माई लाई से गाजा तक साम्राज्यवादी अत्याचार

/maai-laai-se-gaajaa-tak-saamraajyavaadee-atyaachaara

अमेरिकी सेना लेफ्टिनेंट विलियम कैली जूनियर की अप्रैल 2024 में 80 वर्ष की आयु में मृत्यु हुई थी, वियतनाम युद्ध के दौरान अमेरिकी साम्राज्यवाद के सबसे कुख्यात अपराधों में से एक, माई लाई नरसंहार का नेतृत्व किया। नरसंहार में अमेरिकी सैनिकों ने 504 वियतनामी नागरिकों को मशीनगन से गोली मारी, चाकू से मारा और हथगोले से मारा, जिनमें से लगभग सभी महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग थे जो जवाबी कार्रवाई करने में असमर्थ थे। ऐसी घटनाएं हर साम्राज्यवादी और औपनिवेशिक युद्ध की पहचान हैं।
    
आज गाजा में, लगभग हर हफ्ते एक नया माई लाई आता है, हालांकि आमतौर पर दूर से लांच की गई मिसाइलों, युद्धक विमानों से गिराए गए बमों या फिलिस्तीनी नागरिकों की भीड़ पर टैंक के गोलों द्वारा। इजरायली सैनिक अमेरिका द्वारा आपूर्ति किए गए उन्नत हथियारों का उपयोग करते हैं जो उन्हें दूर से ही बिना किसी दंड के हत्या करने की अनुमति देते हैं। उन्हें चिल्लाते हुए पीड़ितों को खाई में धकेलकर और फिर मशीनगनों से गोलीबारी करके या हथगोले फेंककर अपने हाथ गंदे करने की जरूरत नहीं है।
    
16 मार्च, 1968 को, कैली, जो उस समय सेकंड लेफ्टिनेंट थे, चार्ली कंपनी की अपनी पहली टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे थे, जो कि, माई लाई के गांव में अमेरिकन डिवीजन की एक इकाई थी। उन्होंने अपने सैनिकों को ‘‘खुफिया जानकारी’’ दी थी, कि अधिकांश महिलाएं और अन्य गैर-लड़ाकू लोग गांव से दूर एक स्थानीय बाजार में होंगे, और मुख्य रूप से वियतनामी प्रतिरोध सेनानियों, तथाकथित ‘‘वियतकांग’’ को पीछे छोड़ देंगे, जिन्हें बिना किसी दया के मार दिया जाना था।
    
पलटन को कोई प्रतिरोध सेनानी नहीं मिला, लेकिन फिर भी निर्दयतापूर्वक हत्या शुरू हो गई। उन्होंने परिवारों को जल निकासी खाइयों या बम आश्रयों में इकट्ठा किया, फिर उन्हें हथगोले या मशीनगन की आग से मार डाला। सैनिकों ने कई महिलाओं और लड़कियों को मारने से पहले उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया। खून-खराबे के अंत तक, 504 वियतनामी मारे गए, और एक भी अमेरिकी हताहत नहीं हुआ।
    
सेना ने शुरू में माई लाई में एक बड़ी सैन्य सफलता की सूचना दी, जिसमें 128 दुश्मन लड़ाके मारे गए थे। वियतनाम में अमेरिकी कमांडर जनरल विलियम वेस्टमोरलैंड ने घोषणा की कि अमेरिकी सैनिकों ने वियतकांग को ‘‘भारी झटका’’ दिया है। इस तरह के अत्याचारों के साथ अक्सर इसी तरह के झूठ और डींगें भी चलती रहती हैं।

माई लाई की रिपोर्टिंग ने व्यापक घृणा पैदा की, संयुक्त राज्य अमेरिका में युद्ध-विरोधी आंदोलन को बढ़ावा दिया, पेंटागन को हिलाकर रख दिया और अमेरिकी साम्राज्यवाद की ओर से युद्ध छेड़ने की इसकी क्षमता को स्थायी नुकसान पहुंचाया। 
    
मार्च 1971 में कोर्ट मार्शल का फैसला- अमेरिकी सैन्य इतिहास में सबसे लंबे मुकदमे के बाद- कैली को 22 लोगों की हत्याओं का दोषी पाया गया। उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई, लेकिन केवल तीन दिनों के बाद राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने हस्तक्षेप किया, और अपील लंबित रहने तक उसे घर में नजरबंद कर दिया। बेस कमांडर ने उसकी सजा को घटाकर 20 साल कर दिया। सेना सचिव हावर्ड कैलावे ने 1974 में सजा को घटाकर 10 साल कर दिया, और कैली को अंततः केवल तीन साल की नजरबंदी के बाद रिहा कर दिया गया, जिसके दौरान वह उस बेस पर रहा जहां वह सेवा कर रहा था, कोलंबस, जार्जिया के पास फोर्ट बेनिंग। 
    
माई लाई असाधारण था, अपनी क्रूरता में नहीं, बल्कि अपनी बदनामी में। अमेरिकी सेना ने 1965 से 1973 के दौरान अनुमानतः एक से दो मिलियन नागरिकों को मार डाला, जब बड़ी संख्या में अमेरिकी सैनिक वियतनाम में जमीनी लड़ाई में लगे हुए थे। शोधकर्ताओं के अनुसार, अमेरिकी सैन्य अभिलेखों में सैकड़ों ऐसे बड़े पैमाने पर नरसंहार दर्ज हैं। माई लाई इसलिए अलग था क्योंकि वहां एक युद्ध फोटोग्राफर था और उसने चौंकाने वाली तस्वीरें लीं, क्योंकि प्रत्यक्षदर्शियों ने घटना की मुखबिरी की, और अंततः एक सार्वजनिक जांच और मुकदमे को मजबूर किया।
    
अमेरिकी पूंजीवाद ने माई लाई के बाद से बीते 56 वर्षों में और भी गहरा और घातक चरित्र ग्रहण कर लिया है। डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा अपने प्रशासन के अंतिम वर्ष के दौरान की गई कार्रवाइयों में से एक इराक और अफगानिस्तान में युद्ध अपराधों के लिए दोषी ठहराए गए कई अमेरिकी सैनिकों को क्षमादान देना था, जो विलियम कैली के कार्यों की क्रूरता से मेल खाता था, भले ही हताहतों की कुछ संख्या न हो। ट्रम्प ने उन्हें नायक के रूप में सराहा।
    
और आज, बाइडेन-हैरिस प्रशासन इजरायली सेना को पूरा समर्थन दे रहा है, जिसने माई लाई के पैमाने पर कई नरसंहार किए हैं, उनमें से ज्यादातर अमेरिकी आपूर्ति किए गए बमों और मिसाइलों से दूर से दागे गए, हालांकि कुछ सामूहिक हत्याएं आमने-सामने की गई हैं। दरअसल, ब्रिटिश मेडिकल जर्नल द लैंसेट द्वारा प्रकाशित 5 जुलाई तक गाजा में 1,86,000 की अनुमानित मृत्यु दर के आधार पर, इजरायली सैनिक हर दिन औसतन 680 फिलिस्तीनियों को मार रहे हैं- जो माई लाई में मरने वालों की संख्या 504 से ज्यादा है।        (wsws के लेख पर आधारित) 

आलेख

/peace-bond-vishesh-karyakari-majistrate-v-shakti-prathakkaran-siddhant

शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

/regime-change-or-vyavastha-parivartan

पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

/janavad-ka-sawal-aur-majdoor-varg

मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।