विविध

युवा मजदूर

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घर से निकलते ही रुंधे गले से
मां ने पीछे से आवाज दी थी
रुक जा, मत जा मेरे लाल
शहर में कौन रखेगा तेरा खयाल,
क्या खायेगा? क्या पियेगा?
तुझे कुछ भी बनाना नहीं आता

आपका नजरिया- जेल में बंद साथियों के नाम संदेश

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गुड़गांव जेल में गये साथियों को लाल सलाम करता हूं जो भी पुलिस द्वारा फर्जी तरीके से गिरफ्तार किये गये हैं। शासकों ने डरकर अपनी व्यवस्था को बचाने के लिए उन्हें गिरफ्तार किय

हालिया विधानसभा चुनाव: कुछ निष्कर्ष

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इन सभी राज्यों में मजदूर-मेहनतकश जनता के सामने कोई ऐसी पार्टी नहीं थी जो सच्चे अर्थों में उसके हितों, आकांक्षाओं व भविष्य का प्रतिनिधित्व करती थी। विकल्पहीनता उसे एक धूर्त पूंजीवादी नेता या पार्टी के स्थान पर दूसरे धूर्त नेता या पार्टी की ओर ही धकेलती है। हिन्दू फासीवाद के बढ़ते खतरे का सामना इनमें से कोई भी पार्टी करने में सक्षम नहीं है।

साम्राज्यवाद और अभिजात मजदूर वर्ग

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दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।

होरमुज नाकाबंदी के बीच ट्रंप की चीन यात्रा का अर्थ

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इस वार्ता के चाहे जो भी परिणाम हों, लेकिन एक बात निश्चित है कि अमरीकी साम्राज्यवाद का कमजोर होते जाना तय है और इसके प्रतिद्वंद्वी के बतौर चीनी साम्राज्यवाद का उभरना और रूसी व चीनी साम्राज्यवादियों का गठबंधन मजबूत होते जाना साफ दिखाई पड़ रहा है। 

एक और पेपर लीक: छात्र आक्रोशित

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पूरे देश भर में मेडिकल स्नातक पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए आयोजित नीट की परीक्षा पेपर लीक की वजह से रद्द कर दी गयी है। 3 मई को हुई इस परीक्षा में लगभग 23 लाख छात्रों ने हि

जातिवादी न्यायपालिका

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उड़ीसा के रायगड़ा जिले की अदालत और हाईकोर्ट ने बीते एक वर्ष के भीतर 8 ऐसे जमानती आदेश जारी किये जिससे उनके जातिवादी पूर्वाग्रह स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। इन अदालतों ने द

मजदूरों के निडर बयान

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देश में चल रही मजदूर उथल-पुथल के बीच मानेसर और नोएडा दो ऐसे केन्द्र के रूप में उभर कर आए जहां मजदूर संघर्ष फैक्टरी दायरों को लांघ कर आगे बढ़ गया। इन दो केन्द्रों में कई फै

मजदूर आंदोलन के दमन के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन जारी

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19 अप्रैल 2026 को लघु सचिवालय, गुड़गांव में मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) के आह्वान पर देश भर में जारी मजदूर आंदोलनों और उन पर हो रहे पुलिसिया दमन के खिलाफ एक विरोध-प्रदर्शन आयोजित किया गया। इस

हालिया मजदूर उभार

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मौजूदा मजदूर आंदोलन के उभार को पूरे देश ने देखा। कैसे मजदूर अपनी बदहाल होती स्थिति को लेकर सड़कों पर उतर आए और एक के बाद एक कई फैक्टरियों में मजदूरों ने काम बंद कर हड़ताल क

आलेख

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

/titali-effect-kuch-itihaas-se-kucha-vartaman-mein

तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?

/west-asia-ke-sankat-ka-vaishawik-prabhaav

अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं। 

/west-asia-mein-badalata-shakti-santulan-samajhautaa-gyapan-ke-baad-ki-sthiti

अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।