मुख्य न्यायाधीश की गणेश पूजा में मोदी जी

राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश देश के सबसे प्रमुख संवैधानिक पद ही नहीं बल्कि इस बात के द्योतक हैं कि इन पदों पर बैठे लोगों का आचरण ऐसा होगा कि वह देशवासियों के लिए अनुकरणीय होगा। ऐसा सोचना व कल्पना करना शायद पहले तब भी संभव होता परन्तु अब तो इसकी कल्पना करना भी संभव नहीं है। 
    
धर्म किसी भी व्यक्ति का निजी मामला है और ठीक इसी तरह से जब वह अपने धार्मिक विश्वास के अनुसार पूजा-अर्चना कर रहा होगा तो वह उसका सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं करेगा। सार्वजनिक प्रदर्शन का अर्थ ही है कि वह व्यक्ति अपने परलोक की नहीं बल्कि इहलोक की चिंता कर रहा है। और चाहता है कि उसके धार्मिक प्रदर्शन को आधार बनाकर माना जाए कि वह बहुत ही धार्मिक, नेक आदमी है। और अगर कोई उसके बारे में, उसके द्वारा किये गये कार्यों अथवा उसके द्वारा लिये गये फैसलों पर सवाल उठाता है तो वह सीधे धर्म पर, उसके आराध्य देव पर सवाल उठा रहा है। इस तरह धार्मिक कर्मकाण्डों का प्रदर्शन एक दैवीय आवरण का काम करता है जिसकी आड़ में कुछ भी किया जा सकता है। उल्टा, ‘कुछ भी किये जाओ उसे धर्म के आवरण में छुपाये जाओ’।
    
आखिर मुख्य न्यायाधीश को क्या आवश्यकता है कि वह अपने धार्मिक विश्वास व कर्मकाण्ड का प्रदर्शन करें? और मोदी जी को क्या आवश्यकता है कि वह गर चन्द्रचूड के घर गणेश पूजा में शामिल हुए हैं तो वह अपनी तस्वीर को प्रचारित-प्रसारित करें। वे ऐसा कर के क्या हासिल करना चाहते हैं। क्या वे यह साबित करना चाहते हैं कि वे आपस में मौसेरे भाई हैं। उनके बीच अंतरविरोध ढूंढने वाले नहीं जानते कि वे आपस में किस रिश्ते में बंधे हैं। 

सम्बन्धित लेख

छिपा हुआ संघी

 

आलेख

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

/titali-effect-kuch-itihaas-se-kucha-vartaman-mein

तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?