पिछले दिनों मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए चले आंदोलन के दौरान दिल्ली पुलिस ने जिस बर्बरता से संघर्ष को कुचला उसकी चैतरफा आलोचना हुई। मोदी सरकार ने 2 अक्टूबर से समूची दिल्ली को धारा 163 (पुरानी धारा 144) के साये में घोषित कर विरोध प्रदर्शन के अधिकार को ही एक तरह से छीन लिया। प्रदर्शनकारियों को लगातार हिरासत में रखने (डिटेन करने) और नेताओं को ‘शांति बांड’ में उलझाने के जरिये सरकार काकरोच पार्टी व अन्य छात्र नेताओं को सड़कों पर प्रदर्शन करने के बजाय कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने में ढकेलने में जुट गयी। डिटेन करने के दौरान छात्रों व छात्राओं के साथ बर्बरतापूर्वक मारपीट कर भय पैदा करने में भी दिल्ली पुलिस जुटी रही।
काकरोच पार्टी के नेता सौरभ दास व आशुतोष रांका इस दौरान पहले शांति बांड के उल्लंघन के आरोप में हफ्ते भर जेल भी काट आये। इस दौरान विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) ने उनकी जमानत लटकाये रखी। विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की इस हरकत पर पूंजीवादी दायरों में एक बहस सी छिड़ गयी कि विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट संविधान की शक्तियों के पृथक्करण की मूल भावना का उल्लंघन कर अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर प्रदर्शनकारियों को तंग कर रहे हैं और उन्हें शांति बांड के जरिये कानूनी तिकड़मों में फंसा रहे हैं। शांति बांड पर हस्ताक्षर करने से इंकार करने वाली नेहा बोरा जब इसके खिलाफ अदालत गयी तो वहां से भी उन्हें कोई राहत नहीं मिली।
गौरतलब है कि विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट एक तरह का अधिकारी या पुलिस अधिकारी होता है जिसे राज्य सरकार कुछ न्यायिक ताकत प्रदान कर देती है। इसके तहत अधिकारी को सार्वजनिक शांति बनाये रखने के नाम पर कुछ निवारक न्याय के अधिकार दे दिये जाते हैं। इनको यद्यपि न्यायाधीशों सरीखे अधिकार नहीं होते पर शांति स्थापना के नाम पर ये शांति बांड भरवा सकते हैं और धारा 163 लागू कर सकते हैं, किसी सार्वजनिक सभा को रुकवा सकते हैं। आम तौर पर एस पी रैंक या ऊपर के अधिकारियों को सरकार इस प्रकार की न्यायिक ताकत प्रदान करती है।
विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट जिलाधिकारियों से अलग होते हैं। जिलाधिकारियों को प्रशासनिक अधिकारों के साथ कुछ मामलों में अर्द्ध न्यायिक अधिकार भी मिले होते हैं। इनके पास आम तौर पर विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सारे अधिकार होते हैं।
भारत में ब्रिटिश शासकों के जमाने में और आजादी के बाद 1973 तक दरअसल न्यायपालिका व कार्यपालिका के कार्यों में स्पष्ट विभाजन नहीं था। पुराने आपराधिक न्याय ढांचे में जिला कलेक्टर व जिला मजिस्ट्रेट एक ही व्यक्ति होता था यानी एक ही व्यक्ति के पास राजस्व वसूलने, कानून व्यवस्था बनाये रखने और मुकदमों की सुनवाई कर सजा सुनाने की शक्तियां थीं। पुलिस व जांच एजेंसियां कार्यपालिका के अधीन थीं और प्रशासनिक अधिकारी ही न्यायधीश की भी भूमिका निभाते थे। जब आजाद भारत का संविधान बना तो भी ब्रिटिश कालीन यह व्यवस्था जारी रही। हालांकि संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में राज्य को निर्देश दिया गया था कि राज्य न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने के कदम उठायेगा। 1973 में नयी दण्ड प्रक्रिया संहिता के तहत यह प्रावधान किया गया कि कार्यपालिका, न्यायपालिका से अलग होगी। 1974 में लागू इस संहिता के तहत आज की व्यवस्था लागू हुई।
मोदी काल में लागू नई आपराधिक संहिताओं में इसे जस का तस लागू रखा गया। 1973 की दण्ड संहिता के तहत कलेक्टर के तमाम न्यायिक अधिकारों को सीमित कर जिला स्तर पर भी न्यायधीशों की व्यवस्था हुई। हालांकि कलेक्टर के सारे न्यायिक अधिकार समाप्त नहीं हुए व शांति स्थापना के नाम पर निवारक न्याय के अधिकार उसके पास बने रहे। 1973 की संहिता में ही राज्य सरकारों को यह अधिकार मिला कि सरकार एस पी स्तर या उच्च पुलिस या समकक्ष प्रशासनिक अधिकारियों को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट बना उन्हें शांति कायम करने के नाम पर कुछ न्यायिक अधिकार दे सकता है। बम्बई-दिल्ली जैसे शहरों में तमाम पुलिस अधिकारियों को यह न्यायिक अधिकार हासिल है।
सौरभ दास-रांका के प्रकरण में इन पुलिस अधिकारियों जिन्हें न्यायिक अधिकार भी हासिल है, की उदारवादी लोगों द्वारा आलोचना की जा रही है कि शांति कायम करने के नाम पर ये कार्यकारी मजिस्ट्रेट बांड भरवा व गिरफ्तार कर, जमानत से इंकार कर अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर रहे हैं। और इस तरह नागरिकों के विरोध के अधिकार का हनन कर रहे हैं। इसी के साथ शक्तियों के पृथक्करण को भारत में मुकम्मल तरीके से लागू न होने का प्रश्न भी उठाया जा रहा है।
शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है। अपनी पुस्तक ‘द स्प्रिट आफ लाॅ’ में मांतेस्क्यू ने यह पृथक्करण का सिद्धांत प्रस्तुत किया। अमेरिका से लेकर तमाम देशों के पूंजीवादी संविधानों में यह सिद्धांत अपनाया गया।
पूंजीवादी दार्शनिक व सिद्धांतकार इस पृथक्करण सिद्धांत को पूंजीवादी जनवाद की आत्मा के बतौर प्रचारित करने लगे। कहा जाने लगा कि महत्तम जनवाद और लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता कायम रखने के लिए तीन क्षेत्रों में शक्तियों का विभाजन जरूरी है।
सामंतवादी व्यवस्था में कुलीन वर्ग या सामंती अभिजात ही सर्वेसर्वा होते थे वे ही कानून बनाने वाले, लागू करने वाले, मुकदमा चला सजा देने वाले होते थे। सामंतवाद से संघर्ष की प्रक्रिया में पहले पूंजीपति वर्ग ने चुनी हुई विधायिका स्थापित करने और बाद में उसे सर्वोच्च शक्ति बनाने की मांग उठायी। हालांकि यह चुनी विधायिका सीमित मताधिकार पर ही कायम हुई थी। बाद में विधायिका-कार्यपालिका-न्यायपालिका की शक्तियों के पृथक्करण के जरिये पूंजीपति वर्ग ने इसे लोकतंत्र व पूंजीवादी जनवाद की जरूरी शर्त सरीखा घोषित कर दिया।
क्या वास्तव में शक्तियों के इस पृथक्करण ने जनवाद को बढ़ाने का काम किया जैसा पूंजीपति वर्ग के चाटुकार दावा करते हैं। दरअसल शक्तियों का यह पृथक्करण पूंजीवादी व्यवस्था के असली स्वरूप पूंजीपति वर्ग की मजदूर वर्ग पर तानाशाही को ही छिपाने का एक जरिया है जिसका जनवाद के विस्तार से कोई लेना-देना नहीं है।
पूंजीवादी व्यवस्था में व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अर्थ पूंजी के मालिकों के लिए व्यवसाय की स्वतंत्रता से अधिक कुछ नहीं होता। वर्गों में बंटे इस समाज में मजदूर वर्ग व पूंजीपति वर्ग की स्वतंत्रता की कोई तुलना ही नहीं की जा सकती है। कानूनन भले ही सार्विक मताधिकार में दोनों एक वोट के मालिक हैं पर व्यवहार में मजदूर उजरती गुलाम के सिवाय कुछ नहीं हैं।
पूंजीवादी राज्य के जरिये ही पूंजीपति वर्ग मजदूर वर्ग व बाकी जनता पर अपनी तानाशाही कायम करता है। ऐसे में स्वतंत्र विधायिका व स्वतंत्र न्यायपालिका की बातें दरअसल पूंजीपति वर्ग जनता को भ्रम में डालने के लिए करता है। दावा किया जाता है कि जनता ही अपने चुने प्रतिनिधियों के जरिये शासन कर रही है।
आम तौर पर तीनों अंग परस्पर सामंजस्य में काम कर पूंजीपति वर्ग के हितों को आगे बढ़ाते हैं। पर जब पूंजीवादी व्यवस्था या राज्य किसी खतरे की अवस्था में होता है (या मामला पूंजीपतियों के मुनाफे का होता है) तो कार्यपालिका सारे नियम-कानून ताक पर रख पूर्ण निरंकुशता की ओर बढ़ जाती है। मजदूर वर्ग के संघर्षों में यह निरंकुशता जब-तब दिखायी देती रहती है। जहां सारे नियम कानून को ताक पर रख राज्य पूंजी के हितों की खातिर मजदूरों का दमन करता पाया जाता है। और अगर मजदूरों का संघर्ष क्रांतिकारी तेवर लिए व्यवस्था को खतरा पैदा कर दे तो निरंकुशता एकदम नग्न रूप में सामने आ जाती है।
ऐसे में शक्ति-पृथक्करण, दरअसल पूंजीपति वर्ग की तानाशाही को छिपाने व जनता को भ्रम में डालने के सिवाय कुछ नहीं है। न तो यह वर्गीय समाज में सारे लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता सुनिश्चित कर सकता है और न जनवाद को बढ़ाता है।
जहां तक प्रश्न जनवाद के विस्तार का है तो मत देने के अधिकार से लेकर तमाम जनवादी अधिकार मजदूर-मेहनतकश जनता ने अपने संघर्षों से हासिल किये हैं। और आगे भी संघर्षों से ही इसे और हासिल किया जा सकता है। पूंजीवादी व्यवस्था चूंकि वर्गों में बंटी व्यवस्था है इसलिए यहां हर जनवादी अधिकार निजी सम्पत्ति से बाधित होता है। ऐसे में जनवाद के और आगे विस्तार की पूर्व शर्त एक ऐसे समाज की स्थापना है जहां निजी सम्पत्ति पर नियंत्रण हो और जो उसके खात्मे की दिशा में अग्रसर हो। ऐसा समाज पूंजीवादी व्यवस्था के खात्मे के जरिये कायम होने वाला समाजवादी समाज ही हो सकता है।
समाजवादी समाज में मजदूर वर्ग सत्ता में होते हुए पूंजीवादी वर्गों पर तानाशाही कायम करता है। वह ऐसा इसलिए करता है ताकि निजी सम्पत्ति पूंजीवादी शोषण के खात्मे की दिशा में समाज को ले जाया जा सके। इसीलिए उसे पूंजीपति वर्ग की तरह दिखावे की जरूरत नहीं होती और वह खुलेआम घोषित करता है कि वह बहुसंख्या की अल्पसंख्या पर तानाशाही है। वह पृथक्करण के सिद्धांत को किनारे रख एक ऐसी कार्यकारी राजकीय मशीनरी की ओर बढ़ता है जहां सभी अंग मजदूर वर्ग के हितों से संचालित होते हैं। जनता द्वारा चुने जाते हैं। इस तरह कायम समाजवादी समाज में बहुसंख्यक जनता महत्तम जनवाद प्राप्त करती है। समाजवादी समाज एक संक्रमण की प्रक्रिया से साम्यवादी समाज की ओर बढ़ता है जहां वर्गों का खात्मा हो जाता है। राज्य का विलोप हो जाता है। जनवाद का अर्थ है बराबरी, और साम्यवादी समाज में चूंकि वर्ग व समस्त गैर बराबरी के रूप खत्म हो जाते हैं इस तरह बराबरी का प्रश्न भी खत्म हो जाता है। जनवाद का भी लोप हो जाता है।
जहां तक प्रश्न फासीवादियों का हैै वे भी राज्य के अंगों के पृथक्करण सिद्धांत पर विश्वास नहीं करते। हिटलर-मुसोलिनी राज्य को सर्वोच्च शक्ति घोषित करते हुए बाकी सभी अंगों को इसके अधीन लाने की बात करते रहे थे। उन्होंने चुनाव-न्यायपालिका सभी को फासीवादी राज्य के मातहत कर लिया था। वे राज्य के आगे सबको अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कुर्बान करने की बातें करते थे। हिंदू फासीवादी भी देश को इसी दिशा में आगे बढ़ा रहे हैं। वे पूंजीवादी व्यवस्था के विभिन्न अंगों में संघी लोगों को बैठा कर अपना एजेण्डा आगे बढ़ा रहे हैं। भविष्य में वे किसी फासीवादी नेता या दल के मातहत सबको करने का फरमान सुना नग्न तानाशाही भी कायम कर सकते हैं।
यहां याद रहे कि फासीवाद भी पूंजीवादी व्यवस्था का ही एक रूप है। पूंजीवादी व्यवस्था के कई रूपों में से एक पूंजीवादी लोकतंत्र को ही शक्तियों की पृथक्कता का सहारा लेना पड़ता है। अन्यथा फासीवाद-सैन्य तानाशाही आदि अन्य रूप किसी एक शक्ति की सर्वोच्चता पर चल कर ही पूंजीपति वर्ग के हित साधते हैं।
इसीलिए आज अपने पुलिस अधिकारियों से जनान्दोलनों का दमन कर रहे हिन्दू फासीवादियों का विरोध करते हुए शक्ति पृथक्करण के झांसे में नहीं आना चाहिए। बल्कि हिन्दू फासीवादियों का विरोध करते हुए उनके पीछे खड़े एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग को सामने लाते हुए जनवाद की रक्षा के साथ-साथ पूंजीवादी व्यवस्था के खात्मे का संघर्ष तेज करना चाहिए। हिन्दू फासीवादियों को जवाब लोकतंत्र की रक्षा के नारे के बजाय इंकलाब के नारों से देना चाहिए।