‘‘कहां हमारे राम, कहां इनके राम’’

Published
Thu, 07/16/2026 - 08:51
/kahaan-hamare-ram-kahan-inake-ram

घोटाले कई तरह के होते हैं। ‘आर्थिक घोटाला’, ‘राजनैतिक घोटाला’, ‘न्यायिक घोटाला’, ‘प्रशासनिक घोटाला’, ‘बौद्धिक घोटाला’, ‘साहित्यिक घोटाला’ वगैरह, वगैरह। क्या कोई ये सब घोटाले एक साथ कर सकता है? इस प्रश्न का जवाब कोई भी थोड़ी देर सोचेगा तो बगैर शक के उसका जवाब होगा, हां’’ और उसकी उंगली स्वभाविक तौर पर आज जो सत्ता में बैठे हैं, उनकी ओर उठेगी। 
    
कोई दूसरा यह सवाल पूछे कि क्या कोई ऐसा भी घोटाला हो सकता है जहां ऊपर गिनाये गये सारे घोटाले एक साथ किये गये हों तो कोई भी वैज्ञानिक पद्धति व सत्य का राही थोड़ी देर सोचने के बाद कहेगा, ‘‘हां’’। और उसका इशारा बिना किसी संदेह के उस घोटाले की ओर होगा जिसने आज के शासकों खासकर देश के प्रधानमंत्री को चुप और सिर्फ चुप रहने के लिए मजबूर कर दिया है। और जिस दिन ‘जांच का घोटाला’ पूरा हो जायेगा उस दिन ये मौन धारण किये हुए महाशय पूरी ऊंची आवाज में अपने विरोधियों को नई-नई उपमा व अलंकारों से लांछित करेंगे। यानी घोटाला कोई और करे और उसका इलजाम किसी और के सिर आये। यानी घोटाले को छुपाने के लिए घोटाला किया जायेगा। 
    
आज जिस घोटाले की चर्चा है असल में वह घोटाले से निकला एक घोटाला है। घोटाले की शुरूवात इतिहास के साथ घोटाले से की गयी। और यह घोटाला आज से डेढ़-दो सदी पहले से शुरू हो गया था। ‘घोटाला यह इतिहास के साथ’ किया गया कि जहां बाबरी मस्जिद थी वहां ही भगवान राम का जन्म स्थान था। न कोई प्रमाण, न कोई साक्ष्य बस कुछ सिरफिरों का दावा। और फिर भारत की आजादी के तुरंत बाद ‘प्रशासनिक घोटाला’ किया गया। एक जिलाधीश के सक्रिय सहयोग से बाबरी मस्जिद में एक साजिश के साथ रामलला की मूर्ति को प्रकट करा दिया गया। धूर्त राजनेता, भ्रष्ट प्रशासनिक अधिकारी और षड्यंत्र दर षड्यंत्र करने में प्रशिक्षित संघी कारकूनों ने इस घोटाले को ‘लोकसत्य’ का रूप देने के लिए वह सब कुछ किया जो वह कर सकते थे। झूठ दर झूठ एक कान से दूसरे कान में पहुंचाया गया। 
    
‘प्रशासनिक घोटाले’ में एक राजनीति छुपी थी। ‘लोकसत्य’ का निर्माण करने के लिए भगवान राम की एक खास तरह की छवि गढ़ी गयी। ऐसी छवि जो न तो पौराणिक थी; न धार्मिक थी; न लोक प्रचलित थी; न कबीर के राम की थी; न तुलसी के राम की थी; न सिक्खों के पवित्र ग्रंथ में उचारे गये राम की थी; न बौद्ध पौराणिक ग्रंथों में उकेरे गये राम की थी; न जैन पौराणिक ग्रंथों में प्रचलित राम की थी; न थाइलैण्ड-इण्डोनेशिया आदि देशों में प्रचलित रहे राम की थी। सच्चाई यह है कि यह उन अनुमानित तीन सौ राम कथाओं में से किसी भी राम की नहीं थी। यह छवि शुद्ध-म-शुद्ध उस राम की थी जैसी हिन्दू फासीवादियों- राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ- को अपने हिन्दू राष्ट्र के लिए चाहिए थी। यह हिन्दू फासीवादियों के द्वारा रचा गया ‘राजनैतिक-धार्मिक-ऐतिहासिक-सांस्कृतिक घोटाला था। पिछली सदी के अस्सी के दशक से परवान चढ़ा यह घोटाला संघ नियंत्रित भाजपा के उत्थान का कारण बन गया। सत्ता के लिए बेचैन भाजपा और उसके मार्फत अपने घृणित उद्देश्यों के लिए फासीवादी संगठन संघ ने भगवान राम का ऐसा इस्तेमाल किया कि तुलसी, कबीर गर जिन्दा होते तो वे सिर पकड़कर बैठ जाते। बे-शक-ओ-शुबहा कहते ‘‘कहां हमारे राम कहां इनके राम’’। कबीर तो कहते थे ‘‘दशरथ सुत तिहुं लोक बखाना, राम नाम का मरमु है आना।’’ और तुलसी दास कहते थे ‘‘अगुन सगुन दुई ब्रह्म स्वरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा।’’
    
‘राजनैतिक घोटाले’ के बाद आया ‘न्यायिक घोटाला’। इतिहास कुछ कह रहा है; तथ्य कुछ कह रहे हैं; ऐतिहासिक प्रमाण व साक्ष्य कुछ कह रहे हैं, संविधान में वर्णित न्याय कुछ कह रहा है और फैसला कुछ और हो रहा है। उस वक्त का मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई जो अपनी ही महिला कर्मचारी के यौन उत्पीड़न व उसके ऊपर क्रूर अत्याचार के आरोप में घिरा था वह भगवान राम पर ऐतिहासिक फैसला सुनाता है। फलस्वरूप वह अपने आरोपों से बरी होकर रिटायर होने के बाद सीधे राज्यसभा पहुंच जाता है। 
    
इतने सारे घोटालों के बाद आज राम मंदिर में कोई चंपत राय, कोई मिश्रा, कोई राव कुछ कर भी देता है तो किसी को कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। यह ‘आर्थिक घोटाला’ तो बस एक मूल घोटाले में से निकला एक घोटाला भर है। और अब आगे क्रम जारी रहेगा। पहले ‘जांच घोटाला’ होगा फिर ‘दण्ड घोटाला’ होगा और फिर अपने पाप को छिपाने के लिए ‘पर्दा डालो-मिट्टी डालो’ घोटाला होगा।  

आलेख

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

/titali-effect-kuch-itihaas-se-kucha-vartaman-mein

तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?

/west-asia-ke-sankat-ka-vaishawik-prabhaav

अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं। 

/west-asia-mein-badalata-shakti-santulan-samajhautaa-gyapan-ke-baad-ki-sthiti

अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।