उद्धारक विचारधारा की तलाश

Published
Wed, 09/16/2026 - 15:50
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भारत की पूंजीवादी राजनीति में योगेन्द्र यादव एक जानी-मानी शख्सियत हैं। वे खुद को समाजवादी कहते हैं तथा किशन पटनायक को अपना गुरू बताते हैं। केजरीवाल के साथ ‘अन्ना आंदोलन’ और फिर आम आदमी पार्टी में रहने के बाद वे एक बार फिर राहुल गांधी के साथ सट रहे हैं। एक बार फिर इसलिए कि वे 2011 के पहले उनके साथ सटे हुए थे। 
    
इन्हीं महाशय ने बड़े पूंजीपतियों के एक उदारवादी अखबार इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख लिखा। एक सितम्बर को प्रकाशित इस लेख का शीर्षक था- ‘इक्कीसवीं सदी मंे हमें बीसवीं सदी के उन विचारों से बचना चाहिए जिन्होंने हमें बचाने का वायदा किया था’। इसमें उन्होंने बीसवीं सदी के पांच उद्धारक विचार गिनाए- जनतंत्र, राष्ट्र-राज्य, विकास, विज्ञान और धर्म निरपेक्षता। उनके अनुसार जनतंत्र अंत में लोकप्रियवाद, बहुसंख्यवाद और चुनावी एकतंत्र में बदल गया। राष्ट्र-राज्य का अंतिम परिणाम अंधराष्ट्रवाद और राष्ट्रीय वैमनस्य में हुआ। विकास अंत में याराना पूंजीवाद और तथा विध्वंसात्मक विकास के रूप में सामने आया। विज्ञान के जरिये अज्ञानता से मुक्ति अंत में मानव मस्तिष्क की संकीर्णता, तकनीकी कुशलता के बिखराव तथा पश्चिमी बौद्धिक वर्चस्व में बदल गयी। धर्म निरपेक्षता का परिणाम अंत में धर्मों के बाजारीकरण तथा साम्प्रदायिकता के रूप में सामने आया। इस तरह लोगों की आजादी व बराबरी, भाईचारा, भौतिक समृद्धि अज्ञानता से मुक्ति व खुशी के बदले परिणाम कुछ उलटा ही हो गया। ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि अंतिम परिणाम संयोग नहीं बल्कि अनिवार्य प्रतीत होते हैं। 
    
इन पर विलाप करने के बाद ये महाशय इक्कीसवीं सदी के लिए जिस उद्धारक विचार का प्रस्ताव करते हैं वह शुद्ध लफ्फाजी है। उनके अनुसार हिन्दू धार्मिक साहित्य में पांच महाभूतों का वर्णन है- पृथ्वी, वायु, जल, अग्नि तथा आकाश। इक्कीसवीं सदी मंे इनके अनुरूप मानव प्रकृति के पांच मूलभूत तत्वों को चिन्हित किया जाना चाहिए- स्वशासन, समावेश, खुशहाली, सच्चाई और खुशी। इन्हें हासिल करने के लिए पश्चिमी आधुनिकता से अलग परंपरागत जड़ों की ओर जाना चाहिए। 
    
यह देखना कोई मुश्किल नहीं है कि लफ्फाजी के अतिरिक्त यदि यहां कुछ सारतत्व है तो वह है हिन्दू फासीवादियों के सामने समर्पण। पश्चिमी आधुनिकता का सिरे से नकार तथा हिन्दू धार्मिक साहित्य के सहारे परंपरागत जड़ों की ओर लौटना यह हिन्दू फासीवादियों की मांग है। ये महाशय इसकी पूर्ति कर रहे हैं। वे हिन्दू फासीवादियों के नुस्खों से हिन्दू फासीवादियों की काट करना चाहते हैं।
    
ये महाशय खुद को समाजवादी कहते हैं पर बात को कुछ इस तरह प्रस्तुत करते हैं मानो जनतंत्र, राष्ट्र-राज्य, विकास, विज्ञान और धर्म निरपेक्षता के पूंजीवादी विचार ही बीसवीं सदी के एकमात्र विचार थे जिन्होंने मानवता के उद्धार का वायदा या दावा किया था। यह बौद्धिक बाजीगरी से ज्यादा बौद्धिक बेईमानी है। सच्चाई यही है कि समूची बीसवीं सदी में मानवता के उद्धार का दावा करने वाली दो विचारधाराएं आमने-सामने खड़ी रहीं और उनमें भीषण जीवन-मरण का संघर्ष चलता रहा। वास्तव में समूचा बीसवीं सदी का इतिहास इन दोनों विचारधाराओं के बीच संघर्ष का इतिहास है- वैचारिक और भौतिक दोनों। यह संघर्ष कलम से भी लड़ा गया और बन्दूक से भी। यह दो समाज व्यवस्थाओं और उनके बीच संघर्ष के रूप में भौतिक तौर पर सामने आया।
    
जब बीसवीं सदी की शुरूआत हुई तो यूरोप में माक्र्सवादी विचारधारा पर आधारित एक मजबूत मजदूर आंदोलन मौजूद था। इस आंदोलन का लक्ष्य था पूंजीपति वर्ग का तख्तापलट कर मजदूर वर्ग का शासन स्थापित करना, फिर समाजवाद स्थापित करते हुए साम्यवाद की ओर बढ़ना। अंतिम लक्ष्य था पूंजीवादी समाज व्यवस्था के बदले साम्यवादी समाज व्यवस्था या कम्युनिज्म का निर्माण।
    
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा माक्र्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति। यह स्वतः ही एक ओर पूंजी के विशाल संचय तथा दूसरी ओर मजदूरों की भयानक कंगाली की ओर ले जायेगा। तब जनतंत्र केवल पैसे वालों के लिए जनतंत्र होगा, राष्ट्र-राज्य पूंजीपति वर्ग की सेवा करेगा, विकास का सारा परिणाम पूंजीपतियों की झोली में जायेगा, विज्ञान पूंजीपतियों द्वारा मजदूरों के शोषण की तकनीक विकसित करने में काम आयेगा और समय आने पर पूंजीपति वर्ग अपनी व्यवस्था की रक्षा में उसी धर्म की शरण लेगा जिसके खिलाफ कभी उसने इतिहास में लड़ाई लड़ी थी। ऐसे में वास्तव में स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व को हासिल करने के लिए निजी सम्पत्ति की पूंजीवादी व्यवस्था को समाप्त करना होगा। केवल सामूहिक सम्पत्ति वाली सामूहिक व्यवस्था में ही वास्तव में सभी मानवों की स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व हासिल हो सकता है। 
    
इस तरह पूंजीपति वर्ग द्वारा घोषित वायदों का अनिवार्य उलटा परिणाम कोई अप्रत्याशित अजूबा नहीं था। माक्र्सवाद तो उन्नीसवीं सदी के मध्य से ही यह बता रहा था। इसी के विकल्प के रूप में वह साम्यवादी समाज की अवधारणा पेश कर रहा था। गौरतलब है कि साम्यवाद की यह अवधारणा आधुनिकता के नकार पर आधारित नहीं थी बल्कि उसका विस्तार करती थी। वह समाज विकास में पीछे की ओर नहीं बल्कि आगे की ओर देखती थी। 
    
इन माक्र्सवादी विचारों ने मूर्त रूप धारण किया 1917 की रूसी क्रांति में तथा उसके द्वारा स्थापित सोवियत समाजवाद में। इस क्रांति से पूंजीपति वर्ग अत्यन्त भयभीत हो गया तथा दो समाज व्यवस्थाओं का संघर्ष अत्यन्त उग्र हो उठा। 
    
बीसवीं सदी में साम्यवाद की चुनौती से निपटने के लिए पूंजीपति वर्ग ने दो रास्ते अपनाये। एक था कल्याणकारी राज्य का रास्ता और दूसरा था फासीवाद का रास्ता। पहला मजदूर वर्ग को कुछ रियायत देने का रास्ता था। दूसरा मजदूर वर्ग को पूरी तरह कुचलने का रास्ता था। पूंजीपति वर्ग ने दूसरा रास्ता पहले चुना पर उसकी असफलता तथा उसके घोर दुष्परिणाम के बाद उसे पहले रास्ते की ओर आना पड़ा। हां, कुछ देशों के ज्यादा दूरदर्शी पूंजीपतियों ने पहले ही पहले रास्ते पर चलना शुरू कर दिया था। 
    
हिटलर और मुसोलिनी के फासीवाद द्वारा ढाई गयी भयानक तबाही के बाद जब पूंजीपति वर्ग ने कल्याणकारी रास्ते पर चलना शुरू किया तो उन्होंने यह प्रचार करना शुरू किया कि उनका फासीवाद से कोई लेना-देना नहीं था। कि फासीवाद तो हिटलर व मुसोलिनी जैसे बुरे व्यक्तियों की सोच के परिणाम थे। बल्कि वे और आगे गये तथा यह प्रचारित करना शुरू किया कि साम्यवादी विचारधारा तथा फासीवादी विचारधारा दोनों समान रूप से बुरे थे क्योंकि दोनों तानाशाही की बात करते थे। यह प्रचार करते समय उन्होंने यह बात चालाकी से छिपा ली कि फासीवाद पूंजीपति वर्ग की नंगी तानाशाही है जबकि समाजवाद में पूंजीपति वर्ग पर तानाशाही लागू की जाती है। फासीवाद में मजदूर वर्ग और मेहनतकश जनता का विशाल बहुमत मुट्ठी भर पूंजीपतियों की कठोर तानाशाही का शिकार होता है जबकि समाजवाद में मुट्ठी भर पूंजीपति मजदूर वर्ग द्वारा तानाशाही का शिकार होते हैं। मजे की बात यह है कि पूंजीपति वर्ग जब यह झूठा प्रचार कर रहा था तभी यूरोप-अमेरिका की पूंजीवादी सरकारें हिटलर-मुसोलिनी के बचे-खुचे फासीवादियों को गुपचुप तरीके से बचा रही थीं। 
    
साम्यवाद से लड़ने में पूंजीपति वर्ग द्वारा मजदूर वर्ग को कुछ रियायत देने का रास्ता (तथाकथित कल्याणकारी राज्य) ज्यादा कारगर साबित हुआ। इसके जरिये विकसित देशों के मजदूर वर्ग को भ्रमित कर सुधारवाद के रास्ते पर लाया गया। इतना ही नहीं, समय के साथ समाजवादी देशों की मजदूर पार्टियां भी सुधार के रास्ते पर चल पड़ीं और बीसवीं सदी के अंत तक इस लड़ाई में पूंजीपति वर्ग तात्कालिक तौर पर विजयी हो गया। 
    
पर यह विजय अजीबोगरीब विजय थी। यह ऐसी विजय थी जिसमें विजयी जोर-शोर से विजय की घोषणा के बावजूद खुद को आश्वस्त नहीं महसूस कर रहा था। वह सहज नहीं था। वह उद्विग्न और बेचैन था। वह महाभारत के पाण्डवों की तरह बेचैन था। उसे पता था कि उसने ईमानदार तरीके से लड़ाई नहीं लड़ी थी। कि उसने लड़ाई में हर तरह के झूठ-फरेब का इस्तेमाल किया था। कि उसके पास समाज को देने के लिए कुछ नहीं था। उसे अपने वायदों और दावों में खुद विश्वास नहीं था। उसकी व्यवस्था में जो कुछ अच्छा था वह पराजितों की देन था। वह खुद उस सबका नुमाइंदा था जो समाज में सड़ा-गला था। इस सम्बन्ध में उसके भी नथुने फट रहे थे। ‘इतिहास के अंत’ और ‘विचारधारा के अंत’ की घोषणा के चंद साल बाद ही धरती पर बर्बरता के अवतरण की बात होने लगी। 
    
इस तरह पूंजीपति वर्ग ने खुद ही अपने ऐतिहासिक दीवालियेपन की घोषणा कर दी। उसने प्रदर्शित कर दिया कि एकछत्र राज हासिल कर लेने के बाद वह समाज को चला भी नहीं पा रहा है, उसे आगे ले जाने की तो बात ही क्या? पूंजीवादी व्यवस्था के बारे में उपरोक्त महाशय का विलाप इसकी एक बानगी है। इस तरह के विलापों से पूंजीवादी बौद्धिक जगत आज भरा हुआ है। अब तो ‘कोई और विकल्प नहीं’ का राग भी नहीं अलापा जा रहा है। इतने सड़ते-बजबजाते समाज के पक्ष में कोई कैसे तर्क दे सकता है? 
    
पूंजीवादी समाज की इन्हीं स्थितियों में आधुनिकता विरोधी प्रवृत्तियां सिर उठा रही हैं। वे पूंजीवाद और आधुनिकता को एक मानते हुए पूंजीवाद विरोध के नाम पर आधुनिकता विरोध का झण्डा बुलंद कर रही हैं। वे समाज को सुदूर अतीत में ले जाना चाहती हैं- सामंती काल में या और भी पीछे। अपनी व्यवस्था की रक्षा में पूंजीपति वर्ग ऐसी शक्तियों को प्रोत्साहित कर रहा है। वह जानता है कि फासीवादी प्रवृत्ति की ये शक्तियां अंत में उसके ही काम आयेंगी। 
    
लेकिन कुछ गैर-फासीवादी प्रकृति के और भी लोग हैं जो पूंजीवाद और आधुनिकता को एक मानते हुए आधुनिकता का विरोध करते हैं और परंपरागत समाज में मुक्ति के बीज ढूंढते हैं। वे फासीवादी शक्तियों के सामने आत्मसमर्पण करते हैं और इसी तरह जाने-अनजाने फासीवादियों की मदद करते हैं।
    
समूची बीसवीं सदी में पूंजीवाद के सामने साम्यवाद विकल्प के तौर पर मौजूद रहा। इनके बीच भीषण संघर्ष चला- वैचारिक और भौतिक दोनों। साम्यवाद ने पूंजीवादी आधुनिकता के बरक्स साम्यवादी आधुनिकता का विकल्प पेश किया। इसने पूंजीवाद द्वारा मानवता के लिए हासिल उपलब्धियों को संजोते हुए आगे जाने का प्रस्ताव रखा। इसमें सबको वास्तव में बराबरी, आजादी और भाईचारा हासिल होना था। इसमें हर किसी का विकास होना था। इसमें धर्म का समूल नाश होना था। इसमें हर इंसान को स्वयं का मालिक बनना था तथा सामूहिक तौर पर पूरे समाज का संचालक। इसमें आधुनिकता के वायदों को सर्वोच्च शिखर तक पहुंचना था तथा परंपरागत समाज से हर तरह की मुक्ति हासिल होनी थी। यह पूर्णतया भविष्योन्मुखी समाज था। 
    
जैसा कि पहले कहा गया है, आज के पूंजीवादी समाज में जो कुछ अच्छा है वह असल में इसी साम्यवाद के लिए संघर्ष की देन है। कल्याणकारी राज्य की धारणा, सार्विक मताधिकार, जन्म आधारित सारे भेदभावों का खात्मा, देशों की आजादी, इत्यादि सब उसी की देन हैं। आज फासीवादी भी जन-जन की बात करने को मजबूर हैं तो उसी के कारण। 
    
ऐसे में इक्कीसवीं सदी में सड़े-गले पूंजीवाद के विकल्प के तौर पर परम्परागत समाजों के पैबंद के साथ इसी पूंजीवाद का खाका पेश करना ज्यादा से ज्यादा मासूमियत ही कही जा सकती है। बीसवीं सदी में पूंजीवाद में सुधार के कई नुस्खे प्रस्तावित किये गये थे। इन्हें भांति-भांति के समाजवाद का नाम दिया गया था। भारत में भी किस्म-किस्म के समाजवादी रहे हैं। नेहरू से लेकर लोहिया तक सब समाजवादी थे। यहां तक कि भाजपा ने भी अपने गठन के समय गांधीवादी समाजवाद को अपना लक्ष्य घोषित कर दिया जो आज भी उसके पार्टी संविधान में दर्ज है। उपरोक्त महाशय भी खुद को समाजवादी ही कहते हैं। ये सारे समाजवाद पूंजीवाद पर बस भांति-भांति के रंग-रोगन हैं। अपने सबसे अच्छे रूप में यह कल्याणकारी राज्य तक पहुंचता है जिससे पीछा छुड़ाने का पूंजीपति वर्ग पिछले पचास साल से प्रयास कर रहा है। 
    
आज सारी दुनिया के पैमाने पर ही पूंजीवाद भयंकर संकट में है। इसका सबसे बड़ा हामी भी इसका बचाव नहीं कर पा रहा है। ऐसे में इस पूंजीवाद के विकल्प का सवाल समाज में खड़ा हो रहा है। स्वाभाविक है कि इस स्थिति में भांति-भांति के पूंजीवादी नीम-हकीम अपनी व्यवस्था की रक्षा में नुस्खे लेकर हाजिर होंगे तथा तबाहहाल मजदूर-मेहनतकश जनता को बरगलाने का प्रयास करेंगे। ऐसे में पुरजोर तरीके से घोषित करना होगा कि पूंजीवाद का एक ही विकल्प है- साम्यवाद। इसके अलावा मानवता के उद्धार का और कोई रास्ता नहीं है। 

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