साम्राज्यवाद

युद्धों, नरसंहारों के बीच दुनिया में बदलते हालात

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रूस की सेनायें यूक्रेन में लगातार हमला करते हुए आगे बढ़ रही हैं। वे कुर्स्क और बोल्दगरोया में यूक्रेनी सेना को मुख्यतः पीछे धकेल चुकी हैं। अब वे यूक्रेन के सुमी, खारकोव और

अमरीका और रूस के बीच यूक्रेन की बंदरबांट

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अमरीकी साम्राज्यवादियों के लिए यूक्रेन की स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखण्डता कभी भी चिंता का विषय नहीं रही है। वे यूक्रेन का इस्तेमाल रूसी साम्राज्यवादियों को कमजोर करने और उसके टुकड़े करने के लिए कर रहे थे। ट्रम्प अपने पहले राष्ट्रपतित्व काल में इसी में लगे थे। लेकिन अपने दूसरे राष्ट्रपतित्व काल में उसे यह समझ में आ गया कि जमीनी स्तर पर रूस को पराजित नहीं किया जा सकता। इसलिए उसने रूसी साम्राज्यवादियों के साथ सांठगांठ करने की अपनी वैश्विक योजना के हिस्से के रूप में यूक्रेन से अपने कदम पीछे करने शुरू कर दिये हैं। 
    

टैरिफ युद्ध और ऑटो उद्योग

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बीते दिनों अमेरिका की ट्रम्प सरकार ने विदेशी निर्मित कारों पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी। ट्रम्प की इस घोषणा से वैश्विक आटो उद्योग में उथल-पुथल मच गयी है। लगभग

गाजापट्टी में इजरायल द्वारा जारी नरसंहार और इजरायली सत्ता का संकट

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इजरायल की नेतन्याहू की सरकार ने युद्ध विराम को समाप्त करके गाजापट्टी में नरसंहार फिर से शुरू कर दिया है। उसने युद्ध विराम के पहले के समझौते को दूसरे चक्र में आगे बढ़ाने से

‘‘उदार लोकतंत्र’’ का लोकतंत्र विरोधी असली चेहरा

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पूर्वी यूरोप का एक देश रोमानिया है। वहां के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जार्जेस्क्यू को चुनाव लड़ने से रोक दिया गया है। वे धुर दक्षिणपंथी हैं। इसके पहले वे चुनाव में जीत की

गाजापट्टी में युद्ध विराम क्या जारी रहेगा?

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अमरीकी राष्ट्रपति द्वारा गाजापट्टी से फिलिस्तीनियों को उजाड़कर कहीं दूसरे देशों में बसाने की योजना को पलीता लगने के बाद अब अमरीकी साम्राज्यवादी सीधे हमास के साथ वार्ता करन

अमरीका-यूक्रेन वार्ता से ठीक पहले रूस पर यूक्रेन के ड्रोन हमले

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यूक्रेन ने रूस के भीतर अब तक के सबसे बड़े ड्रोन हमले किये हैं। रूस का कहना है कि उसकी वायु रक्षा प्रणालियों ने 337 ड्रोनों को मार गिराया है। इसके बावजूद, राजधानी मास्को और

असली अमेरिका कौन है? -मदन मोहन पाण्डेय

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किसी एशियावासी के आगे यदि कोई अचानक ‘अमेरिका’ शब्द का उच्चारण करे तो अधिक संभावना यही है कि उसके दिमाग में पहले संयुक्त राज्य अमेरिका का नक्शा उभरेगा- दुनिया का महाबली दे

कलह के बाद अब सांठगांठ

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अमेरिका, रूस को साधने के बाद यूरोप के देशों से अपनी ही शर्तों पर सौदेबाजी करना चाहता है। यूरोप के देशों के पास सीमित विकल्प हैं इसलिए वे ट्रम्प के जाल में फंसने को मजबूर हैं। वे इस स्थिति में नहीं हैं कि अमेरिकी साम्राज्यवादियों से खुली टक्कर ले सकें। फिलवक्त रूसी साम्राज्यवादियों खासकर पुतिन के दोनों हाथों में लड्डू हैं। और अमेरिकी साम्राज्यवादी इस मंसूबे को पाल रहे हैं कि उनका दुनिया में वर्चस्व इस तरह से कायम रहेगा। 

आलेख

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?

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अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।