अप्रैल माह में भारत के मजदूरों खासकर औद्योगिक मजदूरों के सब्र का बांध टूट गया। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एन सी आर) के मजदूर हजारों-हजार की संख्या में सड़कों पर उतर आये। शासकों के घृणित रुख और पुलिसिया दमन का मजदूरों ने डटकर विरोध किया। गुड़गांव, नोएडा में सड़कें क्षोभ और गुस्से से भरे मजदूरों से पट गयीं। जगह-जगह हालात ऐसे बन गये मानो सड़कों पर कोई युद्ध छिड़ा हुआ हो। पुलिसिया दमन ने हालात को कई जगह बहुत ज्यादा बिगाड़ दिया। सैकड़ों की संख्या में मजदूर गिरफ्तार किये गये और कई मजदूर नेताओं को भी जेल में डाल दिया गया।
औद्योगिक मजदूरों का जो संघर्ष गुड़गांव-नोएडा से शुरू हुआ था वह देखते ही देखते देश के कई भागों में फैल गया। जहां-तहां से मजदूरों के सड़कों पर उतरने और अपनी मांगों के समर्थन में हड़ताल, कार्य बहिष्कार, फैक्टरी के भीतर धरना देने, सड़कों पर उतर कर उग्र प्रदर्शन की खबरें आने लगीं। अप्रैल माह के अंत तक भी कभी कहीं से तो कभी कहीं से मजदूरों के संघर्षों की खबर आती रहीं। यह सिलसिला अभी भी जारी है।
इस जुझारू संघर्ष की खास विशेषता क्या थी? इस संघर्ष की खास विशेषता यह थी यह मजदूर वर्ग की एक वर्ग के रूप में कार्यवाही थी। मजदूर किसी एक फैक्टरी, किसी एक उद्योग या किसी एक सीमित इलाके के मजदूर न थे बल्कि वे इन सभी सीमाओं को तोड़कर सड़कों पर उतरे थे। मजदूरों ने लिंग, भाषा, इलाके जैसी सामाजिक सीमाओं को भी तोड़ दिया था। उनमें पुरुष थे तो औरतें भी थीं। उनमें स्थानीय मजदूर थे तो बाहरी (अप्रवासी) मजदूर भी थे। उनमें नौ-जवान मजदूर थे तो उनमंे प्रौढ़ मजदूर भी शामिल थे।
यह संघर्ष स्वतः स्फूर्त था। यानी यह संघर्ष किसी निश्चित तैयारी, योजना या संगठन के बिना फूटा था। इसीलिए इस संघर्ष का कोई नेतृत्व नहीं था। हालांकि कुछेक मजदूर संगठनों ने संघर्ष में सहयोग करने की कोशिश जरूर की। गुड़गांव में एक संगठन के कुछ कार्यकर्ता पहले से पूर्व के मजदूर आंदोलनों के चलते पुलिस-प्रशासन की आंखों में चुभ रहे थे। पुलिस ने इन्हें पहले धमकाने-डराने का काम किया और फिर झूठे आरोपों में जेल में डाल दिया। आंदोलन को हिंसक बनाने का षड्यंत्र करने या फिर पाकिस्तानी कनेक्शन की सारी बातें दरअसल आंदोलन को बदनाम करने की शासन की चालें ही थीं। यह बात ठीक है कि कई क्रांतिकारी और गैर क्रांतिकारी संगठन इन इलाकों में दशकों से सक्रिय हैं परन्तु मजदूर वर्ग में इनका प्रभाव बेहद सीमित ही रहा है। और इस तरह से यह मजदूर वर्ग के क्षोभ व आक्रोश का ऐसा विस्फोट था जिसके लिए अगर कोई जिम्मेदार है तो हमारे देश का शासक वर्ग, पूंजीपति वर्ग ही है। अपने मुनाफे और दौलत बढ़ाने की कवायद में रात दिन लगे इस शासक वर्ग का अंधापन और बहरापन हर बीते वर्ष के संग बढ़ता ही गया है। उसे इस बात की एक इंच भी परवाह नहीं है कि भारत का मजदूर-मेहनतकश वर्ग किस तरह से, किसी तरह से जिंदा है। बहुत तकलीफ और पीड़ा में है।
सालों-साल हो गये हैं मजदूरों की तनख्वाह वास्तव में नहीं बढ़ी है। जो कुछ मामूली सालाना वृद्धि होती है वह महंगाई की लगातार बढ़ती के सामने कुछ भी नहीं है। केन्द्र व राज्य सरकार जो न्यूनतम मजदूरी घोषित करती हैं वह इतनी भी नहीं होती है कि एक मजदूर अपने और अपने परिवार का लालन-पालन कर सके। ऊपर से यह घोषित न्यूनतम मजदूरी भी फैक्टरी मालिक, ठेकेदार आदि मजदूरों को नहीं देते हैं। काम के घण्टे बारह (आना-जाना मिलाकर चैदह-पन्द्रह तक) घण्टे तक हो चुके हैं। वेतन के अलावा मजदूरों को सरकार द्वारा घोषित भत्ते, सुविधायें अवकाश तक नहीं दिये जाते हैं। आये दिन मजदूर फैक्टरियों से लेकर फैक्टरी से आते-जाते वक्त दर्दनाक दुर्घटनाओं मंे मारे जाते हैं। हाल के समय में औद्योगिक दुर्घटनाएं बढ़ती गयी हैं। अधिकांश मामलों में दुर्घटना में मारे गये मजदूरों के परिवारों को कोई मुआवजा नहीं मिलता है। लड़़-झगड़ कर ही कोई मुआवजा किसी तरह से किसी-किसी मामले में मिल पाता है। इस तरह से वर्षों-दशकों से सताये मजदूरों का क्षोभ-आक्रोश, दुःख-पीड़ा, इकट्ठा होती जा रही थी। यह अब समय की ही बात थी कि किस दिन मजदूरों का आक्रोश एक ज्वालामुखी की तरह फूट पड़ता।
मजदूरों के क्षोभ-आक्रोश, दुःख-तकलीफ के ज्वालामुखी के फूट पड़ने में तात्कालिक भूमिका गैस-ईंधन के आसमान छूते दामों ने निभायी। पहले से ही हैरान-परेशान मजदूरों को सड़कों पर उतरकर अपनी मजदूरी को बढ़ाने की मांग करनी पड़ी। स्वतःस्फूर्त जन सैलाब सड़कों पर उतर आया। पुलिस के दमन के कारण सड़कें युद्ध के मैदान में बदल गयीं। यद्यपि मजदूरों ने बहुत ही समझदारी का रुख अपनाया परन्तु इस जन सैलाब में कई उकसावेबाज, उपद्रवी, लम्पट तत्व भी थे जिन्हें पुलिस, फैक्टरी मालिकों आदि का संरक्षण प्राप्त था। वे किसी भी तरह से मजदूरों के इस न्यायप्रिय संघर्ष को भटकाना चाहते थे। और कुछ एक मामलों में उन्हें कुछ सफलता भी मिली। पूंजीपति और सरकार चाहते थे कि किसी भी तरह हो मजदूर काम पर वापस लौट जायें। अपने शोषण-उत्पीड़न की नियति को स्वीकार कर लें। भारी दबाव के बाद ही सरकार ने न्यूनतम मजदूरी आदि में कुछ वृद्धि घोषित की। इस साधारण सी बढ़ोत्तरी का भी पूंजीपति वर्ग ने भारी विरोध किया। और यदि मजदूर सचेत न रहे तो सरकार की घोषणा महज घोषणा ही बनकर रह जायेगी।
भारत की राजधानी क्षेत्र में फूटा यह संघर्ष भारत के अन्य मजदूरों के लिए एक मशाल और मिसाल बन गया है। पहले ही दिन से इसका प्रभाव देशव्यापी था। और खासकर आज के सोशल मीडिया केे जमाने में इसका प्रभाव इलेक्ट्रिक (विद्युत गति सरीखा) था। इस प्रभाव को रोकने की सरकार, सरकारी मीडिया से लेकर पूंजीपति वर्ग द्वारा नियंत्रित मीडिया आदि ने बहुत-बहुत कोशिश की परन्तु वे असफल रहे। असल में अप्रैल माह में मजदूरों का क्षोभ-आक्रोश पूंजीपति वर्ग पर एक वज्रनाद की तरह है जिसकी अनुगूंज लम्बे समय तक सुनाई देती रहेगी।
भारत के मजदूरों के इस स्वतः स्फूर्त विस्फोट का एक वैश्विक आयाम भी है। यह वैश्विक आयाम सिर्फ इस मामले में नहीं है कि अमेरिकी साम्राज्यवादियों द्वारा अपने लठैत इजरायल के साथ ईरान पर बोले गये हमले का एक प्रभाव था। इस हमले के कारण गैस-पेट्रोल-डीजल के दाम वैश्विक पैमाने पर बढ़े हैं: वैश्विक आपूर्ति-श्रंखला बाधित हुयी है। हजारों की संख्या में फैक्टरियां ईंधन व कच्चे माल की आपूर्ति के न होने के कारण बंद हो गयी हैं। मजदूर बेरोजगार होकर पलायन को मजबूर हो गये हैं।
यह वैश्विक आयाम इस मामले में भी है कि पूरी दुनिया में भारत की तरह मजदूर सड़कों पर उतरने को बाध्य हुए हैं। पूरी दुनिया में मजदूर संघर्षों का सिलसिला पिछले कुछ समय से दिखाई दे रहा है। भारत के मजदूर संघर्ष उसी श्रंखला की कुछ कड़ियां हैं। भारत ही नहीं, पूरी दुनिया का पूंजीपति वर्ग अपने मुनाफे की हवस व अपनी काली करतूतों से मजदूरों को संघर्ष के मैदान में उतरने को मजबूर कर रहा है।
अमेरिका व अन्य साम्राज्यवादियों के बीच की बढ़ती कलह, अमेरिकी साम्राज्यवादियों द्वारा तीसरी दुनिया के देशों पर बोले गये हमले आदि के साथ दुनिया में पूंजी और श्रम के बीच भी अंतरविरोध पहले से तीखा ही हुआ है। वर्तमान वैश्विक श्रमिकों के संघर्ष इस बात को दिखला रहे हैं। यहां जिस बात की आवश्यकता है वह यह है कि न केवल हमारे देश में बल्कि हर देश में मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी संगठन देशव्यापी स्तर पर एकता कायम कर एक क्रांतिकारी पार्टी के गठन व निर्माण का प्रयास तेज करें। स्वतः स्फूर्त संघर्षों की लहर पर सवार होकर मजदूर क्रांति के बेड़े को आगे बढ़ाने की जरूरत है।