युद्ध-अर्थव्यवस्था और जनता
पहले से ही 4 वर्ष से रूस-यूक्रेन युद्ध की मार झेल रही विश्व अर्थव्यवस्था अब ईरान युद्ध के साथ नये खतरों का सामना कर रही है। ईरान युद्ध का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव अ
पहले से ही 4 वर्ष से रूस-यूक्रेन युद्ध की मार झेल रही विश्व अर्थव्यवस्था अब ईरान युद्ध के साथ नये खतरों का सामना कर रही है। ईरान युद्ध का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव अ
ईरान युद्ध का असर भारत की सड़़कों पर नजर आने लगा है। रसोई गैस भरवाने की लम्बी कतारें इस बात की गवाह हैं कि अमेरिकी-इजरायल मिसाइलें भले ही ईरान को तबाह कर रही हों पर उसका अ
हकीकत में क्या हुआ है? भारत के स्वयंभू राष्ट्रवादियों ने अमेरिकी साम्राज्यवादियों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है। और एक तरीके से अपने इतिहास को फिर से दुहरा दिया है। आजादी की लड़ाई के समय ये ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के ‘आज्ञाकारी सेवक’ थे और आज ये अमेरिकी साम्राज्यवादियों के आज्ञाकारी अनुचर बने हुए हैं।
मुल्ला नसीरूद्दीन का एक किस्सा है। एक दिन मुल्ला नसीरूद्दीन अपने गधे को लेकर एक सराय में पहुंचा। वहां उसने लोगों के बीच गधे के सामने कुरान रखी और उसके पन्ने पलटने लगा। जब
मोदी सरकार आये दिन भारत की अर्थव्यवस्था और उसकी विकास दर के कसीदे गढ़ती है। कहा जाता है कि भारत दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। और बस चंद साल ही बचे हैं जब
विश्व की सभी प्रमुख राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं के मंच जी-20 ने दक्षिण अफ्रीका की अध्यक्षता के समय वैश्विक स्तर पर अमीरों व गरीबों के बीच बढ़ती आर्थिक असमानता के अध्ययन के लि
पिछले दिनों केन्द्र सरकार ने एक नया विधेयक ‘शांति’ संसद से पारित कर राष्ट्रपति से हस्ताक्षरित करवा कानून बना दिया। इस कानून का शीर्षक ‘भारत के परिवर्तन के लिए परमाणु ऊर्ज
इस वर्ष हमारे देश में जो-जो कुछ घटा (भारत-पाकिस्तान युद्ध, कथित आतंकवादी घटनाएं, पंजाब व अन्य राज्यों में बाढ़ से तबाही, गिरता रुपया, बढ़ती जाती बेरोजगारी व महंगाई आदि) उसक
वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?
अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं।
अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।
अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।
पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।