जीत कर भी हारे मोदी

लोकसभा चुनाव परिणाम

4 जून को लोकसभा चुनाव के नतीजे आ गये। इस चुनाव में सत्तासीन मोदी सरकार के साथ-साथ चुनाव आयोग-प्रशासनिक मशीनरी-न्यायपालिका-मीडिया सभी मोदी की दोबारा एकछत्र ताजपोशी के लिए जुटे हुए थे। वहीं भांति-भांति की ताकतें इंडिया गठबंधन बना मोदी की ताजपोशी रोकने को प्रयासरत थीं। चुनाव का कुल जमा परिणाम यही रहा कि इंडिया गठबंधन, एनडीए गठबंधन को बहुमत लेने से तो नहीं रोक पाया पर एनडीए 400 पार, भाजपा 370 पार का नारा देने वालों को, भाजपा को 240 पर समेट मोदी के घमण्ड को चूर जरूर कर दिया। इसीलिए कहा जाना चाहिए कि चुनाव नतीजों में मोदी जीत कर भी हार गये।

मोदी की इस जीत में हार के कई आयाम थे। यह हार सबसे घनीभूत रूप में मोदी-योगी के उ.प्र. में देखी गयी। सबसे पहले वाराणसी में मोदी जीत कर भी हार गये जब उनका जीत का अंतर घटकर महज डेढ लाख रह गया। यह हार अयोध्या में जहां राम मंदिर बना था वहां भाजपा की करारी हार में नजर आयी। यह हार उ.प्र. में 70 पार का नारा देने वाली भाजपा के महज 33 (गठबंधन के साथ 36) सीटों में सिमटने में नजर आयी।

उ.प्र. सरीखा ही कुछ परिदृश्य राजस्थान, महाराष्ट्र में भी नजर आया। हालांकि उड़ीसा व दक्षिण भारत में भाजपा के बढ़ते जनाधार ने उ.प्र. की शिकस्त की कुछ भरपाई जरूर की।

हालांकि मत प्रतिशत के रूप में देखें तो भाजपा का पूरे देश के स्तर पर मत प्रतिशत पूर्व की तरह ही लगभग 37 प्रतिशत के आस-पास बना हुआ है। इस मामले में कुछ जगह उसका कुछ मत प्रतिशत गिरा जिसकी भरपाई उसने कुछ दूसरे राज्यों में अपना मत प्रतिशत बढ़ाकर कर ली।

विपक्षी इंडिया गठबंधन के साथ-साथ तमाम मोदी विरोधी सुधारवादी बुद्धिजीवी, यूट्यूबर अपनी सफलता के पीछे घोषित कर रहे हैं कि जनता ने संविधान बनाने, 10 वर्ष के शासन में पैदा बेकारी-महंगाई के चलते आक्रोश, साम्प्रदायिक वैमनस्य की राजनीति के खिलाफ मोदी सरकार के विरोध में मत दिया। उनकी यह बात सत्य है पर पूरी तरीके से सच नहीं है।

यह कहना गलत नहीं होगा कि पहली बार उ.प्र. में महंगाई-बेकारी जन्य बदहाली ने जनता को धार्मिक वैमनस्य के ऊपर उठकर सोचने की ओर धकेला। इसके साथ ही मोदी की आरक्षण खत्म करने की साजिशों के विपक्षी भंडाफोड़ ने भी निचली जातियों को सपा-कांग्रेस की ओर धकेला। आरक्षण व संविधान खत्म करने की मोदी की कोशिशों ने दलितों को भी कुछ मात्रा में सपा-कांग्रेस की ओर धकेला।

पर यह भी सच है कि न तो हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य समाज से खत्म हुआ है और न ही जनता अपने जनवादी अधिकारों को कुचलने, संविधान बचाने आदि की चेतना पर खड़ी हुई है। अधिक से अधिक वह महंगाई-बेकारी जन्य गुस्से व आरक्षण छिनने के भय से भाजपा के खिलाफ मत देने की ओर गयी है। आज पूंजीवादी अवसरवादी गठबंधन जनता को जनवादी अधिकारों, धर्म निरपेक्षता की चेतना पर खड़ा कर ही नहीं सकता वह तो कुछ लोक लुभावन नारों से मोदी-शाह की ही तर्ज पर जनता को अपने पाले में लाने की कोशिश कर सकता है। यह चेतना केवल क्रांतिकारी संघर्ष ही पैदा कर सकता है।

चुनाव पश्चात जो तस्वीर उभर रही है उसमें संभावना यही है कि मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री तो बन जायेंगे पर उन्हें अपने गठबंधन के नीतिश-चंद्रबाबू जैसे सहयोगियों को साथ में बनाये रखने के लिए कई मुद्दों पर पीछे हटना होगा या उन्हें ठण्डे बस्ते में डालना होगा। भाजपा के भीतर भी मोदी-शाह की हैसियत पहले सरीखी नहीं रह जायेगी। कुल मिलाकर मोदी-शाह की मनमाने तरीके से सत्ता चलाने की 10 वर्षों की कहानी पर कुछ लगाम लग सकती है। हालांकि वर्चस्व के आदी मोदी-शाह अन्य दलों में तोड़-फोड़ कर पुनः अपना वर्चस्व कायम करने का प्रयास करेंगे। अपने एजेण्डों पर आगे बढ़ने का पुरजोर प्रयास करेंगे।

इसी के साथ जमीनी स्तर पर संघ-भाजपा एक बार फिर तीखा साम्प्रदायिक वैमनस्य पैदा करने की कोशिशें करेंगे। दंगों की नयी श्रंखला पैदा करने की ओर बढ़ेंगे। वे इस बात का पूरा प्रयास करेंगे कि साम्प्रदायिक जहर लोगों के दिलो-दिमाग में बुनियादी मुद्दों से ऊपर स्थापित हो जायें।

विपक्षी इंडिया गठबंधन अपनी हार के बावजूद इस बात पर खुश है कि उसने मोदी-शाह का घमण्ड चूर कर दिया, कि उसने भाजपा को अल्पमत में ला दिया। तमाम वाम व उदारवादी बुद्धिजीवी राहुल गांधी के कसीदे गढ़ रहे हैं। तरह-तरह के अवसरवादियों के दम पर बना यह गठबंधन संघ-भाजपा के फासीवादी आंदोलन का मुकाबला नहीं कर सकता। यह कुछ चुनावी नुकसान तो भाजपा के लिए पैदा कर सकता है पर बीते 10 वर्षों में दक्षिणपंथ की ओर ढुलकी भारतीय राजनीति को पुनः पटरी पर नहीं ला सकता। दरअसल तो इस गठबंधन के सभी दल खुद दक्षिणपंथ की ओर ढुलकते गये हैं। पूंजीपति वर्ग की चाकरी करने वाले ये दल अपने वर्गीय दृष्टिकोण के चलते ही संघ-भाजपा के उस फासीवादी आंदोलन का मुकाबला नहीं कर सकते जिसे बड़ी पूंजी का सहयोग-समर्थन हासिल है। आने वाले दिनों में इंडिया गठबंधन का व्यवहार इस वास्तविकता को जनता के साथ उनसे आस लगाये लोगों के सामने उजागर करता जायेगा।

एक्जिट पोल के दिन शेयर बाजार का चढ़ना व चुनाव नतीजे वाले दिन इसका लुढ़कना दिखाता है कि बड़ी एकाधिकारी पूंजी व संघ का गठजोड़ अभी भी कायम है। बड़े पूंजीपति अभी भी संघ-भाजपा को ही पूर्ण समर्थन दिये हुए हैं। बड़ी पूंजी के मालिकाने वाले मीडिया का मोदी-शाह के प्रति समर्थन भी इसी हकीकत को बयां करता है।

इस चुनाव में जनता ने चुनावी जीत के लिए हर जोड़-तोड़ बैठाने वाले मोदी-शाह के घमण्ड को जरूर तोड़ा है। पर मोदी-शाह को, उनके फासीवादी एजेण्डे को रोकने के लिए यह नाकाफी है। जरूरत है कि इंडिया गठबंधन से करामात की उम्मीदें छोड़़ जमीनी स्तर पर संघी लम्पट वाहिनी के हर हमले का मुकाबला किया जाए। बड़ी पूंजी-मोदी सरकार के हमलों से जूझ रहे मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी आंदोलन को आगे बढ़कर इस संघर्ष का नेतृत्व करना होगा।

कुल मिलाकर इस चुनाव परिणाम ने यह साबित कर दिया है कि मोदी-शाह और उनका फासीवादी आंदोलन चाहे जितना भी मजबूत हो पर अजेय नहीं है। जनता ने इन चुनावों में उनका घमण्ड तोड़ दिया है। आने वाले वक्त में वह संगठित हो इनके फासीवादी मंसूबों को धूल चटाने के साथ पूंजीपति वर्ग की सत्ता को भी उखाड़ सकती है। हां यह सब इंडिया गठबंधन के पीछे चलने से नहीं मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी पहलकदमी से ही संभव होगा।

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