8 अगस्त को मोगा में पंजाब के दर्जनों जनवादी जनसंगठनों द्वारा आदिवासियों और उनके हितों के लिए संघर्षरत ताकतों के क्रूर कत्लेआम के खिलाफ रोषपूर्ण रैली और प्रदर्शन करके मांग की गई कि आदिवासी इलाकों में ‘‘आपरेशन कागार’’ समेत हर तरह के सैन्य अभियान बंद किए जाएं। झूठी पुलिस मुठभेड़ों समेत हर तरह के ज़ुल्म फौरन रोके जाएं, वहां से सभी पुलिस कैंप हटाए जाएं और पुलिस तथा अर्धसैनिक बल वापस बुलाए जाएं। जल-जंगल-जमीन और खनिज भंडार एकाधिकारी पूंजीपतियों को लुटाने बंद किए जाएं और जनविरोधी आर्थिक माडल खारिज किया जाए। आदिवासियों के खिलाफ ड्रोन और हेलीकाप्टरों से बमबारी बंद की जाए, यूएपीए, अफस्पा समेत सभी काले कानून रद्द किए जाएं। राष्ट्रीय जांच एजेंसी भंग की जाए, गिरफ्तार किए गए जनवादी अधिकार कार्यकर्ताओं को रिहा किया जाए, जन संगठनों और संघर्षों पर लगाई गई पाबंदियां खत्म की जाएं और संघर्ष करने के जनवादी अधिकार बहाल किए जाएं।
इससे पहले, अनाज मंडी में हुई रैली में शामिल किसानों, मजदूरों, नौजवानों, विद्यार्थियों, महिलाओं, प्रगतिशील विचारधारा वालों, जनतांत्रिक अधिकारों के झंडाबरदारों, जनपक्षधर लेखकों, साहित्यकारों, कलाकारों और रंगकर्मियों की विशाल रैली को वक्ताओं ने संबोधित करते हुए कहा कि भारतीय हुक्मरानों की ओर से बस्तर और अन्य आदिवासी इलाकों में लाखों की तादाद में अर्धसैनिक बल झोंककर चलाए जा रहे ख़ूनी अभियानों का एकमात्र मकसद देश के जल-जंगल-जमीन और खनिज भंडार विदेशी और देशी इजारेदार पूंजीपतियों को लुटाना है। सभी जनवादी और मानवीय मांगों को दरकिनार करके ड्रोन और हेलीकाप्टरों से बमबारी से स्पष्ट है कि आदिवासी लोगों और उनके हितों के लिए लड़ रही ताकतों का निर्मम कत्लेआम करके मोदी सरकार यह जंगल खाली कराकर खनन प्रोजेक्टों के लिए इजारेदार पूंजीपतियों के हवाले करने पर तुली हुई है। बड़े पूंजीपतियों की लालची नजर पूरे देश के कृषि और खनिज भंडारों पर है और अगर भारत के मेहनतकश लोग जागरूक होकर इस हमले को रोक नहीं पाते तो देर-सबेर सभी प्रांतों के लोग इस ख़ूनी हमले का निशाना बनेंगे। आदिवासी इलाकों में फैलाए जा रहे कहर का यह सिलसिला पंजाब में भी संघर्षरत ताकतों को निशाना बना रहा है और यहां भी लोगों के संघर्षों के आगे बढ़ने से जनवादी अधिकारों के दमन और सरकारी पाबंदियों ने और भी तीखे ज़ुल्म का रूप धारण करना शुरू कर दिया है। इसलिए वैश्विक कारपोरेट जगत के हितों के लिए छेड़े गए इस हमले के खिलाफ साझे संघर्ष की जरूरत है और यह संयुक्त रैली इस दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।
सभा में लेखक, अनुवादक और जनवादी अधिकार कार्यकर्ता बूटा सिंह महमूदपुर ने प्रस्ताव पेश किए जिन्हें हाथ खड़े करके मंजूरी दी गई और मांग की गई कि आदिवासी इलाकों में आपरेशन कागार और अन्य अर्धसैनिक अभियान बंद किए जाएं। विशेष प्रस्ताव में गाजा में फिलिस्तीनी लोगों के कत्लेआम को रोकने की मांग की गई और फिलिस्तीनी संघर्ष के साथ एकजुटता जताई गई।
मंच का संचालन जगतार कालाझाड़ ने किया। प्लस मंच के जगसीर जीदा समेत कई गायकों ने गीत पेश किए। दलित और मजदूर मुक्ति मोर्चा, आटो रिक्शा यूनियन मोगा और अन्य संगठनों के साथी काफिले के रूप में रैली में शामिल हुए। रैली को पीएसयू (शहीद रंधावा) के नेता होशियार सिंह, कारखाना मजदूर यूनियन के अध्यक्ष लखविंदर सिंह, पीएसयू अध्यक्ष रणबीर सिंह रंधावा, पंजाब खेत मजदूर यूनियन के महासचिव लक्ष्मण सिंह सेवेवाला, जमहूरी अधिकार सभा पंजाब के अध्यक्ष प्रितपाल सिंह, भारतीय किसान यूनियन (डकौंदा) के महासचिव हरनेक सिंह महिमा, इंडियन फेडरेशन आफ ट्रेड यूनियन्स (इफ्टू) के अध्यक्ष कुलविंदर सिंह वडैच, पेंडू मजदूर यूनियन के अध्यक्ष तरसेम पीटर, आपरेशन ग्रीन हंट विरोधी मोर्चा के संयोजक डा. परमिंदर, बीकेयू (क्रांतिकारी) के अध्यक्ष बलदेव सिंह जीरा, क्रांतिकारी किसान यूनियन के प्रेस सचिव अवतार सिंह महिमा, तर्कशील सोसाइटी पंजाब के प्रांतीय अध्यक्ष राजिंदर भदौड़, बीकेयू एकता उग्राहां के अध्यक्ष जोगिंदर सिंह उगराहां, मेडिकल प्रैक्टिशनर्स एसोसिएशन के प्रांतीय अध्यक्ष धन्ना मल गोयल, पूर्व सैनिक क्रांतिकारी यूनियन के जिला अध्यक्ष बलकारन सिंह आदि लोगों ने संबोधित किया।
-विशेष संवाददाता