प्रचार और हकीकत

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भारत-पाकिस्तान के बीच छोटी सी सैनिक झड़प ने देश की हिंदू फासीवादी सरकार के कई दावों की पोल खोल दी। इसमें सामरिक और राजनयिक दावे सभी थे। सामरिक तौर पर जहां कमजोर और छोटा सा पाकिस्तान भारत के बराबर का साबित हुआ वहीं राजनयिक तौर पर भारत पाकिस्तान के मुकाबले ज्यादा अलग-थलग नजर आया। जहां तुर्की और चीन जैसे देश खुलकर पाकिस्तान के साथ नजर आए वहीं भारत के साथ केवल बदनाम तालिबान और इजराइल ही नजर आए। भारत के साथ ना तो अतीत का ‘अजीज’ मित्र रूस था और न वर्तमान का ‘अजीज’ अमेरिका।
    
दुनिया भर में राजनयिक तौर पर भारत का अलग-थलग पड़ना हिंदू फासीवादी सरकार के लिए भी भारी पड़ रहा है। इसलिए उसने मन मारकर सांसदों के प्रतिनिधिमंडल सारी दुनिया में भेजने का फैसला किया जो सब जगह जाकर भारत का पक्ष समझाने का प्रयास करेंगे। हालांकि इसमें भी इस सरकार ने अपनी फितरत के अनुरूप भांजी मारी और कांग्रेस पार्टी द्वारा प्रस्तावित उसके चार सांसदों के बदले शशि थरूर को शामिल कर दिया जो आजकल मोदी के खासे मुरीद हुए पड़े हैं। 
    
दुनिया भर में भारत की यह गत कैसे हुई? मोदी एंड कंपनी तो एक लंबे समय से यह प्रचारित कर रहे हैं कि दुनिया भर में मोदी का डंका बज रहा है। कि भारत यानी मोदी या तो विश्व गुरू बन चुके हैं या बस बनने ही वाले हैं। फिर संकट की घड़ी में कोई देश भारत के साथ खुलकर क्यों नहीं आया। पुरानी कहावत है कि शत्रु-मित्र की पहचान संकट की घड़ी में ही होती है। वर्तमान संकट की घड़ी ने क्या बताया? यही कि भारत दुनिया भर में मित्र विहीन है। 
    
इसका कारण दूरगामी भी है और वर्तमान संकट भी। पहले वर्तमान पर बात कर लें।
    
पहलगाम में आतंकवादी हमले के तुरंत बाद ही भारत सरकार ने यह कहना शुरू कर दिया कि यह मामला पाकिस्तान प्रायोजित है। लेकिन ऐसा करते हुए उसने कोई सबूत नहीं दिया। जब पाकिस्तान सरकार ने इस मामले में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर निष्पक्ष जांच कराने की मांग की तो भारत सरकार दाएं-बाएं करने लगी। इससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह संदेश गया कि भारत सरकार के आरोप बेबुनियाद हैं। ऊपर से पाकिस्तान सरकार ने यह आरोप लगा दिया कि इस हमले में स्वयं भारत सरकार का हाथ है। यह आरोप भले ही उतना ही बेबुनियाद हो पर इसने भारत के दावों को कमजोर ही किया।
    
ऐसे में जब इसी आरोप की बुनियाद पर भारत ने पाकिस्तान पर हमला किया तो दुनिया में कोई भी देश भारत के साथ नहीं खड़ा हो सकता था खासकर तब जब इस झड़प के अनियंत्रित होकर परमाणु युद्ध तक जा पहुंचने का खतरा हो। भारत सरकार ने चाहे जितना कहा हो कि उसने तो बस पाकिस्तान स्थित आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाया था पर असल में यह पाकिस्तान की सम्प्रभुता पर हमला था और दुनिया के सभी देशों ने इसे इसी रूप में लिया। भारत सरकार पाकिस्तान पर हमले को पहलगाम की घटना से जोड़कर जायज ठहरा सकती थी पर दुनिया में कोई इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं था। 
    
इसी के साथ आतंकवाद के मामले में भी भारत सरकार का पक्ष महज पाखंड दिख रहा था। पाकिस्तान में हो रही आतंकवादी घटनाओं में, खासकर बलूचिस्तान में भारत सरकार का हाथ होने का आरोप पाकिस्तान सरकार बराबर लगा रही है। दुनिया की नजरों से यह बात छुपी नहीं है। ऊपर से भारत सरकार द्वारा कनाडा और अमेरिका तक में गुपचुप हत्या कराने के प्रयास ने इसे और पाखंडी साबित कर दिया है। दुनिया भर की नजरों में भारत उतना मासूम नहीं है। 
    
दूरगामी तौर पर बात करें तो भारत सरकार ने दशक भर में न केवल अपने सभी पड़ोसी देशों से रिश्ते खराब किए हैं बल्कि अमेरिका-इजराइल से जिस तरह के रिश्ते विकसित किए हैं यह दुनिया भर में उसकी साख को गिराने वाला है। इजराइल के साथ नाभिनालबद्ध होकर कोई देश खुद को आतंकवाद का शिकार होने की मासूमियत नहीं दिखा सकता। रही बात अमेरिकी साम्राज्यवादियों से सटने की तो इस पर जितना भी कहा जाए कम ही होगा। दुनिया भर में तबाही ढाने वाले अमेरिकी साम्राज्यवादी बस अपने हितों के बारे में सोचते हैं। इस्तेमाल कर फेंकने की उनकी पुरानी फितरत है। 
    
वर्तमान भारत-पाक झड़प ने एक झटके से विश्व गुरू की पोल खोल दी है। अब यथार्थ से आंखें चार करने का समय आ गया है।
 

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