सरकारी अस्पतालों में मरीजों का इलाज हुआ मुश्किल

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हिन्दू धर्म की ठेकेदार भाजपाई सरकार अधिकतर राज्यों और केन्द्र में काबिज है। इन्होंने अभी तक देश में धार्मिक उन्माद व नफरत फैलाने में वरीयता हासिल की है। अगर इस मामले में कोई इन्हें नम्बर देने वाला हो तो वो भी थक जाएगा। लेकिन जनसुविधाओं के मामले में इनका रिकार्ड निम्न से निम्नतर बनता जा रहा है। सरकारी ढांचे को खत्म करने के लिए बजट रूपी ऑक्सीजन हटाई जा रही है। वहीं जनता की सुविधायें छीनकर पूंजीपतियों को लूट की छूट दी जा रही है।
    
यहां पर स्वास्थ्य के सम्बन्ध में बात की जा रही है। संघी भाजपाई सरकार एक तरफ तो लोगों का गौ मूत्र और गोबर से इलाज का दावा करने वाले पाखण्डी बाबाओं की फौज तैयार कर रही है। इसके साथ ही पढ़े-लिखे व अनपढ़ कुछ डाक्टर और लम्पट गोबर खाने व मूत्र पीने का दिखावा कर प्रचार कर रहे हैं। दूसरी तरफ स्वास्थ्य व्यवस्था का पुराना ढांचा भी अपनी अंतिम सांसें ले रहा है। सरकारें सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को खत्म करने की पूरी कोशिशों में लगी हुई हैं। सरकार जन स्वास्थ्य पर हर वर्ष बजट घटाती जा रही है। बजट इसलिए घटाया जा रहा है ताकि निजी अस्पतालों को बढ़ावा दिया जा सके। अगर सरकारी अस्पताल में बेहतर स्वास्थ्य लाभ नहीं मिलेगा तो आम जनता का खुद ब खुद ही सरकारी अस्पतालों से मोह भंग हो जाएगा। फिर अगर लोगों को अपना इलाज कराना है, तो मजबूरी में निजी अस्पतालों में इलाज कराने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। इस महंगे इलाज में चाहे लोगों को अपनी जमीन या अन्य सम्पत्ति ही क्यों न बेचनी पड़ जाए।
    
सरकार सरकारी स्वास्थ्य ढांचे को सचेत तौर पर बीमार कर रही है। सरकारी स्वास्थ्य ढांचा जल्द से जल्द बंद हो इसके लिए सरकार मरीजों के लिए नये-नये नियम बनाती रहती है। मरीज भी इन नियमों के मकड़जाल में फंसने से बचते हैं। और इस प्रकार निजी अस्पताल में इलाज कराना बेहतर समझते हैं।
    
नियम रूपी मकड़जाल की एक खबर उ.प्र. के शाहजहांपुर के जिला अस्पताल से आयी। वहां पर मरीजों के लिए पर्चा बनाने के लिए आधार कार्ड  और साथ ही अंगुलियों के निशान भी अनिवार्य कर दिए गये हैं। अगर किसी मरीज के अंगुलियों के निशान किसी वजह से नहीं मिलते हैं तो उसकी दवा का पर्चा नहीं बनेगा। उस मरीज को दवा लिये बिना वापस जाना पड़ेगा। दूसरा नियम आनलाईन पर्चा बनाने का भी है। मरीज अस्पताल द्वारा जारी एप को डाउनलोड कर पर्चा बना सकते हैं। अस्पताल ने यह विकल्प ज्यादा भीड़ होने के चलते बना रखा है। लेकिन जब मरीज इस ऐप का इस्तेमाल करते हैं तो वहां नेटवर्क नहीं आते। इस प्रकार अस्पताल के इस विकल्प की खामियों के चलते भी मरीज दवा लेने से वंचित रह जाता है। इस प्रकार हर रोज अधिकतर मरीजों को बिना दवा लिए वापस लौटना पड़ता है।
    
फिर ऐसे ही परेशान मरीजों ने सी एम ओ और जिला अधिकारी से शिकायत की। इन अधिकारियों का कहना था कि अस्पताल में दवा की कालाबाजारी हो रही थी। इसलिए हमने इस तरह के नियम बना रखे हैं, जिससे कि कालाबाजारी को रोका जा सके। बेशर्म अधिकारी अपनी नाकामियों का ठीकरा मरीजों पर फोड़ रहे हैं। खुद दवाईयों की कालाबाजारी कर भ्रष्टाचार कर रहे होते हैं। खुद भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों व नेताओं को जनता भी भ्रष्टाचारी नजर आती है। असल में सरकार के नए-नए नियमों को बनाने के पीछे अस्पताल जैसे संस्थानों को बीमार घोषित कर बंद करने की मंशा है।         
        -संतोष, शाहजहांपुर
 

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