जब-जब सत्ताधारियों का अहंकार सर चढ़ के बोलता है तब-तब उन्हें मुंह की खानी पड़ती है। अंततः मोदी सरकार को मुंह की खानी पड़ी और शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। भारत के छात्र-युवाओं ने मोदी सरकार की सारी हेकड़ी निकाल दी।
मोदी सरकार की हेकड़ी ढंग से निकल सके इसमें विपक्षी पार्टियों खासकर कांग्रेस ने छात्र-युवाओं का अपने ही कारणों से साथ दिया। मोदी सरकार सड़क से लेकर संसद तक घिरी हुई थी और उसके अपने ‘पाप’, ‘घोर पाप’ (इस तरह के शब्द मोदी एण्ड कम्पनी को खूब पसंद हैं) उसके पीछे पड़ गये हैं। जो वह चाल चलती है उलटी पड़ जाती है। और उसकी ‘नेरेटिव’ (आख्यान), धारणाएं बनाने वाली, झूठ फैलने वाली फैक्टरी ठप्प पड़ गयी है। अमित मालवीय, संघ मशीनरी और ‘गोदी मीडिया’ सभी बेकार साबित हो गये हैं। इस दौरान ‘सोशल मीडिया’ छात्र-युवाओं की रचनात्मकता, व्यंग्य-कटाक्ष, मजाक से भरा हुआ था।
हिन्दू फासीवादियों ने पूरे देश में घुटन का जो माहौल पिछले 12 सालों से बनाया हुआ था उसमें यह आंदोलन एकदम ताजी हवा की तरह था। अंधेरे कोनों में उजाला था। और इस तरह देश में ताजी हवा और उजाले ने एक सुकून भरा एहसास आम लोगों के जेहन में भर दिया। नयी उम्मीदें परवान चढ़ने लगीं। मोदी सरकार को छात्र-युवाओं के सामने समर्पण करना पड़ा। नकली विनम्रता का दिखावा करते हुए मोदी सरकार अंदर ही अंदर दांत पीस रही थी और हाथ मल रही थी। जाहिरा तौर पर वह जल्द ही बदला लेने व दमन करने का मौका ढूंढेगी।
लगभग ढाई महीने पहले जब देश के मुख्य न्यायाधीश ने युवाओं को ‘काकरोच’ बोला था तब उन्हें यह एहसास नहीं था कि वे उन्हीं सत्ताधारियों की तरह ही बोल रहे हैं जिनके ऊपर सत्ता का नशा तारी होता है। और चंद दिनों बाद ही उन्हें मुंह की खाने के लिए तैयार रहना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी तो वहां तक पहुंच गये जहां वे अपने को ‘नाॅन बायलोजिकल’ यानी अजैविक यानी अवतारी पुरुष समझने लगे थे। जैसे मोदी जी वैसे उनके मंत्रिमण्डल के महानुभाव। एक से बढ़कर एक। जो राजनाथ सिंह कह रहे थे कि ‘भैय्या यह यूपीए सरकार नहीं है। यहां मंत्रियों के इस्तीफे नहीं होते हैं’; उनकी जुबान पर धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे के बाद ताला लग गया है। और ऐसे ही मोदी मंत्रिमण्डल के बड़बोले मंत्री अपनी बगलें झांक रहे हैं।
मई माह के मध्य में मुख्य न्यायाधीश के छात्र-युवाओं खासकर बेरोजगार युवाओं को काकरोच कहने से शुरू हुआ यह आक्रोश पहले-पहल सोशल मीडिया में व्यंग्यात्मक प्रतिक्रिया से शुरू हुआ। शुरूवात मुख्य तौर पर अभिजीत दीपके ने की जिन्होंने मजाक-मजाक में ‘काकरोच जनता पार्टी’ की स्थापना की। ऐसी पार्टी जो पहले डिजिटल प्लेटफार्म में थी और फिर कुछ ही दिनों में एक सामाजिक हकीकत बन गयी। दीपके के जंतर-मंतर पर शुरू किये गये धरने को सोनम वांगचुक के आमरण अनशन ने एक आधार व आवेग दिया। और देखते ही देखते छात्र-युवाओं का आक्रोश एक आंदोलन में बदल गया। फिर 20 जुलाई को ‘संसद मार्च’ का जब बुरी तरह से दमन किया गया तो यह आंदोलन देशव्यापी हो गया। इस बीच मोदी सरकार ने जो कुछ किया वह ऐसा था मानो वह आग को घी से बुझाने का प्रयास कर रही हो। जब कुछ काम नहीं आया तो मोदी सरकार को इस आंदोलन के सामने आत्मसमर्पण कर उसकी सभी प्रमुख मांगें मान लेनी पड़ीं। विपक्षी पार्टियों ने समय रहते इस युवा आक्रोश को जो कि एक आग की तरह फैल रहा था, पहचान लिया। और मोदी सरकार के पलायन के कई रास्ते बंद कर दिये।
इस वर्ष पहले मजदूरों ने फिर युवाओं ने मोदी सरकार के होश ठिकाने, अच्छे से लगाये। ये दोनों ही आंदोलन हमारे समाज में फैले आक्रोश, क्षोभ, हताशा की अभिव्यक्ति हैं। पहले और दूसरे दोनों ही आंदोलन में मोदी सरकार का सारा ‘प्रोपगेंडा (प्रचार), ‘नेरेटिव (आख्यान) फेल हो गया। दोनों ही आंदोलन में समाज में मौजूद जाति, धर्म, लिंग, इलाके, भाषा आदि की दीवारें टूट गयीं। जंतर-मंतर ने ऐसे अनेकोनेक दृश्य उत्पन्न किये जो हमारे देश के आमजनों की आपसी एकता, परस्पर लगाव व सहयोग की बानगियां थीं। ये दोनों ही आंदोलन मोदी सरकार के लिए खुली चेतावनी हैं। इन दोनों ही आंदोलनों ने हिन्दू फासीवादी रथ की चूलें हिला दी हैं। यद्यपि यह सच है कि जिस क्रूरता के साथ मजदूर आंदोलन का दमन किया गया उस क्रूरता के साथ छात्र-युवाओं के आंदोलन का दमन न तो संभव था और न किया गया। जो कुछ हुआ वह 20 जुलाई को हुआ। और उसने ऐसा असर पैदा किया कि पांच दिन के भीतर मोदी सरकार को अपने कदम पीछे खींचने को मजबूर कर दिया।
इस आंदोलन की मुख्य मांगें वही थीं जो काकरोच जनता पार्टी ने प्रस्तुत कीं। ये मांगें ऐसी थीं कि इन मांगों को मोदी सरकार चाहती तो एक माह पूर्व ही मान सकती थी परन्तु फासीवादी मांग मानने के स्थान पर पहले उसे अनसुना करते रहे और फिर दमन पर उतर आये। फिर उनके साथ वही हुआ जिसके वे हकदार थे। यानी छात्र-युवाओं ने न केवल जंतर-मंतर पर बल्कि सोशल मीडिया में मोदी सरकार की वह लानत-मलामत की कि मोदी सरकार ‘गोदी’ मीडिया, भाजपा-संघ ये सभी मुंह दिखाने लायक नहीं रहे। भारत ही नहीं पूरी दुनिया में इनकी थू-थू होने लगी। सोशल मीडिया में ‘मीम्स’, ‘रील’ आदि की भरमार थी। इनमें कुछ बेहद सुहाने तो कुछ बेहद भदेस थे। लेकिन इन सबमें उस कुण्ठा, क्षोभ, आक्रोश, चिढ़, निन्दा आदि नकारात्मक भावों की भरमार थी जिसकी कमाई पिछले 12 सालों में मोदी एण्ड कम्पनी ने अच्छे से की थी।
इस आंदोलन में ‘इंकलाब जिन्दाबाद!’ का नारा भी खूब गूंजा। इस नारे की गूंज जंतर-मंतर से लेकर मुम्बई, पटना, इलाहाबाद, बनारस, जयपुर की सड़कों में भी खूब थी। ‘इंकलाब जिन्दाबाद’ (‘लांग लिव रिवोल्यूशन’, ‘क्रांति अमर रहे’) का नारा, हमारी आजादी की लड़ाई में मौलाना हसरत मोहानी ने दिया था। जिसको क्रांतिकारी आभा शहीदे-आजम भगत सिंह ने अपने खून से प्रदान की थी। जब भारत की सड़कों में हिन्दू फासीवादी अपने गलीच नारे लगा रहे हों तब ‘इंकलाब जिन्दाबाद!’ ही इसका सही व मारक जवाब हो सकता है। परन्तु हमें यह ध्यान रखना होगा कि इस आंदोलन के न तो मुद्दे, न अभीष्ट, न लक्ष्य इंकलाबी या इंकलाब था। वे तो महज वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था में शिक्षा व परीक्षा प्रणाली में कुछ सुधारों से सम्बन्धित भर थे।
यह खुली हकीकत है कि आज भारत को वर्तमान व्यवस्था में कुछ सुधार या रंग रोगन नहीं बल्कि आमूल-चूल परिवर्तन चाहिए। ‘काकरोच जनता पार्टी’ का फिलवक्त लक्ष्य पूरी व्यवस्था तो क्या बल्कि उसके एक अंग शिक्षा व्यवस्था और भी खास तौर पर उसकी परीक्षा प्रणाली तक ही सीमित है। ऐसे में जब ‘इंकलाब जिन्दाबाद’ का नारा इस आंदोलन में गूंज रहा था तो वह किसी मकसद, कार्यक्रम या दिशा के स्थान पर महज भावना का प्रतीक भर था। आज के दौर में अगर ‘इंकलाब जिन्दाबाद!’ का सच्चा व सीधा अर्थ लगाया जाए तो इसका अर्थ होगा पूंजीपतियों के राज वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था का खात्मा कर मजदूर-मेहनतकशों के राज यानी समाजवादी व्यवस्था को स्थापित करना और इसका यही अर्थ अपनी युवावस्था में फांसी का फंदा चूमने वाले भगतसिंह का था।