हैप्पी दीपावली

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दीपावली की तैयारी महीनां पहले से शुरू हो जाती है। हर कोई तैयारी कर रहा होता है दीपावली को लेकर। कोई कुछ खरीदना चाहता है तो कोई कुछ। बाजारों में रौनक बढ़ जाती है। चड्ढी-बनियान से लेकर कारों की बिक्री बढ़ जाती है। हर कोई खुश होना चाहता है। लेकिन किसी भी बाजार में कोई दुकान तो ऐसी होती नहीं जहां खुशियां बिकती हों। लेकिन ऐसा जरूर महसूस कराया जाता है सामान खरीदने से खुशी मिलेगी। इसी उम्मीद में लोग बाजारों में जाते हैं जरूरत का सामान खरीदने। जरूरत का सामान खरीदने से कुछ न कुछ खुशी मिलेगी ही। 
    
दीपावली की तैयारी में घरों की सफाई हो रही है और रंग रोगन हो रहा है। फर्श पर रंगोली बनायी जायेगी और दरवाजों पर शुभ दीपावली लिखा जायेगा। रंगोली के रंगों की बोतलें और शुभ दीपावली के स्टीकर सब बाजार से आयेंगे और पूजा के फूल, धनतेरस के लिए लक्ष्मी व गणेश की मूर्तियां भी आयेंगी। ईएमआई पर कार, स्कूटर, फ्रिज, वाशिंग मशीन खरीद रहे हैं तो नगद में बदन को चमकाने के लिए कपड़े व ब्यूटी प्रोडक्ट खरीदे जा रहे हैं। 
    
दीपावली पर सभी खुश नजर आते हैं। पांच किलो राशन देने वाले भी और पांच किलो राशन लेने वाले भी। पक्ष भी और विपक्ष भी। मूर्ति बेचने वाले भी और मूर्ति खरीदने वाले भी। एक मजदूर मालिक से एक कम्बल और एक किलो मिठाई पाकर खुश है। 
    
दीपावली की सभी तैयारियों के बाद आखिर में वह रात भी आ जाती है जब पूजा के बाद पटाखे फोड़े जाते हैं। पहले से तैयारी कर ली होती है पटाखे फोड़ने की। हर कोई पटाखा फोड़ रहा होता है और खुश रहा होता है। हर एक को अपने हिस्से की खुशी चाहिए होती है। एक के पटाखा फोड़ने पर कोई दूसरा खुश नहीं हो रहा होता है। अपने ही घर में अच्छे पकवान बनाकर खुद ही उसे खाना है और खुश होना है। खुश होने या दिखने का एक ऐसा दबाव होता है कि अगर वह खुश न भी हो तो उसे परिवार व समाज की खातिर खुश होना ही पड़ेगा। कितना दबाव महसूस होता है खुश होने का। ऐसा लगता है कि दुखी होने का हक सिर्फ फिलिस्तीनियों का है। 
    
जब दीपावली नहीं होती है तब भी इंसान खुश रहने की कोशिश तो करता ही है। बाजार से न सही सोशल मीडिया से भी खुशियां खरीदी जा रही थीं। कुछ लोग खुश हो रहे थे जब फिलिस्तीनियों पर बम गिर रहे थे। खुश होना एक आर्ट आफ लिविंग है और कुछ लोगों ने ये कारीगरी सीखी नहीं सिर्फ पंचर लगाना सीखा और सिर्फ काम वाली कारीगरी सीखी। 
    
वैसे तो लोग साल भर खुश रहना चाहते हैं और इसीलिए अलग-अलग त्योहार हैं अलग-अलग प्रकार की खुशी के लिए। होली, दीपावली, दशहरा आदि सभी खास त्यौहार हैं जिसमें परिवार के लोग एक साथ एकत्र होते हैं कि कम से कम त्यौहार पर तो आपस में मिल लिया जाये। आपस में मिलने की फुर्सत कम ही मिलती है ज्यादातर काम तो सोशल मीडिया पर बधाई देने से निपट जाता है। सोशल मीडिया पर जब भी कोई बधाई मैसेज आता है तो कि अगर मैंने इसका रिप्लाई नहीं किया तो? इस सवाल को ज्यादा देर तक होल्ड करने से कन्सनट्रेशन बिगड़ने लगता है। रिप्लाई करने के बाद ही थोड़ा आराम मिलता है। 
    
महिलाओं के लिए एक अलग तरीके का दबाव काम करता है। कि उन्होंने मीडिया एकाउंट पर अगर नया स्टेटस नहीं लगाया तो उनका ब्लड प्रेशर बढ़ने लगता है। दीपावली ऐसा लगता है कि खुश होने से ज्यादा खुश दिखने का त्योहार है। हमें तो बस खुश होना है। अगर राम की बजाय रावण की जीत होती तो भी ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। हम रावण की बजाय राम का पुतला जला रहे होते और रावण के जीतने की खुशी में दीपावली मना रहे होते। बधाई संदेश भी उसी प्रकार भेज रहे होते। -सेवा राम, बरेली
 

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