पुणे में सांप्रदायिक हिंसा

31 जुलाई को महाराष्ट्र के पुणे की दौंड तहसील में स्थित यवत गांव में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी। यवत के ही एक युवक सैयद द्वारा फेसबुक पर शिवाजी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी के बाद लोगों में आक्रोश फैल गया और उन्होंने एक मस्जिद पर हमला बोल कर तोड़ फोड़ की और उसके ऊपर भगवा झंडा लगा दिया। बाइकों को भी आग लगा दी गयी। एक बेकरी में भी आग लगाकर उसे खाक कर दिया गया।

दरअसल मामला 26 जुलाई को उस समय शुरु हुआ जब यवत के नीलकंठेश्वर मंदिर में लगी शिवाजी की मूर्ति के साथ कुछ शरारती तत्वों ने छेड़छाड़ की था। इसके बाद वहां तनाव फैल गया। इस तनाव को आक्रोश में बदलने का काम भाजपा के विधायक गोपीचंद पडलकर और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के विधायक संग्राम जगताप की 31 जुलाई की जन आक्रोश रैली ने किया। इसके बाद शुक्रवार की सुबह सैय्यद ने अपने व्हाट्सप्प स्टेटस पर एक आपत्तिजनक पोस्ट की। इस पोस्ट की खबर लगते ही पुलिस ने सैय्यद को थाने पूछताछ के लिए बुलाया लेकिन तब तक पोस्ट फैल चुकी थी और तनाव सांप्रदायिक हिंसा में बदल गया। मस्जिद में तोड़ फोड़ की गयी और उस पर भगवा लहरा दिया। मस्जिद के रास्ते में पड़ने वाली एक बेकरी जो कि हिन्दू व्यक्ति की थी और जहाँ मुस्लिम कारीगर काम कर रहे थे, में तोड़-फोड़ की और आग के हवाले कर दिया।

इस पूरे प्रकरण में पुलिस और शासन-प्रशासन की घोर लापरवाही सामने आ रही है। जब 26 जुलाई को शिवाजी की प्रतिमा के साथ छेड़खानी हुई और तनाव फैला तब ही इस मामले को शांत करने के प्रयास नहीं हुए। और इसके बाद भाजपा तथा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के विधयाकों द्वारा की गयी जन आक्रोश रैली ने आग में घी का काम किया।

जब भी कहीं ऐसी घटना होती है जिसके कारण किसी लोगों में गुस्सा हो और किसी के आने पर वहां और अशांति की आशंका होती है तब पुलिस और शासन-प्रशासन उसको वहां नहीं आने देते। लेकिन इस बात का ध्यान वहीं रखा जाता है जहाँ लोगों में सरकार, पुलिस या शासन-प्रशासन के खिलाफ गुस्सा होता है। जहाँ बात हिन्दू और मुस्लिम समुदाय के बीच तनाव की आती है वहां ऐसा नहीं होता। वहां भड़काऊ भाषण भी दिये जाते हैँ, रैली भी निकाली जाती हैँ। इससे कहीं न कहीं यह बात पुष्ट होती है कि यह सब जान बूझकर होने दिया जाता है। इससे कहीं न कहीं राजनैतिक लाभ मिलने की संभावना बढ़ जाती है। अब कौन सा राजनीतिक दल इससे फायदा उठाता है यह किसी से छिपा नहीं है।

यह बात आज साफ है कि संघ-भाजपा सांप्रदायिक हिंसा से लाभ उठाते हैं। वे जगह-जगह के अनुसार मुद्दों को सांप्रदायिक हिंसा के लिए इस्तेमाल करते हैं। महाराष्ट्र में वे इसके लिए शिवाजी और औरंगजेब का इस्तेमाल करते हैं। कुछ दिनों पहले छाबा नाम की फिल्म के बाद नागपुर में औरंगजेब की कब्र को खोदने को लेकर विवाद हुआ और हिंसा भड़की। और अब यवत में शिवाजी की प्रतिमा को लेकर विवाद खड़ा हुआ और सांप्रदायिक हिंसा में बदल गया।

यवत हिंसा के बाद सरकार, पुलिस, शासन-प्रशासन सक्रिय हो गये हैं। पुलिस ने फ्लैग मार्च निकालकर शांति की अपील की है। यह तो वही बात हुई कि पहले आग लगने का इंतज़ार करो और जब आग फैल जाये तो उसे बुझाने की अपील करो।

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