यह कोई हादसा नहीं बल्कि मुनाफाखोरों द्वारा की गई हत्याएं हैं

Published
Wed, 09/16/2026 - 15:50
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दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के एकदम नजदीक सत्यनिकेतन नाम के एक पीजी की ईमारत ढहने की घटना ने देश की बदहाल हो चुकी शिक्षा व्यवस्था को एक बार फिर उघाड़ कर रख दिया है। गौरतलब है कि 6 सितम्बर को सत्यनिकेतन पीजी की ईमारत ढहने से मलबे में दबकर अभी तक 6 छात्रों समेत कुल 7 लोग मारे जा चुके हैं। जबकि कई छात्र गंभीर रूप से घायल हैं। इसके अलावा हादसे के अगले दिन साउथ कैंपस में ही एक माली से इलेक्ट्रिशयन का काम करवाने की वजह से करंट लगने के कारण एक युवा मजदूर की भी मौत हो चुकी है। शिक्षा के निजीकरण की सरकार की नीति, किरायाजीवी माफिया और भ्रष्ट पूंजीवादी तंत्र इन मौतों के लिये सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं।
    
इस समय दिल्ली विश्वविद्यालय में बाहर से आकर पढ़ने वाले छात्रों की संख्या तो करीब साढ़े तीन लाख है, लेकिन विश्वविद्यालय के कालेजों में हाॅस्टलों की संख्या मात्र 7-8 हजार ही है। निजीकरण की नीति के कारण शिक्षा के बजट में लगातार कटौती की जा रही है, परिणामस्वरूप पूरे ही देश में सरकारी काॅलेजों-विश्वविद्यालयों में अन्य जरूरी सुविधाओं में कटौती की तरह आवश्यकतानुरूप हाॅस्टलों का निर्माण भी नहीं हो रहा है। दिल्ली विश्वविद्यालय में तो पिछले 10-12 सालों में एक भी नया हाॅस्टल नहीं बना है; हालांकि नया आलीशान संसद भवन बनकर तैयार हो गया है और पूरे देश में भाजपा के आलीशान दफ्तरों का निर्माण कार्य भी जोरों पर है। 
    
हाॅस्टलों की संख्या बेहद सीमित होने के कारण देश के प्रतिष्ठित दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिला लेने वाले बाहरी, अक्सर ही छोटे शहरों-कस्बों के छात्रों को निजी हाॅस्टलों और पीजी में किराये पर कमरा लेकर रहना पड़ता है। बेहतर भविष्य की आस में दिल्ली जैसे महानगरों का रुख करने वाली छात्रों की इस बड़ी आबादी को किरायाजीवी माफिया बुरी तरह लूटते हैं। इनकी पैसा बनाने की हवस के सामने इन छात्रों की जिंदगी का भी कोई मोल नहीं होता है, और ये किरायाजीवी माफिया भ्रष्ट प्रशासनिक तंत्र की मदद से न सिर्फ मापदंडों का उल्लंघन कर ऊंची-ऊंची ईमारतें खड़ी कर लेते हैं बल्कि जर्जर हो चुकी ईमारतों को भी पीजी के रूप में चलाते रहते हैं। दिल्ली में 6 सितम्बर को जिस पीजी की ईमारत गिरी वो ऐसी ही एक जर्जर हो चुकी ईमारत थी और जिसमें पानी भर चुके बेसमेंट में मरम्मत का कार्य जारी था। असल में सत्यनिकेतन की घटना कोई हादसा नहीं बल्कि मुनाफाखोरों द्वारा की गई हत्यायें हैं। 
    
5 अधिकारियों को निलंबित कर दिल्ली की मुख्यमंत्री मामले से अपना पल्ला झाड़ चुकी हैं। ये वही रेखा गुप्ता हैं जिन्हें कि जेएनयू में छात्रों को आसानी से उपलब्ध सस्ते हाॅस्टलों से भारी दिक्कत है और वे आवासीय परिसर वाले इस प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय को बंद करने तक की बात कर चुकी हैं। जबकि दिल्ली विश्वविद्यालय के वीसी की अपने ही विश्वविद्यालय के जान गंवा चुके छात्रों के प्रति संवेदनशीलता का आलम यह है कि जिस समय मृतक छात्रों के परिजन मातम मना रहे हैं, जनाब उस समय ‘‘विकसित भारत: साहित्य और कला’’ विषय पर विश्वविद्यालय में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम की शोभा बढ़ा रहे थे। लानत है ऐसे महानुभावों और इनके आकाओं पर; साथ ही लानत है इनके तथाकथित विकसित भारत पर!

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