अडाणी परिवार ने प्रासाद मिल मजदूरों के घर उजाड़े

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एक समय था कि जब फैक्टरी, कल-कारखाने लग रहे थे तब मालिकों को बड़े पैमाने पर मजदूरों की जरूरत थी और मजदूर फैक्टरी के आस-पास बस गये और सरकार तथा फैक्टरी मालिक मजदूरों को आवास देने में खर्च से बच गये। श्रम कानूनों में आवास जैसे अधिकारों के चलते कई औद्योगिक शहरों में मजदूरों के रहने के लिए क्वार्टर बनाये गये थे। आज सब क्वार्टरों और बस्तियों को उजाड़ा जा रहा है और खाली करायी भूमि सरकार बड़े-बड़े पूंजीपतियों के हाथों में सौंप रही है।
    
ऐसे ही एक मामला गुजरात के अहमदाबाद के रायखड़ इलाके में प्रसाद मिल मजदूरों की बस्ती उजाड़े जाने का है। 
    
प्रसाद मिल की स्थापना 1914 में हुई थी जो धागे और कपड़े बनाने के लिए मशहूर थी। इसमें 2500 मजदूर कार्यरत थे। लेकिन 1988 में मिल दिवालिया घोषित हो गयी। मिल की शुरुआत हुई थी तब हजारों मजदूर मिल की जमीन पर घर बनाकर रहने लगे थे। आज यह इलाका शहरी क्षेत्र में बदल गया है जिस पर अडाणी परिवार का कब्जा बताया जा रहा है। मिल की जमीन करीब 37,000 वर्ग मीटर में फैली हुई है और पास में एक झील है और एक किमी की दूरी पर किला, कोर्ट, मैट्रो, बस स्टाप और बेशकीमती सरकारी दुकानें हैं। मिल की जमीन की कीमत साढ़े तीन अरब रु. बताई जा रही है। 
    
जब मिल चालू हालत में थी तो हजारों मजदूरों के परिवारों की रोजी-रोटी चल रही थी। लेकिन 1988 में मिल के दिवालिया होने के बाद मजदूरों को सरकार द्वारा उचित मुआवजा जितना मिलना था वो नहीं मिला। अब मजदूरों के लिए अपनी बस्ती ही सहारा थी। लेकिन धीरे-धीरे बस्ती को उजाड़ा जाने लगा। बहुत सारे मजदूरों ने शासन-प्रशासन व स्थानीय गुंडों से तंग आकर बस्ती छोड़ दी है। लेकिन अभी भी 80 परिवार प्रसाद मिल की जमीन पर झुग्गी बना कर रह रहे थे। 
    
27 जुलाई 2025 की सुबह मिल की जमीन पर बसे मजदूरों की बस्ती में पुलिस और बाउंसर दस्तक देते हैं। लोगों के घरों से सामान उठा उठा कर फेंकना शुरू कर देते हैं। ये लोग बुल्डोजर साथ ले कर आते हैं। 18 घरों को तोड़ कर मिट्टी में मिला देते हैं। अधिकतर घर दलित मजदूरों के होते हैं। मजदूरों को उनके घरों से बाहर करने के लिए पुलिस प्रशासन द्वारा क्रूर अमानवीय कृत्य किया गया। बाउन्सर मजदूरों को घरों से घसीट-घसीट कर बाहर निकाल रहे थे। कईयों के बूढ़े मां-बाप बीमार थे। पुलिस और बाउन्सरों ने उन्हें भी नहीं बख्शा। कुर्सी और चारपाई से घसीट कर झुग्गी से बाहर फेंक दिया। टोरेंट पावर नाम की बिजली कंपनी ने बिना कोई चेतावनी दिए बिजली सप्लाई बंद कर दी। नगर निगम ने पीने का पानी बंद कर दिया। अब इन परिवारों के पास न तो ठीक से शौचालय था और न बिजली, न रहने की जगह, क्योंकि बुल्डोजर का पंजा घरों को नोंच रहा था। लोगों ने इस क्रूर कार्रवाई के खिलाफ प्रदर्शन करना शुरू किया तो प्रशासन बीच में आ गया। मजदूर जानना चाहते थे कि ये बुल्डोजर और बाउन्सर किसके भेजे हुए हैं। लेकिन पुलिस ने झूठे मुकदमों में फंसाने की धमकी देकर लोगों की आवाजों को दबा दिया। 
    
24 जनवरी, 2025 से वसंत भाई शांतिलाल अडाणी, शान आनंद जावेरी और ऋषित राजेंद्र कुमार पटेल, प्रसाद मिल के नए निदेशक नियुक्त किए गए हैं तथा वसंत भाई अडाणी गौतम अडाणी के बड़े भाई हैं। शान आनंद जावेरी गुजरात के प्रसिद्ध साराभाई परिवार से संबंध रखते हैं और रियल एस्टेट कारोबारी हैं। ऋषित पटेल का सम्बन्ध भी रियल एस्टेट से है। जबसे इन रियल एस्टेट एलायंस ने डायरेक्टरी पद संभाला है तब से इन नामी गिरामी लोगों की निगाहें मिल की जमीन पर है। 
    
आज देश में करोड़ों लोग किसी तरह अपने आशियाने बना कर रह रहे हैं। सरकार इन गरीब लोगों को उजाड़े जा रही है। और उन जमीनों को पूंजीपतियों को औने-पौने दामों में बेचा जा रहा है। देश के हर नागरिक के लिए घर हो-रोजगार हो, सरकारों के लिए यह न कोई मुद्दा है न कोई योजना। जिन मजदूरों ने शहर बसाये, फैक्टरी-कारखाने खड़े किये वे अब अपने देश में झुग्गियों से भी उजाड़े जा रहे हैं। सरकार व पूंजीपतियों की नजर में ये गरीब लोग इस देश के नागरिक ही नहीं हैं।

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