हवाई परिवहन की बदहाली

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पिछले दिनों इंडिगो कम्पनी की उड़ानों के रद्द होने ने हवाई अड्डों पर जो दृश्य दिखाये उसने विकास करते भारत की पोल खोल दी। चंद दिनों में भारत की इस सबसे बड़ी विमानन कम्पनी की सैकड़ों उड़ानें रद्द हो गयीं। यात्री हैरान थे और सरकार खामोश बैठी थी। किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि इंडिगो कम्पनी खुद अपनी उड़ानें रद्द कर अपना मुनाफा और साख क्यों गिरा रही है। 
    
दरअसल सरकार ने पायलटों के आराम व उन पर कार्यबोझ कम करने के प्रावधान हाल में ही घोषित किये थे। इसमें पायलटों पर रात्रि में विमान उड़ाने पर सीमा भी बांधी गयी थी। इन प्रावधानों को वैसे तो बीते 2 वर्षों से सुरक्षा के नाम पर घोषित किया जा चुका था पर न तो सरकार और न इंडिगो इसे लागू करने को गम्भीर थी। अंततः जब सरकार ने इसे लागू करने की अंतिम तारीख घोषित कर दी तो संकट पैदा हो गया। 
    
भारत के विमानन क्षेत्र में इंडिगो 400 विमानों व 5085 पायलटों के साथ लगभग 60 प्रतिशत अधिकार रखती है। यह प्रतिदिन 2200 उड़ानें संचालित करती है। जबकि करीब 25 प्रतिशत भागीदारी वाली एयर इंडिया लगभग आधे विमान व 6350 पायलट रखती है। इसकी एक वजह एयर इंडिया द्वारा बड़ी दूरी की उड़ानें संचालित करना भी है। 
    
जब नियामक अथारिटी डीजीसीए ने नई गाइडलाइन जारी की तो उसे स्पष्ट था कि इंडिगो की उड़ानें संकट में जायेंगी। पर वे इस तरह से हाहाकार पैदा कर देंगी, इसका अनुमान नहीं था। एक ओर सरकार नई गाइडलाइन लागू करवाना चाह रही थी वहीं इंडिगो की कम पायलटों पर भी उड़ानें बढ़ाने की मांग को मंजूरी दे रही थी। 
    
अंततः जब सरकार ने इंडिगो से इस हाहाकार की वजह पूछी व उस पर दबाव डाला तो पता चला कि दरअसल इंडिगो अपनी उड़ानें रद्द कर सरकार पर दबाव डाल रही थी। अंततः सरकार को कुछ झुकाने में इंडिगो कामयाब भी रही। एक ओर अपने एकाधिकार का लाभ उठा वह किराया बढ़ा रही थी तो दूसरी ओर सरकार पर मापदण्ड ढीले करने का दबाव भी डाल रही थी। 
    
इस बीच अडाणी भी तस्वीर में सामने आ गये जब यह उजागर हुआ कि अपने द्वारा नियंत्रित हवाई अड्डे पर वे बड़ा पायलट प्रशिक्षण केन्द्र शुरू करने को तैयार हैं। कहा जाने लगा कि अडाणी के प्रशिक्षित पायलटों की मांग बढ़ सके, इसके लिए उक्त गाइडलाइन मोदी सरकार ने लागू की। 
    
खैर वजह कुछ भी हो, डीडीसीए (नागरिक उड्डयन महानिदेशालय), सरकार-इंडिगो-अडाणी की अपने हितों के समीकरणों के शिकार भारी कार्य बोझ उठाते पायलट और विमानों में सवार होने वाले यात्री बन रहे हैं। उनकी सुरक्षा इंडिगो-अडाणी सरीखों के हितों पर कभी दांव पर लगती है तो कभी उन्हें मनमाने तरीके से हवाई अड्डों पर सड़ने को छोड़ दिया जाता है। 
    
उच्च मध्यम-मध्यम वर्ग के तथाकथित खाते-पीते तबके को इसी बहाने ही सही एक चपत पड़ी। मजदूरों-मेहनतकशों के निर्मम शोषण के दम पर मुनाफा पीटती कम्पनियों की तलछट पर इतराते इस तबके को अपनी हैसियत का अंदाजा हुआ कि वो भले ही अभी खुशहाल हो पर वह दिन दूर नहीं जब फासीवादी निजाम व पूंजीपतियों के लोभ में उसका भी नम्बर आयेगा। 

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