‘आरक्षण के भीतर आरक्षण’ : आमजन के लिए आज महज झुनझुने के भीतर झुनझुना
उच्चतम न्यायालय की सात सदस्यों की संविधान पीठ ने अपने बहुमत (6-1) से यह फैसला दिया कि ‘राज्य अनुसूचित जाति (एससी) व अनुसूचित जनजाति (एसटी) के भीतर एक तार्किक व्यवस्था के
उच्चतम न्यायालय की सात सदस्यों की संविधान पीठ ने अपने बहुमत (6-1) से यह फैसला दिया कि ‘राज्य अनुसूचित जाति (एससी) व अनुसूचित जनजाति (एसटी) के भीतर एक तार्किक व्यवस्था के
मजदूरों व मजदूर यूनियनों के बीच लेबर कोड्स का हमला प्रतिरोध का कोई विषय नहीं बन पा रहा है। मजदूर यूनियनें लेबर कोड्स को मजदूरों पर हमले के रूप में नहीं ले पा रही हैं। औद्
आज के समाज में हम देख रहे हैं कि मेहनतकश जनता बेहाल है। अपने रोजमर्रा जीवन के लिए। एक तरफ इसी पूंजीवादी समाज में कुछ लोग ही खुश हैं जो लोग मेहनत नहीं कर रहे हैं जो सिर्फ
मानव के श्रम ने ही उसे पशुवत जीवन से ऊपर उठाकर उसे मानव समाज का रूप दिया। मानव श्रम ने औजारों का रूप लिया। औजारों ने जीवित मानव के हाथों से मिलकर धरती को छुआ तो धरती ने फ
मैं एक आम नागरिक हूं
मैं आजाद हूं?
वोट करने के लिए
टैक्स भरने के लिए
मगर मैं अपने नागरिक अधिकारों
की मांग नहीं कर सकता
वरना धर लिया जाऊंगा
बांग्लादेश की सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिक स्थिति इस बात को बार-बार रेखांकित कर रही है कि आम जनों, मजदूरों-मेहनतकशों, छात्र-युवाओं की बुनियादी समस्याओं का समाधान न तो शेख हसीना, न मोहम्मद यूनुस, न बेगम जिया के पास है। इसका समाधान उन्हें स्वयं करना होगा। पूंजीवादी निजाम का खात्मा और समाजवाद ही अंततः समाधान का रास्ता खोल सकता है।
यह देखना कोई मुश्किल नहीं है कि शोषक और शोषित दोनों पर एक साथ एक व्यक्ति एक मूल्य का उसूल लागू नहीं हो सकता। गुलाम का मूल्य उसके मालिक के बराबर नहीं हो सकता। भूदास का मूल्य सामंत के बराबर नहीं हो सकता। इसी तरह मजदूर का मूल्य पूंजीपति के बराबर नहीं हो सकता। आम तौर पर ही सम्पत्तिविहीन का मूल्य सम्पत्तिवान के बराबर नहीं हो सकता। इसे समाज में इस तरह कहा जाता है कि गरीब अमीर के बराबर नहीं हो सकता।
ईरान में हमास के नेता इस्माइल हानिया की हत्या ने ईरान को इस युद्ध में प्रत्यक्ष तौर पर शामिल होने के लिए उकसावे का कार्य किया है। इजरायल की हुकूमत शुरू से ही इस युद्ध को विस्तारित कर समूचे पश्चिम एशिया तक इसके दायरे को ले जाने की कोशिश करती रही है। उसके हर कुकृत्य को अमेरिकी साम्राज्यवादी बढ़ावा देते रहे हैं। अमरीकी साम्राज्यवादी इस कुतर्क के आधार पर कि इजराइल को अपनी आत्मरक्षा करने का अधिकार है, इजराइल की नरसंहार की कार्यवाहियों का न सिर्फ समर्थन करते रहे हैं, बल्कि वे उसे हर तरह से आधुनिक हथियारों से लैस करके, उसे गोला-बारूद मुहैय्या कराकर वे फिलिस्तीनियों के इस नरसंहार में भागीदार भी रहे हैं।
पिछले दिनों बारिश के कारण लखनऊ शहर के ठीक बीचों बीच, प्रसिद्ध ताज होटल के अंडरपास में पानी भर गया। पानी के भरने पर कुछ 20-22 साल के नौजवान आते-जाते लोगों पर पानी उछालने ल
पूरे देश में एक समान मूल्यांकन पद्धति को लेकर ‘परख’ (प्रदर्शन मूल्यांकन, समीक्षा एवं समग्र विकास के लिए ज्ञान का विश्लेषण) संस्था पिछले दिनों में चर्चा का विषय बनी। यह रा
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।
भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और
उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।
तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है।
वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?