पूंजीवादी राज्य और सेना

    कभी-कभार एकाध वाक्य भी उससे ज्यादा उद्घाटित कर देते हैं जितना भाषण-पर-भाषण नहीं कर सकते। थल सेना प्रमुख जनरल रावत का यह वाक्य भी ऐसा ही हैः जनता को सेना से डरना चाहिए। आशय यह था कि यदि जनता सेना से नहीं डरेगी तो सेना कानून-व्यवस्था नहीं बनाये रख सकेगी जिसके लिए उसे अक्सर देश के अलग-अलग हिस्सों में लगाया जाता है। <br />
    पूंजीवादी सरकारें और पूंजीवादी प्रचार माध्यम हमेशा ही यह कहते रहते हैं कि सेना जनता की है। सेना देश की रक्षा के लिए है। सेना के जवान देश के लिए शहीद होते हैं। जब लोग सो रहे होते हैं तो सेना जागकर देश की रक्षा कर रही होती है। इसीलिए जनता द्वारा सेना को प्यार किया जाना चाहिए। उसे सिर आंखों पर बिठाकर रखा जाना चाहिए। उसके बारे में कभी कोई बुरी बात नहीं की जानी चाहिए।<br />
    पर अब इन उपदेशों से अलग जनरल रावत कह रहे हैं कि जनता को सेना से डरना चाहिए। सेना के बारे में असल बात यही है और जैसा कि हमेशा होता है, ऐसी बातें हमेशा तनाव की अवस्था में ही सामने आती हैं। यह बात भी कश्मीर के तनावपूर्ण हालात में बाहर आई है।<br />
    ‘जनता को सेना से डरना चाहिए’। यदि वह नहीं डरेगी तो उसे संगीनों से डराया जायेगा। उस पर तोप से गोले दागे जायेंगे। हवाई जहाज से बम गिराये जायेंगे। महिलाओं-बच्चियों से बलात्कार किये जायेंगे। भारतीय सेना पिछले सत्तर सालों में देश के विभिन्न हिस्सों में यह कर रही है। <br />
    शासक पूंजीपति वर्ग के प्रचार के विपरीत सेना देश की रक्षा के लिए नहीं है। यदि यह देश की रक्षा के लिए है भी तो यह शासक पूंजीपति वर्ग के देश की रक्षा के लिए है। असल में शासक वर्ग की व्यवस्था की रक्षा के लिए है। यह रक्षा उसे देश के बाहरी और भीतरी दोनों शत्रुओं से करनी पड़ती है। देश के बाहर के शत्रु हैं दूसरे देशों के शासक वर्ग तो देश के भीरत के शत्रु हैं शोषित और उत्पीड़ित वर्ग।<br />
    शासक वर्ग हमेशा से ही एक-दूसरे की कीमत पर अपनी सत्ताओं का विस्तार करने की कोशिश करते रहे हैं। इसके लिए उनमें आपस में युद्ध भी होते रहे हैं। पूंजीवादी समाज में साम्राज्यवादियों के बीच इस कारण युद्ध ने बीसवीं सदी में भारी तबाही मचाई। अभी भी उनके द्वारा पचासों पिछड़े मुल्कों में यह तांडव चल रहा है। पर पिछड़े मुल्कों के पूंजीवादी शासक भी उसमें पीछे नहीं हैं। वे अपने से कमजोर देशों के शासकों पर धौंस जमाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। <br />
    पर ये शोषक-शासक तब एकदम चौकन्ने हो जाते हैं जब किसी देश में क्रांति फूट पड़ती है। तब ये अपने मतभेद भुलाकर क्रांति को कुचलने के लिए गठबंधन बना लेते हैं। यह गठबंधन क्रांतिकारी देश के पुराने या प्रतिक्रियावादी शासकों के साथ एका बना लेता है। अब क्रांतिकारी देश के इन प्रतिक्रांतिकारियों की देशभक्ति गायब हो जाती है और वे हरचंद कोशिश करते हैं कि क्रांति कुचल दी जाये। पूंजीवादी क्रांतियों से लेकर अब तक हमेशा यही हुआ है। <br />
    ठीक क्रांति का समय ही अपने क्रांतिकारी संकट और उथल-पुथल के द्वारा हर किसी के असली चरित्र को उद्घाटित करता है। वह दिखाता है कि शोषकों-शासकों की निष्ठा अपने देश के प्रति नहीं होती बल्कि शोषण-शासन की अपनी खास व्यवस्था के प्रति होती है। देशभक्ति के मायने उनके लिए अपनी व्यवस्था तक सीमित हैं। <br />
    कोई भी शोषक-शासक अपनी व्यवस्था की हर कीमत पर रक्षा करना चाहता है। उसकी व्यवस्था को खतरा बाहर के मुकाबले भीतर से ज्यादा होता है। शोषित-शासित वर्ग की ओर से। इससे निपटने के लिए वह हर तरीके की व्यवस्था करता है। सेना इसमें एक प्रमुख साधन है।<br />
    केवल बल प्रयोग के द्वारा ही शोषितों को दबाकर रखा जा सकता है और एक नियमित सेना इस बल का सबसे विकसित रूप है। पूंजीवाद में अन्य चीजों के विकास के साथ सेना का भी विकास होता गया है और अब उसने भीषण रूप ग्रहण कर लिया है। दुनिया के ज्यादातर देशों में सरकार द्वारा शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों के मुकाबले सेना पर बहुत ज्यादा खर्च किया जाता है। सेना समाज के शरीर पर ऐसा कोढ़ है जो बढ़ता ही जा रहा है। <br />
    पूंजीवादी समाज में सेना अपनी संरचना में समाज का अनुकरण करती है। उसकी सारी व्यवस्था पूंजीवादी समाज की तरह श्रेणीगत होती है। इसमें वैसा ही श्रम-विभाजन होता है। सेना में निर्णय लेने के सारे अधिकार अफसरों के पास होते हैं जबकि जवानों को सिर्फ आदेश का पालन करना होता है। आदेश की व्यवस्था  वहां उससे भी कठोरता से लागू होती है जितना पूंजीपति की फैक्टरी में। यहां जनवाद नाम की चिड़िया का कोई काम नहीं होता। <br />
    इस मामले में भारतीय सेना का और भी बुरा हाल है जिसका निर्माण अंग्रेजों के जमाने में हुआ था और जिसकी संरचना और परंपराएं सारी वही हैं। भारतीय समाज की किसी भी संस्था के मुकाबले यहां पिछले सत्तर सालों में परिवर्तन सबसे कम हुआ है। बस अफसरों में गोरी चमड़ी के बदले काली या भूरी चमड़ी आ गयी है। यहां तक कि सहायक के नाम पर जवानों से नौकर का काम कराने की परंपरा भी जारी है। <br />
    सेना में भर्ती समाज के मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग से होती है। जहां मध्यमवर्गीय नौजवान अफसर बनते हैं वहीं निचले हिस्सों के नौजवान सेना में जवान। भारत जैसे पिछड़े देशों में जवान ज्यादातर छोटे-मझौले किसानों से भर्ती होते हैं जबकि विकसित मुल्कों में मजदूरों से। भारत में पिछले सालों में एक अजीब परिघटना देखने को मिली है। जहां सेना में अफसरों के पद खाली रह जा रहे हैं वहीं जवानों की भर्ती के लिए लाखों लोग उमड़ पड़ रहे हैं। यह पिछले तीन दशकों में उदारीकरण के द्वारा किये गये धु्रवीकरण का परिणाम है। जहां मध्यम वर्ग के प्रतिभावान नौजवानों के लिए ज्यादा संभावनाएं पैदा हुई हैं वहीं मजदूर वर्ग के स्तर पर ये संभावनाएं सिकुड़ी हैं। छोटी-मोटी नौकरियां नदारद हो गयी हैं। <br />
    सेना में कोई मुश्किल से ही देश के लिए भर्ती होता है। जहां मध्यमवर्गीय युवक एक अच्छे कैरियर के लिए भर्ती होते हैं वहीं जवान महज एक नौकरी के लिए। देशभक्ति उनके अंदर सेना में प्रशिक्षण के दौरान ठोक-ठोक कर भरी जाती है। अंत में अपनी वर्दी और अपनी रेजीमेंट के लिए वे मरना सीख जाते हैं। <br />
    यह आज्ञाकारी और कठपुतली सेना शासक पूंजीपति वर्ग के लिए खास तौर पर ढाली जाती है। सबसे पहले तो इसे राजनीति से दूर रखा जाता है क्योंकि राजनीति की छूत लग जाने पर तो सेना विघटित हो जायेगी या सेना के अफसर स्वयं शासन संभालने की हसरत पालने लगेंगे। दूसरे, शासक वर्गों में यह अलिखित सहमति होती है कि वे सेना को राजनीतिक संघर्ष में नहीं घसीटेंगे। सेना पर राजनीति नहीं की जायेगी। शासकों में इस बात पर भी सहमति होती है कि सेना पर कभी कोई सवाल नहीं उठाया जायेगा क्योंकि इससे उसका मनोबल गिरेगा। इन सबके चलते स्वयं सेना ऊपर से नीचे तक एक खास मनोवृत्ति में ढल जाती है। समाज के रक्षक की मनोवृत्ति में। इसमें एक खास तरह का अहं पैदा हो जाता है जो सिविलियन के प्रति उनके उपेक्षा भाव में दिखता है। समाज का यह परजीवी तंत्र समाज  से ऊपर अपनी श्रेष्ठता को न केवल मानकर चलता है बल्कि उसे हर जगह स्थापित करने की कोशिश करता है। आये दिन सार्वजनिक स्थलों पर सैनिकों/अफसरों द्वारा दुर्व्यवहार इसी की अभिव्यक्ति है। ऐसा लगने लगता है मानो समाज का अस्तित्व इसी के लिए है। शासक पूंजीपति वर्ग सेना की अपने लिए भूमिका को देखते हुए इस बात को हर संभव तरीके से प्रचारित करता है। सेना मजदूरों-किसानों से न केवल ऊपर बल्कि उनके विरुद्ध खड़ी कर दी जाती है। <br />
    बात केवल यहीं तक सीमित नहीं है। सेना को जनता से काटकर रखने के पूरे बंदोबस्त किये जाते हैं। उसको अलग-थलग छावनियों में रखा जाता है। छावनियों में नागरिकों का प्रवेश निषिद्ध है। सेना को किसी भी उत्पादक गतिविधि से दूर रखा जाता है। नागरिक जीवन में वह केवल आपदा के समय ही प्रवेश करती है। <br />
    इन सबके द्वारा शासक पूंजीपति वर्ग एक खास स्थिति हासिल कर लेता है। मजदूरों-किसानों के बेटे सेना में शामिल होकर एक संगठित ताकत के तौर पर उनके सामने खड़े हो जाते हैं। वे बन्दूक-तोप चलाने वाली एक मशीन में रूपान्तरित हो जाते हैं। परिणामस्वरूप आंतरिक विद्रोहों के समय सेना मजदूर-किसान जनता के खिलाफ उतार दी जाती है। आम तौर पर शासक वर्ग अपने मकसद में कामयाब भी हो जाता है जब सेना क्रूरतापूर्वक व्रिदोहों का दमन कर देती है। <br />
    विद्रोहों में शासक वर्ग को तभी असफलता हाथ लगती है जब विद्रोह पूरे समाज के पैमाने का होता है और उसकी जड़ें गहरी होती हैं। तब सेना के जवान भी उस विद्रोह की भावना से सराबोर हो जाते हैं और सेना का एक हिस्सा टूटकर विद्रोहियों से आ मिलता है। आधुनिक एकीकृत पूंजीवादी राज्य में किसी क्रांतिकारी विद्रोह की सफलता तभी सुनिश्चित हो सकती है जब सेना में भी विद्रोह हो अन्यथा विद्रोह सेना की विशाल ताकत के सामने टिक नहीं सकता। लेकिन तब यह भी उतना ही निश्चित है कि कोई भी आमूलगामी विद्रोह सेना में विघटन और विद्रोह को जन्म देगा ही। <br />
    पूंजीवादी व्यवस्था को समाप्त कर कायम होने वाली समाजवादी व्यवस्था में सेना का बिलकुल ही भिन्न चरित्र होगा। सबसे पहले तो इसकी संरचना पूर्णतया जनवादी होगी। आदेशों की निरंकुश व्यवस्था समाप्त कर दी जायेगा। अफसरों का चयन भी जवान करेंगे। इस सेना में सारा अनुशासन स्वैच्छिक होगा, थोपा हुआ नहीं। यह सेना पूर्णतया राजनीतिक होगी और उसे समाज में हो रहे क्रांतिकारी रूपांतरण से पूरा लगाव होगा। सेना समाज से कटी हुई नहीं होगी और न ही उत्पादन से। सैनिक अभ्यासों के अतिरिक्त उसका समय उत्पादक गतिविधियों में खर्च होगा।<br />
    यह सब होने पर भी सेना समाजवादी समाज पर हावी नहीं होगी क्योंकि वह समाज के क्रांतिकारी रूपांतरण की नेतृत्वकारी शक्तियों के अधीन होगी। जनता द्वारा उस पर भी उसी तरह निगरानी रखी जायेगी जैसे अन्य संस्थाओं पर। <br />
    पूंजीवाद में इन सब बातों की कल्पना नहीं की जा सकती। पूंजीवाद में यह सब संभव नहीं है। इसका सीधा सा कारण है कि शोषण-अन्याय-अत्याचार की पूंजीवादी व्यवस्था में सेना केवल बहुसंख्यक शोषित-उत्पीड़ित जनता के दमन का औजार ही हो सकती है। उसका यह मूलभूत चरित्र उसके अन्य पहलुओं को जन्म देता है। <br />
    लेकिन तब भी पूंजीपति वर्ग इस कटु हकीकत को ढंककर सेना का वह रूप प्रदर्शित करने की कोशिश करता है जिससे जनता भुलावे में रह सके। पड़ोसी देशों के प्रति विद्वेष को भड़काना, सैन्यवादी मानसिकता को प्रोत्साहन, सेना का महिमामंडन, मृत सैनिकों के क्रियाकर्म के समय तड़क-भड़क इत्यादि दसियों तरीके इसके लिए अजमाये जाते हैं। विकसित साम्राज्यवादी देशों से लेकर पिछड़े मुल्कों की सरकारें तक सब यह करती हैं। <br />
    फासीवादी इसमें एक कदम और आगे जाते हैं। अंधराष्ट्रवाद और सैन्यवाद उनकी सोच का अहम हिस्सा है। पड़ोसी देशों से वैमनस्य को वे नफरत और युद्ध तक पहुंचा देते हैं। इसीलिए वे सेना को भी पहले से ज्यादा ऊंचे स्तर पर ले जाते हैं। फासीवादी आंदोलन जहां मध्यमवर्गीय लंपट तत्वों के बल पर आगे बढ़ता है वहीं वह सत्ता में पहुंचकर सेना को युद्ध में झोंक देता है। फासीवाद की विश्व विजय केवल सैन्य अभियान से ही संभव है। <br />
    भारत के संघी हिन्दू फासीवादी भी इस समय इसी प्रवृत्ति का परिचय दे रहे हैं। ‘गौ माता’ के साथ उन्होंने सेना को भी पवित्र गाय बना दिया है। जो इस पवित्र गाय का अपमान करेगा वह दंड भुगतेगा। वह न केवल देशद्रोही ठहराया जायेगा बल्कि संघी लंपटों से लेकर पुलिसिया दमन का शिकार भी होगा। सेना भले ही सारी दुनिया की आंखों के सामने भारतीय संविधान की धज्जियां उड़ाये, उसका समर्थन करना होगा। बलात्कार सहित उसके सारे क्रूर दमन को जायज ठहराना होगा। यह देश की सुरक्षा के लिए जरूरी है। संघियों ने कह दिया तो बस!<br />
    आंतरिक विद्रोहों से रक्षा में सेना शासक वर्ग का अंतिम हथियार है। अंतिम। इसीलिए यह सबसे खतरनाक भी है क्योंकि विद्रोहों के आम रूप धारण करते ही शासक वर्ग की अंतिम घंटी बज जाती है। <br />
    कहीं दूर से इस अंतिम घंटी की आवाज आ भी रही है। <br />

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