थामस पिकेटी पूंजीवादी दुनिया के एक मशहूर अर्थशास्त्री हैं। ये अक्सर इसलिए चर्चा में रहते आये हैं कि ये असमानता कम करने, सामाजिक न्याय बढ़ाने आदि लक्ष्यों की चर्चा करते रहे हैं। हाल ही में इन्होंने द टाइम्स आफ इण्डिया की पत्रकार सृजना मिश्रा को एक लम्बा इंटरव्यू दिया। यह इंटरव्यू ‘इंडियाज ग्रोथ एम्बिशन इज वैलिड- 99 प्रतिशत कैन गेट रिचर विदाउट क्लाइमेट डिजास्टर’ शीर्षक के तहत द टाइम्स आफ इण्डिया के 10 जून के चंडीगढ़ एडिशन में छपा।
जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है।
थामस पिकेटी के इन नुस्खों की असलियत पर आने से पहले इन नुस्खों पर एक नजर डाल लेना जरूरी है। संक्षेप में ये नुस्खे इस प्रकार हैं-
1. पिकेटी का ग्लोबल जस्टिस प्रोजेक्ट दुनिया के 200 से अधिक शोधकर्ताओं द्वारा जुटाये आंकड़ों के साथ 45 लेखकों को एक साथ लाता है जो मुख्यतः इस प्रश्न पर कार्यरत है कि ‘‘क्या हमारी ग्रहीय सीमाओं को तोड़े बिना पृथ्वी पर आम खुशहाली संभव है?’’
2. पिकेटी बताते हैं कि यह आम खुशहाली संभव है। वैसे अगर वैश्विक दक्षिण खासकर भारत खुशहाली के उस स्तर पर पहुंचने की इच्छा त्याग दे जिस पर वैश्विक उत्तर पहुंचा हुआ है तो दुनिया को 2डिग्री सेन्टीग्रेड की तापमान वृद्धि के दायरे में रखना संभव है। पर वैश्विक दक्षिण इस स्थिति को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होगा। ऐसे में सबकी खुशहाली का रास्ता क्या हो सकता है? आज उप सहारा अफ्रीका की प्रति व्यक्ति आय 300 यूरो से कम, दक्षिण एशिया की 700 यूरो और उत्तरी अमेरिका की 5000 यूरो है। यानी प्रति व्यक्ति आय में भारी अंतर है। अब अगर वैश्विक खुशहाली हासिल करनी है तो 2100 तक सभी देशों की प्रति व्यक्ति आय 5000 यूरो तक पहुंचानी होगी। ऐसा तभी संभव है जब वैश्विक उत्तर की प्रति व्यक्ति आय जरा भी न बढ़े और वैश्विक दक्षिण की तेजी से बढ़े। ऐसा पिकेटी के अनुसार 3 कदम उठा कर किया जा सकता है।
3. पहला कदम यह है कि जीवाश्म ईंधनों को प्रतिबंधित करना होगा और कम कार्बन उत्सर्जन वाली ऊर्जा अपनानी होगी। यानी अगले 2-3 दशकों तक वायु टर्बाइन, सोलर पैनल आदि में भारी निवेश करना होगा। दूसरा अभी से उत्पादन व उपभोग के सेक्टरों पर नये सिरे से सोचना होगा। इन्हें पर्याप्तता के एक-एक निश्चित स्तर पर जाकर रुक जाना होगा। मैन्युफैक्चरिंग, निर्माण व मटीरियल सेक्टर के विकास को कहीं न कहीं रुकना होगा। भारत जैसे देशों में ये अभी काफी बढ़ेंगे पर विकसित देशों में इन्हें शीघ्र ही रुक जाना होगा क्योंकि हर व्यक्ति के पास 10 आईफोन होने की कोई जरूरत नहीं है। ऐसे में सकल घरेलू उत्पाद का कुछ हिस्सा नान मटीरियल क्षेत्र यानी शिक्षा-स्वास्थ्य आदि में लगाना होगा। इन क्षेत्रों में कार्बन उत्सर्जन भी काफी कम है। यानी अमीर होते जाने के साथ देशों को मैटेरियल से इम्मैटेरियल सेक्टर की ओर बढ़ना होगा। इससे जलवायु संतुलन व सामाजिक कल्याण को बल मिलेगा। इसी के साथ रेड मीट खाना कम करना होगा क्योंकि यह बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई पैदा करेगा।
तीसरा काम है असमानता में कमी। आज दुनिया के निचले आधे हिस्से के पास दुनिया की सिर्फ 2 प्रतिशत दौलत है। इसे बदलने के लिए एक वल्र्ड सावरेन फण्ड के हिस्से के तौर पर अरबपतियों पर हर वर्ष 20 प्रतिशत ग्लोबल वेल्थ टैक्स लगाना होगा। इसी तरह दुनिया के पूंजीगत स्टाॅक पर 10 प्रतिशत ग्लोबल इनकम टैक्स लगाना होगा। इन दोनों टैक्सों का असर शीर्ष 1 प्रतिशत आबादी पर पड़ेगा। इस धनराशि का उपयोग पहले व दूसरे कदमों में बताये बिन्दुओं की पूर्ति के लिए किया जायेगा। इससे काम के घण्टे कम किये जायेंगे, शिक्षा-स्वास्थ्य पर खर्च बढ़़ाया जायेगा, विद्युतीकरण, कार्बन उत्सर्जन कम करने आदि पर ध्यान दिया जायेगा।
4. यह पूछे जाने पर कि दुनिया के अरबपति खुद पर टैक्स लगाने को क्यों राजी होंगे जबकि तमाम देशों में राजनीति व नेताओं को वे ही नियंत्रित करते हैं। पिकेटी का कहना था कि लोकतांत्रिक ताकतों के आगे उन्हें झुकना ही होगा। नेताओं को अगर नीचे के 90 प्रतिशत लोगों का समर्थन चाहिए तो उन्हें नीचे के आधे हिस्से की आय बढ़ाने की रणनीति अपनानी होगी। जैसे 20वीं सदी में सब जगह आय कर आम होता गया वैसे ही 21वीं सदी में प्रगतिशील सम्पत्ति कर आम होता जायेगा। फ्रांसीसी क्रांति के वक्त अमीर लोग अपने खास अधिकार खत्म होते नहीं देखना चाहते थे। बाद में उपनिवेशवादी ताकतें नहीं चाहती थीं कि भारत-अफ्रीका आजाद हों। पर लोकतांत्रिक संघर्षों से इतिहास में यह सब हुआ। इस तरह काम के घण्टे कम करने पर अमीर कभी सहमत नहीं होते हैं पर इतिहास में ये कम किये गये और आगे इन्हें और कम करने की जरूरत है। लोगों को अपने लिए अधिक अवकाश का समय मिलना ही चाहिए।
5. इसके बाद पिकेटी बताते हैं कि अतीत में इन कामों के लिए बड़े राजनीतिक-सामाजिक संघर्ष हुए पर आज पर्यावरण संतुलन की खातिर अमीरों-अमीर देशों को इस सब पर राजी होना होगा। अगर हर कोई आज के स्तर से दोगुना अमीर हो जाये तो पृथ्वी का तापमान 4 डिग्री सेंटीग्रेड से ज्यादा बढ़ जायेगा। जो कि भारी जलवायु असंतुलन पैदा कर देगा। अतः अमीरों के हित में भी यही है कि सारी दुनिया 1.8 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान वृद्धि व 5000 यूरो प्रति व्यक्ति आय पर रहे।
6. पिकेटी के अनुसार दुनिया को ग्लोबल अमीरी से ग्लोबल लोकतंत्र की ओर बढ़ना होगा। अमीर देशों के लिए वर्चस्वकारी वोटिंग अधिकार वाली वैश्विक संस्थायें विश्व व्यापार संगठन, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक इसके लिए अनुपयुक्त है। इसके लिए लोकतांत्रिक संस्थायें सबके समान अधिकार व भागीदारी वाली होनी चाहिए। 2024 के जी-20 समिट में ब्राजील, द.अफ्रीका ने ग्लोबल वेल्थ टैक्स की मांग उठायी थी ये मांग मजबूत की जानी चाहिए।
7. अंततः पिकेटी का कहना है कि पर्यावरण रक्षा की खातिर उत्तर के अमीर देशों को दक्षिण के गरीब देशों को संसाधन हस्तांतरित करने होंगे। यह प्रकारान्तर से पर्यावरण को उनके द्वारा किये नुकसान, उपनिवेशीकरण, गुलामी का मुआवजा भी होगा। दुनिया में दक्षिण के देशों की बढ़ती अर्थव्यवस्था के चलते उत्तर के अमीर देशों को उनकी बात एक न एक दिन सुननी ही होगी।
पिकेटी की उपरोक्त परियोजना दिखाती है कि या तो उन्होंने साम्राज्यवादी दुनिया को जरा भी नहीं समझा है या फिर वे खुद साम्राज्यवादी देश के अर्थशास्त्री होने के नाते गरीब देशों व उनकी गरीब जनता को बेवकूफ बनाने के अभियान पर निकले हुए हैं।
पिकेटी की उपरोक्त अवधारणा में पर्यावरण असंतुलन का खतरा वर्ग संघर्ष व वर्ग हितों से ऊपर हो गया है। इसीलिए वे मनमाने तरीके से उनके सुझाये 3 कदमों (जीवाश्म ईंधनों को प्रतिबंधित करना, शिक्षा-स्वास्थ्य पर अधिक खर्च व ग्लोबल वेल्थ टैक्स) पर दुनिया के चलने की कल्पना कर लेते हैं।
वास्तविकता पिकेटी की सोच के एकदम उलट है। बाकी वर्गीय समाजों की तरह पूंजीवादी व्यवस्था भी वर्गों वाली व्यवस्था है यहां पूंजी का मालिक पूंजीपति वर्ग शासक वर्ग होता है तो मजदूर वर्ग उसका उजरती गुलाम। मजदूर वर्ग का शोषण करके ही पूंजीपति अमीर से अमीर होता जाता है। वैश्विक पैमाने पर जब मुक्त प्रतियोगिता एकाधिकार में तब्दील हो गयी तो दुनिया साम्राज्यवाद के दौर में प्रवेश कर गयी। जिसके तहत चंद साम्राज्यवादी देशों के पूंजीपतियों ने न केवल अपने देश के मजदूरों का शोषण करना जारी रखा बल्कि दुनिया के बाकी गरीब पिछड़े देशों की जनता के शोषण-लूट से भी अपना मुनाफा बढ़ाया। इसकी खातिर साम्राज्यवादी देशों ने गरीब देशों को उपनिवेश बना लिया। उनकी शासन-सत्ता पर कब्जा कर उनका क्रूर निर्मम शोषण शुरू कर दिया।
जब जर्मनी-इटली-अमेरिका सरीखे नये साम्राज्यवादी देश सामने आये तो उपनिवेशों के पुनर्बंटवारे के लिए ये दुनिया को दो-दो बार भीषण साम्राज्यवादी विश्व युद्धों में घसीट कर ले गये जिसमें करोड़ों लोग मारे गये।
खुद जिस लोकतांत्रीकरण की ताकत की चर्चा पिकेटी करते हैं वह कोई पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा जनता को खैरात में नहीं मिली बल्कि मजदूर वर्ग व उत्पीड़ित जनता ने पूंजीपति वर्ग से इसके लिए इंच दर इंच संघर्ष लड़ा। इस संघर्ष के परिणामस्वरूप ही मजदूर वर्ग ने वोट देने के अधिकार से लेकर तरह-तरह के कानूनी अधिकार प्राप्त किये।
इस वर्ग संघर्ष के ही आगे बढ़ने पर पहले पेरिस कम्यून व फिर सोवियत समाजवादी क्रांति के जरिये मजदूरों ने पूंजीपतियों का तख्तापलट कर समाजवादी समाज की स्थापना की। मजदूर वर्ग ने व्यवहार में दिखा दिया कि पूंजीपति वर्ग और उसकी व्यवस्था के नाश व समाजवादी व्यवस्था की स्थापना से ही वास्तविक खुशहाल दुनिया की राह खुल सकती है।
समाजवादी सोवियत संघ के सहयोग समर्थन से ही दुनिया में राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों की आंधी पैदा हुई। साम्राज्यवादियों को दुनिया की मजदूर-मेहनतकश जनता ने पीछे हटने को मजबूर कर दिया। एशिया-अफ्रीका लातिन अमेरिका के गुलाम देश एक-एक कर आजाद होते गये।
पर इन आजाद हुए देशों को बदले तौर-तरीकों से अपने चंगुल में लेने व उनके शोषण उत्पीड़न के साम्राज्यवादी षड्यंत्र बदस्तूर जारी रहे। पहले नव उपनिवेश बना इन गरीब मुल्कों को लूटा-खसोटा गया। जब जनता ने साम्राज्यवादियों को और पीछे धकेला तब साम्राज्यवादी आज की आर्थिक नव औपनिवेशिक दुनिया कायम करने को मजबूर हुए जहां वे पूंजी के निर्यात, पूंजी निवेश, उन्नत तकनीक के जरिये अपनी लूट बदस्तूर बनाये हुए हैं। गरीब देशों की राजनैतिक स्वतंत्रता पर वे जब तब दबाव कायम करते रहते हैं। और ‘बदमाश’ देशों को युद्धों-हमलों से सबक सिखाने को तैयार रहते हैं।
ऐसे में यह संभव नहीं कि पिकेटी पिछली डेढ़-दो सदी के मजदूर संघर्षों के इतिहास से अपरिचित हों। यह भी संभव नहीं कि वे रूस, चीन के समाजवादी समाजों से अपरिचित हों। फिर ऐसा क्यों है कि वे खुशहाली का रास्ता पूंजीवाद-साम्राज्यवाद का नाश करने वाली समाजवादी क्रांति के बदले अपने नीम हकीमी नुस्खों में बताते हैं।
इसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि पिकेटी खुद एक साम्राज्यवादी अर्थशास्त्री हैं। यानी वे पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के पैरोकार हैं। वे अपना स्वर्ग पूंजीवादी व्यवस्था में ही देखते हैं। समाजवाद तो उनके लिए पिछली सदी में पैदा हुई एक आपदा मात्र थी। ऐसे में जब वे दुनिया को खुशहाली की राह दिखाना सोचते हैं तो भी वे साम्राज्यवादी अर्थशास्त्री की हैसियत से ही दुनिया को देखते हैं। वे दुनिया में बढ़ती असमानता से परेशान होते हैं पर वे इसलिए परेशान नहीं होते कि उन्हें मजदूर-मेहनतकश जनता की दुख तकलीफ से कुछ संवेदना है। वे इसलिए परेशान होते हैं कि यह बढ़ती असमानता दुनिया को विस्फोटक स्थिति तक ले जा सकती है। यह पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था के अंत यानी उनके स्वर्ग के खात्मे की ओर भी ले जा सकती है। ऐसे में पूंजीपति वर्ग के आदर्श चाकर होने का फर्ज पूरा करते हुए वे इस असमानता को कुछ कम कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था को बचाये रखना चाहते हैं।
पिकेटी पर्यावरण बचाने व वैश्विक असमानता कम करने के नाम पर जो नुस्खे पेश करते हैं, उन पर दुनिया के पूंजीपति खुशी-खुशी चलने लगेंगे, यह भोली इच्छा पाल कर बैठ जाते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि जीवाश्म ईंधनों की खातिर अमेरिका-ईरान युद्ध चल रहा है। मैन्युफैक्चरिंग सीमित करने व ग्लोबल वेल्थ टैक्स पर चलने को साम्राज्यवादी पूंजीपति वर्ग को कभी राजी नहीं किया जा सकता। अगर वह ऊंची तकनीक आधारित मैन्युफैक्चरिंग-निर्माण त्याग देगा तो भला उसकी साम्राज्यवादी पूंजीपति की हैसियत कैसे बचेगी। वैसे पिकेटी यह देखना नहीं चाहते कि दरअसल तो साम्राज्यवादी पूंजी का बड़ा हिस्सा पहले ही मैन्युफैक्चरिंग-निर्माण से बाहर तरह-तरह की सट्टेबाजी व वित्तीय कारोबार में लग रहा है। हालांकि इससे भी पूंजीपति अपनी पूंजी बढ़ाने में जुटे हैं। पूंजीपति पहले ही अपने पर लगे तमाम सरकारी करों की अदायगी से बचते रहे हैं; उनकी चाकर सरकारें उन पर लगे कर माफ करती रही हैं, ऐसे में ग्लोबल वेल्थ टैक्स का शिगूफा भला कैसे व्यवहार में उतर सकता है।
दरअसल आज पर्यावरण के प्रश्न पर साम्राज्यवादी व गरीब मुल्कों में मचे झगड़े में साम्राज्यवादियों के पक्ष में खड़े होकर पिकेटी गरीब देशों को झूठी समृद्धि का रास्ता परोस रहे हैं। वास्तविकता यही है कि साम्राज्यवादी देशों का बीते 100 वर्ष का विकास समूचे कार्बन उत्सर्जन व बढ़ते वैश्विक तापमान के लिए जिम्मेदार है। ऐसे में जब साम्राज्यवादी तीसरी दुनिया के देशों पर कार्बन उत्सर्जन कम करने का दबाव बनाते हैं तो गरीब देश इसका विरोध करते हैं व इसके एवज में मुआवजे की भी कुछ देश मांग करते हैं। पिकेटी ग्लोबल वेल्थ टैक्स के रूप में कुछ मुआवजा देकर गरीब देशों को शांत करना चाहते हैं और चाहते हैं कि साम्राज्यवादी देशों की इच्छानुरूप ये देश कार्बन उत्सर्जन बंद कर दें।
इस तरह दरअसल पिकेटी का गरीब मुल्कों की खुशहाली का ख्वाब साम्राज्यवाद की पैरोकारी में बदल जाता है। पिकेटी नहीं चाहते कि उत्पीड़ित देश साम्राज्यवादियों के चंगुल से मुक्त हों। इसलिए वे ऐसी लोकतांत्रिक वैश्विक संस्थाओं की बात करते हैं जिसमें भागीदारी की आड़ में साम्राज्यवादियों का शोषण छिप जाये। इस तरह पिकेटी कुछ असमानता कम कर, लोकतांत्रिक वैश्विक संस्थाओं के जरिये मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था को बचाने के चिंतक बन जाते हैं।
दुनिया भर का वर्ग सचेत मजदूर वर्ग पिछली सदी के अनुभवों से जानता है कि उसकी खुशहाली पिकेटी के नीम हकीमी नुस्खों से नहीं आने वाली। उसकी खुशहाली का रास्ता पूंजीवाद-साम्राज्यवाद विरोधी समाजवादी क्रांति से होकर गुजरता है। समाजवादी क्रांतियों की नई श्रंखला की शुरूवात से गुजरता है।