8 घंटे कार्यदिवस को बढ़ाने में जुटी सरकारें
काम के घंटे दिन में कितने होने चाहिए, पूंजीवादी व्यवस्था की शुरूआत से ही यह ऐसा प्रश्न रहा है जिसका पूंजीपति वर्ग एक तो मजदूर वर्ग दूसरा उत्तर देता रहा है। पूंजीपति वर्ग
काम के घंटे दिन में कितने होने चाहिए, पूंजीवादी व्यवस्था की शुरूआत से ही यह ऐसा प्रश्न रहा है जिसका पूंजीपति वर्ग एक तो मजदूर वर्ग दूसरा उत्तर देता रहा है। पूंजीपति वर्ग
माइक्रोसाफ्ट ने चार कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया है, जिन्होंने कंपनी के इजरायल के साथ संबंधों को लेकर कंपनी परिसर में विरोध प्रदर्शन में भाग लिया था, जिनमें से दो ऐ
हम किर्बी बिल्डिंग सिस्टम्स के सिडकुल हरिद्वार में काम करने वाले श्रमिक हैं। हम फैक्टरी में पिछले लगभग 20 सालों से कार्य कर रहे हैं। हमारी फैक्टरी में स्थायी एवं अस्थायी
मधुशालाएं खुलवाकर स्कूलों पर है ताला
हां तुमने बच्चों की शिक्षा पर है डाका डाला
ऐसे में जब ‘अद्भुत करिश्मे’ की जरूरत हो तब छोटे-मोटे मदारियों की कला से काम नहीं चल सकता है। तत्काल तो इस बात की एक आवश्यकता बनती है कि हिन्दू फासीवादी आंदोलन को चुनौती और शिकस्त दी जाए परन्तु यह ‘अद्भुत करिश्मे’ का एक अंक होगा। क्योंकि आज के सारे ‘लोकतंत्र खतरे में है’ या ‘‘संविधान खतरे में है’’ की पुकार लगाने वाले कभी नहीं चाहेंगे भारत के मजदूर-मेहनतकश ऐसा ‘अद्भुत करिश्मा’ करें जो उनका भी विनाश कर दे।
ऐसे में भारत-अमरीकी रिश्तों में वर्तमान तनाव तथा भारत-चीन सुलह-समझौता तात्कालिक और रणकौशलात्मक प्रकृति के ही हो सकते हैं। अमरीकी साम्राज्यवादी भारतीय शासकां की, खासकर मोदी के नेतृत्व में संघियों की कमजोरी और चाटुकारिता का इस्तेमाल कर उन्हें जरूरत से ज्यादा दबाने का प्रयास कर रहे हैं जो भारतीय शासकों को रूसी व चीनी साम्राज्यवादियों से आंख-मिचौली की ओर धकेल रही है। लेकिन अमरीकी साम्राज्यवादी भी इसकी सीमा जानते हैं। लंपट ट्रम्प भी इस सीमा को पहचानता है। वे भारतीय शासकों के साथ अपनी ‘रणनीतिक साझेदारी’ को खतरे में नहीं डालना चाहेंगे।
अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प और रूसी राष्ट्रपति पुतिन के बीच अलास्का में बैठक हुई। बैठक के पहले अमरीकी राष्ट्रपति पत्रकारों से बात करते हुए रूसी राष्ट्रपति को चेतावनी और धमकी
इजरायली यहूदी नस्लवादी बेंजामिन नेतन्याहू की हुकूमत ने नये सिरे से गाजा शहर और समूची गाजापट्टी में अपने व्यापक विनाश और नरसंहार को और ज्यादा तेज कर दिया है। इजरायली शासक
कर्नाटक में धर्मस्थला के आस-पास कत्ल करके सैकड़ों लाशें दफनाई गई हैं। इस बात के खुलासे ने लोगों का दिल दहला दिया है। कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले में धर्मस्थला नामक शिव का
उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।
तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है।
वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?
अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं।
अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।