ईरान पर युद्ध थोपने से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बड़ी अकड़ में थे। टीवी पर, सोशल मीडिया पर, रैलियों में- हर जगह वही अंदाज। अकड़ ऐसी कि कई बार मुंह और शरीर तक टेढ़ा हो जाता था।
उस समय ऐसा लग रहा था जैसे कोई टेक कंपनी नया फोन लांच कर रही हो- ‘‘इस बार का आपरेशन इतना स्मार्ट है कि दुश्मन को पता भी नहीं चलेगा और खेल खत्म हो जाएगा।’’
युद्ध शुरू हुआ। मिसाइलें चलीं, ड्रोन उड़े, धमकियां दी गईं, बयान आए।
दुनिया को बताया गया कि यह कुछ दिनों का मामला है। अमेरिका और उसके सहयोगियों की तकनीक, खुफिया तंत्र और सैन्य ताकत के सामने ईरान टिक नहीं पाएगा। बार-बार दोहराए जाने वाला यह आलाप कि ‘‘हम युद्ध जीत रहे हैं’’ ‘‘कि हमने ईरान को तबाह कर दिया है’’ या यह कि ‘‘हम युद्ध जीत चुके हैं’’।
लेकिन कुछ दिन बाद वही महाशक्ति युद्धविराम की अपील करने लगी।
यानी जो आदमी मैच शुरू होने से पहले कह रहा था- ‘‘मैं दस गोल मारूंगा’’, वही हाफ टाइम में रेफरी से कहने लगा- ‘‘देखिए, खेल भावना भी कोई चीज होती है।’’
अचानक उसे शांति याद आ गई।
जो नेता कल तक कह रहे थे- ‘‘हम पीछे नहीं हटेंगे’’, वही आज कह रहे हैं- ‘‘हमारा उद्देश्य तो हमेशा से स्थिरता और शांति था।’’
साम्राज्यवाद का यही चरित्र है- वह हर युद्ध की शुरुआत भी शांति के नाम पर करता है और हर युद्ध विराम का श्रेय भी खुद ले लेता है। एक बार फिर वर्साय का महल इसके लिए चुना गया।
साम्राज्यवाद यही करता है। पहले डर पैदा करो। फिर हथियार बेचो। फिर हमला करो। फिर बातचीत की अपील करो।
और अंत में घोषणा कर दो- ‘‘देखिए, हमने दुनिया को बचा लिया।’’
यह वैसा ही है जैसे कोई साइबर सिक्योरिटी कंपनी पहले आपके सिस्टम में वायरस डाल दे और फिर प्रेस कान्फ्रेंस करके कहे- ‘‘हमारी वजह से आपका डेटा सुरक्षित है।’’
सबसे मजेदार बात यह है कि युद्ध के दौरान अमेरिकी मीडिया का एक हिस्सा बता रहा था कि ईरान अलग-थलग पड़ चुका है, उसकी अर्थव्यवस्था कमजोर है, उसके संसाधन सीमित हैं और वह ज्यादा दिन टिक नहीं पाएगा।
लेकिन अमेरिका और ट्रंप ने युद्धविराम की मेज पर ईरान को मौजूद पाया।
कमजोर कहा जाने वाला देश झुका नहीं।
प्रतिबंधों, दबावों और सैन्य धमकियों के बावजूद उसने अपनी शर्तों को नहीं छोड़ा। और अमेरिका को झुका दिया।
तब समझ में आया कि युद्ध केवल हथियारों से नहीं जीते जाते। कुछ युद्धों में बच जाना ही जीत होता है। कुछ लड़ाइयों में हार न मानना ही जीत होता है। और कुछ मौकों पर दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति को यह एहसास करा देना कि हर देश इराक, लीबिया या अफगानिस्तान नहीं है- यही जीत होती है।
इस युद्ध ने कम से कम इतना तो साबित कर दिया कि अरबों डालर के रक्षा बजट, विमानवाहक पोतों और मंचों से की गई डींगों के बावजूद हर लड़ाई मनमाफिक नहीं जीती जा सकती।
महाशक्तियां अक्सर अपनी ताकत का विज्ञापन ज्यादा करती हैं और अपनी सीमाओं को फुटनोट में छिपा देती हैं।
युद्धविराम की घोषणा दरअसल केवल मिसाइलों की खामोशी नहीं थी। वह उस हेकड़ी की आवाज भी थी, जो धीरे-धीरे उतर रही थी। वही हेकड़ी जो कहती थी- ‘‘हम नियम बनाते हैं।’’
लेकिन दुनिया बदल रही है। अब छोटे और कमजोर समझे जाने वाले देश कभी-कभी इतना भर कर देते हैं कि महाशक्तियों को भी बातचीत की मेज याद आ जाती है।
जिस अमेरिका ने दुनिया को यह विश्वास दिलाया था कि उसकी शक्ति अजेय है, उसे अंततः उसी देश के साथ समझौते की मेज पर बैठना पड़ा जिसे वह युद्ध शुरू होने से पहले लगभग पराजित घोषित कर चुका था। यही नहीं उसे कमोबेश वही बातें माननी पड़ीं जो ईरान शुरू से कह रहा था।
लेकिन इसके बाद भी साम्राज्यवादी बाज नहीं आएंगे। वे अगला मौका मिलते ही फिर किसी युद्ध में उतर जाएंगे। और ऐसा वे तब तक करते रहेंगे जब तक दुनिया की मजदूर और मेहनतकश जनता साम्राज्यवाद का अंत नहीं कर देती।