपुर मामले में अपने बदनाम फैसले में यह कहा था कि आपातकाल के दौरान लोगों के जीवन का अधिकार भी समाप्त हो जाता है। सरकार बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के किसी नागरिक की जान ले सकती है। इस फैसले को हाल ही में (2017 में) पलट दिया गया। लेकिन अब हालत यह है कि नागरिकों की जान लेने के लिए सरकार को उस तरह के अदालती फैसले की जरूरत नहीं है। देश का गृहमंत्री खुलेआम कहता है कि वह फलां तारीख तक माओवादियों का सफाया कर देगा- उन्हें कानूनी व गैरकानूनी तरीके से मारकर। उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री खुलेआम कहता है कि सुधर जाओ नहीं तो ठोक दिये जाओगे। इनके सुर में सुर मिलाते हुए जनता का एक हिस्सा अपराधियों के ‘इनकाउंटर’ की मांग करने लगा है और सरकार द्वारा यह मांग पूरी की जाने लगी है। ‘इनकाउंटर’ के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार नित नये रिकार्ड कायम कर रही है और उसे उस पर गर्व है।
    
इसी तरह आपातकाल में लोगों को उनके घरों से उजाड़े जाने की कार्रवाई कुख्यात तुर्कमान गेट कांड के तौर पर आज भी याद की जाती है। पर अब ‘बुलडोजर बाबा’ शेखी बघार रहे हैं तथा एक के बाद दूसरे मुख्यमंत्री उनकी नकल कर रहे हैं। लोगों के घर बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के ध्वस्त किये जा रहे हैं और देश का सर्वोच्च न्यायालय अपने फैसले की खुलेआम धज्जियां उड़ती देख भी चुप्पी साध रहा है।
    
आज 1975 के आपातकाल जैसी या उससे बदतर स्थिति को दिखाने के लिए ऐसे कई उदाहरण दिये जा सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय का सरकार के सामने समर्पण, सारी सरकारी या स्वायत्त संस्थानों पर सरकार का नियंत्रण, संसद का अप्रासंगिक हो जाना, पूंजीवादी प्रचार तंत्र का पूरी तरह से सरकार की चरण वंदना में लग जाना, समाज में सरकारी आतंक की दहशत, संघी लंपटों का तांडव, इत्यादि इसके कुछ उदाहरण हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि आज पूंजीवादी दायरों में अघोषित आपातकाल की चर्चा आम हो गई है।
    
जून 1975 में आपातकाल संविधान की धारा 352 के तहत लगाया गया था और फिर जनवरी 1977 में इसे हटाया गया। संविधान में निश्चित स्थितियों में आंतरिक आपातकाल लगाने का प्रावधान है और तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने उसी के तहत इसे लगाया था। इस तरह सरकार की कार्रवाई पूरी तरह कानूनी-संवैधानिक थी। सरकार के पक्ष में कुछ लोग यह भी तर्क दे सकते हैं कि जब 24 जून को रामलीला मैदान की रैली में जयप्रकाश नारायण, इत्यादि ने खुलेआम पुलिस व सेना का सरकारी आदेश न मानने का आह्वान कर दिया तो सरकार के पास कोई रास्ता नहीं रह गया। आज की हिन्दू फासीवादी सरकार तो इससे बहुत कम पर आपातकाल लगा देगी, जैसा कि हालिया मजदूर आंदोलन के समय सरकार के रुख से ध्वनित होता है।
    
आखिर इंदिरा गांधी की सरकार 1971 की अपनी विशाल लोकप्रियता से 1975 के आपातकाल तक कैसे पहुंच गई। 1971 के लोकसभा चुनावों में इंदिरा गांधी को दो-तिहाई से ज्यादा का बहुमत मिला था- आज के मोदी से बहुत-बहुत ज्यादा। 1972 के विधानसभा चुनावों में लगभग सारे ही प्रदेशों में कांग्रेस की बहुमत की सरकारें बनी थीं। 1971 में पाकिस्तान से लड़ाई तथा बांग्लादेश के निर्माण से इंदिरा गांधी की लोकप्रियता चरम पर थी। यहां तक कि अटल बिहारी वाजपेयी ने भी उन्हें दुर्गा कह कर संबोधित किया था।
    
1971-72 में लोकप्रियता के इस शिखर से इंदिरा गांधी और उनकी सरकार तेजी से नीचे फिसली और 1974 से देश में उनकी सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर आंदोलन शुरू हो गये। इसकी शुरूआत रेल मजदूरों की देशव्यापी हड़ताल से हुई थी जिसे कठोर दमन से कुचल दिया गया था। फिर बिहार और गुजरात में कांग्रेसी सरकारों के खिलाफ छात्रों-नौजवानों के आंदोलन फूट पड़े जो बाद में ‘जे पी आंदोलन’ में रूपांतरित हो गया। ‘जेपी आन्दोलन’ के झंडे तले तमाम विपक्षी पार्टियां एकजुट हो गईं। ‘संपूर्ण क्रांति’, ‘दूसरी आजादी’ की बातें हवा में तैरने लगीं।
    
इंदिरा गांधी के लिए पानी तब सर से गुजर गया जब 2 जून 1975 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 1971 के उनके लोकसभा चुनाव को रद्द कर दिया। उनके चुनाव को उनके प्रतिद्वंदी प्रत्याशी राज नारायण ने इस आधार पर चुनौती दी थी कि प्रधानमंत्री कार्यालय के दो अधिकारियों ने उनकी एक चुनावी सभा को आयोजित करने में मदद की थी जबकि अभी उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं हुआ था। आज मोदी एण्ड कंपनी द्वारा चुनावों के लिए सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग को देखते हुए यह प्रकरण कितना तुच्छ लगता है। पर तब उच्च न्यायालय की एक ‘वैकेशन बैंच’ ने चार साल से लंबित एक मामले को आनन-फानन में सुनकर फैसला सुना दिया। इससे इंदिरा गांधी की प्रधानमंत्री की कुर्सी जाने का खतरा पैदा हो गया। इंदिरा गांधी ने इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी और आपातकाल लगा दिया। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने उपरोक्त फैसले को पलट दिया था।
    
1971 से 1975 तक का घटनाक्रम इस बात का ठोस उदाहरण है कि कैसे पूंजीवादी नेताओं और पार्टियों के फर्जी वादे उन्हें चुनाव जीतने में मदद करते हैं और फिर कैसे उनके लिए मुसीबत बन जाते हैं। कि कैसे विशाल लोकप्रियता कुछ सालों में हवा हो जाती है और बदहाल जनता सड़क पर उतर आती है। तब सरकार के पास दमन के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। फर्जी वादों का जादू उतर चुका होता है और अब लाठी-डंडा ही एकमात्र विकल्य बचता है।
    
इंदिरा सरकार द्वारा लगाये गये आपातकाल को तब पूंजीपति वर्ग का समर्थन हासिल था। बल्कि पूंजीपति वर्ग जन आंदोलन से पैदा हुई ‘अराजकता’ से भयभीत था और वह चाहता था ‘शांति’ और ‘कानून-व्यवस्था’ बहाल हो जाए। और जब आपातकाल के दमन के जरिए ‘शांति’ बहाल हुई तो पूंजीपति वर्ग ने राहत व चैन की सांस ली। आजादी के बाद के बड़े राजनीतिक संकट से आपातकाल द्वारा मुक्ति से पूंजीपति वर्ग खुश था। व्यवस्था की रक्षा के लिए संविधान में दर्ज धारा-352 ने अपनी भूमिका बखूबी निभाई थी।
    
संघ परिवार और उसकी राजनीतिक पार्टी भारतीय जन संघ ने ‘जे पी आंदोलन’ में बढ़ चढ़कर भागेदारी की थी और उसके जरिये उसने भारतीय समाज में भारी वैधानिकता हासिल की थी। यह अलग बात है कि जेल में बंद उसके नेताओं ने इंदिरा गांधी से माफी मांगी थी और सरकार के अनुकूल व्यवहार करने का वायदा किया था। आज जब वे आपातकाल में अपनी शहादत की गाथा सुनाते हैं तो इस तथ्य को ध्यान में रखना चाहिए।
    
आज संघ परिवार के हिन्दू फासीवादी सत्ता में हैं। वे केन्द्र में सत्ता में हैं और ज्यादातर प्रदेशों में। पर 1971-72 की इंदिरा सरकार की लोकप्रियता के विपरीत इनकी लोकप्रियता संदेह के दायरे में है। पिछले लोक सभा चुनावों से लेकर अब तक हुए तमाम प्रादेशिक चुनावों में इनके द्वारा धोखाधड़ी से जीतने के आरोप लगते रहे हैं। बहुत सारे लोगों की राय है कि ‘स्वतंत्र व निष्पक्ष’ चुनाव हुए होते तो ये केन्द्र व तमाम प्रदेशों में सत्ता से बाहर हो चुके होते।
    
पर हिन्दू फासीवादियों का सत्ता से बाहर जाने का कोई इरादा नहीं है। बहुत पहले गृहमंत्री अमित शाह ने कहा था कि यदि वे 2019 का लोकसभा चुनाव जीत गये तो फिर अगले पचास साल तक कोई उन्हें सत्ता से नहीं हटा सकता। और वे पुलवामा के जरिये 2019 का चुनाव जीत गये।
    
किस बिना पर तब अमित शाह ने वह दावा किया था आज यह स्पष्ट है। आज यह स्पष्ट है, कि सर्वोच्य न्यायालय, चुनाव आयोग तथा ईडी-सीबीआई इत्यादि तमाम संस्थाओं पर अपने नियंत्रण के जरिये वे सत्ता में बने रहना चाहते हैं। अपनी हिन्दू-मुसलमान की साम्प्रदायिक राजनीति तथा फर्जी वादों का असर कम होने की स्थिति में भी वे संस्थाओं पर पकड़ के जरिये सत्ता में बने रहना चाहते हैं। उन्हें बड़े पूंजीपति वर्ग तथा उसके पैसे व प्रचार तंत्र का पूरा समर्थन हासिल है जिसके जरिये वे वोट, विपक्षी प्रत्याशी तथा चुने हुए विपक्षी जन प्रतिनिधि सब खरीद सकते हैं।
    
लेकिन येन-केन-प्रकारेण सत्ता में बने रहना एक बात है और तबाह-बदहाल जनता के आक्रोश का सामना करना दूसरी बात है। और तब तो स्थिति और विकट हो जाती है जब इस तबाही-बदहाली की वजह सरकार की नीतियां ही हों जो मजदूर-मेहनतकश जनता से छीनकर बड़े पूंजीपतियों पर लुटा रही हो। ऐसे में एक ही रास्ता बचता है- जनता के आक्रोश की हर अभिव्यक्ति का दमन। लाठी-डंडे और गोली का और ज्यादा प्रयोग। निगरानी और प्रतिबन्ध का बोलबाला।
    
पिछले सालों में हिन्दू फासीवादी सरकार ने हिन्दू-मुसलमान की सांप्रदायिक राजनीति के साथ इस दमन का इस्तेमाल कर जन आक्रोश का सामना करने की कोशिश की है। पर यह क्रमशः और मुश्किल होता जा रहा है। इसी के अनुरूप दमन और बढ़ता जा रहा है।
    
इंदिरा गांधी सरकार के बरक्स हिन्दू फासीवादियों की सरकार ने यह रास्ता चुना है कि औपचारिक तौर पर नियमों-कानूनों के दायरे में रहते हुए असल में उनके विपरीत करना। भारत के संवैधानिक कानूनी ढ़ांचे में मौजूद प्रावधानों और छेदों के जरिये यह काफी कुछ संभव हो जाता है। इनके जरिये बिना आपातकाल लगाये भी वास्तव में आपातकाल या उससे भी बदतर हालात बनाये जा सकते हैं। यह एक बार फिर रेखांकित करना होगा कि इंदिरा गांधी सरकार द्वारा आपातकाल संवैधानिक तरीके से लगाया और हटाया गया था।
    
पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है। जिस चीज को हिन्दू फासीवादी पिछले कुछ सालों से चोरी-छिपे कर रहे थे, यानी मतदाता सूची में मनमाफिक नामों को जुड़वाना या हटवाना, वह अब कानूनी तरीके से खुलेआम किया जा रहा है।
    
इंदिरा गांधी के आपातकाल की खासियत यह थी कि वह सरकारी मशीनरी द्वारा मजदूर- मेहनतकश जनता पर शिकंजा थी। इस शिकंजे का कांग्रेसी नेताओं में कुछ ने फायदा उठाया था पर आम कांग्रेसी कार्यकर्ता उसमें शामिल नहीं थे। वैसे तब तक कांग्रेसी कार्यकर्ता रह भी नहीं गये थे। कांग्रेस पार्टी तब तक अलग-अलग स्तर के नेताओं की पार्टी बन कर रह गई थी। जहां तक आम मजदूर-मेहनतकश जनता का सवाल है, वह इस शिकंजे से घुट रही थी। कुछ मध्यम वर्गीय लोग ‘शांति’ की बहाली से खुश थे पर इनकी संख्या ज्यादा नहीं थी।
    
आज हिन्दू फासीवादियों की अनौपचारिक या अघोषित आपातकाल की खासियत यह है कि इसमें जनता का एक हिस्सा इस तानाशाही के साथ है, इस बात से बेखबर कि वह तानाशाही पलटकर उस पर भी वार करेगी। यह हिस्सा मुख्यतः सवर्ण मध्यमवर्गीय हिन्दुओं से बनता है, हालांकि कुछ दूसरे हिस्से भी इसमें शामिल हैं। इस अघोषित आपातकाल की तानाशाही को लागू करने में सरकारी मशीनरी के साथ हिन्दू फासीवादियों की लंपट सेना की महत्वपूर्ण भूमिका है। कुछ प्रदेशों में तो इन लंपट गिरोहों को गौ-रक्षा दल इत्यादि के नाम पर कानूनी संरक्षण प्रदान कर दिया गया है। कई प्रदेशों में हिन्दू फासीवादी लंपट पुलिस संरक्षण में खुलकर हिंसा कर रहे है, खासकर अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ।
    
इस सबसे समाज में एक खास तरह की दहशत पैदा हो गई है। सामान्य विरोध प्रदर्शन भी अब अपराध हो गया है जिसके लिए यू ए पी ए  अथवा एन एस ए लगाया जा सकता है। फर्जी मुकदमों में लोगों को सालों-साल जेल में सड़ाया जा रहा है। सोशल मीडिया पर टिप्पणियों के लिए लोगों पर मुकदमे हो रहे हैं। किसी को किसी भी समय फर्जी मुकदमों में फंसाया जा सकता है।
    
इसका एक परिणाम लोगों द्वारा स्व-प्रतिबंध में हुआ है। लोग बच-बचाकर बोल रहे हैं। नामी-गिरामी लोग तो एकदम चुप्पी साध गये हैं या फिर सरकार के सुर में सुर मिलाने लगे हैं। सरकार के खिलाफ कुछ भी बोलने पर संघी लंपटों की भीड़ उन पर टूट पड़ती है।
    
आज का अघोषित या अनौपचारिक आपातकाल फासीवादी निजाम की आहट है- हिन्दू फासीवादी निजाम की। यह सामान्य सरकारी तानाशाही नहीं है जैसा इंदिरा गांधी के आपातकाल में था। इसीलिए यह ज्यादा भयानक है। तब का आपातकाल पूंजीवादी व्यवस्था की रक्षा के लिए लगाया गया था। आज का अघोषित आपातकाल भी पूंजीवादी व्यवस्था की रक्षा के लिए है पर व्यवस्था की ज्यादा गंभीर संकट की अवस्था में। संकट इतना गंभीर है कि पूंजीपति वर्ग एक फासीवादी आंदोलन को पाल-पोष कर आगे बढ़ा रहा है जो देश में लगभग हर जगह सत्तारूढ़ है। समाज में विस्फोट की किसी भी अवस्था में पूंजीपति वर्ग इस आंदोलन को फासीवादी निजाम कायम करने की इजाजत दे देगा।
    
लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। जैसे इंदिरा गांधी के घोषित आपातकाल का तीखा विरोध हुआ था और इंदिरा गांधी को अंततः पीछे हटना पड़ा था, वैसे ही आज भी इस अघोषित आपातकाल का तीखा प्रतिरोध हो रहा है। सारे दमन के बावजूद मजदूर किसान, छात्र-नौजवान तथा अन्य शोषित-उत्पीड़ित तबके सड़क पर उतर रहे हैं। बदहवास सरकार और ज्यादा दमन पर उतर रही है पर वह लोगों के हौसलों को नहीं तोड़ पा रही है। इसीलिए यदि यह हिन्दू फासीवादी सरकार और आगे जाती है तथा फासीवादी निजाम कायम करने की कोशिश करती है तो उसका भी अंजाम कोई अच्छा नहीं होगा। वह अंजाम इंदिरा गांधी जैसा नहीं होगा जो 1977 में सत्ता से बाहर होने के तीन साल बाद फिर सत्ता में लौट आई थी। वह अंजाम इटली के मुसोलिनी और जर्मनी के हिटलर जैसा होगा जो जहन्नुम रसीद कर दिये गये थे।
 

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