‘आत्मनिर्भर भारत’ और हिन्दू फासीवाद
पिछले 12 साल से हिंदू फासीवादी सत्ता पर हैं। इस दौरान लगातार ही भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए तमाम दावे और बातें इन्होंने की हैं। इन्होंने मेक इन इंडिया का नारा भी भारत
पिछले 12 साल से हिंदू फासीवादी सत्ता पर हैं। इस दौरान लगातार ही भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए तमाम दावे और बातें इन्होंने की हैं। इन्होंने मेक इन इंडिया का नारा भी भारत
मोदी सरकार द्वारा 2014 में सत्ता में आने के बाद से जिस तेजी के साथ उदारीकरण-निजीकरण की जन विरोधी नीतियों को आगे बढ़ाया गया है, उसके परिणामस्वरूप केंद्र सरकार के विभिन्न वि
भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में अनर्गल डींगे हांकने वाली संघी मशीनरी इतने खुशनुमा दावे करती रहती है कि जनता तो क्या पूंजीपति वर्ग भी उन पर भरोसा करने से इंकार करता रहा है
10 जून को कोलंबिया में आये 7.4 तीव्रता के भूकम्प ने समूचे कोलंबिया को एक झटके में गमगीन कर दिया। भूकम्प के दौरान दर्जनों इमारतें और उनमें रहने वाले लोग रेत के महल की तरह
जुलाई माह के अंत में सिउटा नाम का एक छोटा सा स्थान पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना। सिउटा मोरक्को से सटा हुआ एक परिक्षेत्र है जो कि स्पेन के कब्जे में है। सिउटा मोरक्को
मोदी काल में लोकतंत्र (जो कि एक पूंजीवादी लोकतंत्र है) दिनों दिन वहां पहुंच गया है जहां फासीवाद (हिटलर-मुसोलिनी राज) की आहट हर ओर से सुनायी दे रही है। हिन्दू फासीवाद आज के भारत की एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने है। इस हिन्दू फासीवाद को अम्बानी, अडाणी टाटा, मित्तल जैसे सबसे बड़े भारतीय पूंजीपतियों का आशीर्वाद प्राप्त है।
जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है।
हालिया विधानसभा चुनावों में देश की बेहतरीन हालत का ढिंढोरा पीटने के कुछ दिन बाद देश के संघी प्रधानमंत्री ने विदेश की धरती से इसका ठीक उल्टा राग अलापा। उन्होंने कहा कि यह
अंततः प्रधानमंत्री मोदी को स्वीकारना पड़ा कि भारतीय अर्थव्यवस्था संकट में है। उन्हें मानना पड़ा कि इस संकट के चलते करोड़ों लोग गरीबी रेखा के नीचे जाने की कगार पर हैं। बस जिस
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।
भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और
उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।
तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है।
वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?