नेपाल में जन विद्रोह - रास्ता किधर है?

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हमारा पड़ोसी देश नेपाल व्यापक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। यह व्यापक विद्रोह भयावह असमानता, व्यापक बेरोजगारी, सत्ताधीशों में व्याप्त भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद के विरुद्ध है। इस विद्रोह में शामिल लोग जनरेशन-जेड के नौजवान हैं (14 वर्ष से 28 वर्ष के नौजवान)। इस विद्रोह के निशाने पर स्थापित राजनीतिक दल हैं। नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले), नेपाली कांग्रेस, नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी केन्द्र) ये सभी बारी-बारी से गठबंधन बना कर सत्तासीन रही हैं। मौजूदा समय में के पी शर्मा ओली प्रधानमंत्री रहे हैं और वे नेपाली कांग्रेस के साथ गठबंधन बनाकर सरकार चला रहे थे। इस विद्रोह के समक्ष ओली सरकार भहरा कर गिर गयी। विद्रोही युवाओं ने मंत्रियों को पीटा, संसद भवन को जलाया। प्रधानमंत्री और पूर्व प्रधानमंत्रियों के घरों को जलाया जिसमें एक पूर्व प्रधानमंत्री की पत्नी की झुलस कर मौत हो गयी। सर्वोच्च न्यायालय को आग के हवाले किया। कर्फ्यू तोड़ कर ढेरों सत्ताधारियों को अपने हमले का निशाना बनाया। 
    
जनरेशन-जेड के इस आंदोलन की शुरूवात सरकार द्वारा सोशल मीडिया पर लगाये गये प्रतिबंधों के विरुद्ध हुई। प्रदर्शनकारी ओली सरकार के विरुद्ध राजधानी काठमाण्डू की सड़कों पर उतरे। ओली सरकार ने इस प्रदर्शन का जवाब गोलियों से दिया और 19 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। उसके बाद दो और लोग मारे गये। इन मारे गये लोगों में एक बारह वर्षीय किशोर भी था। इसके बाद आंदोलन व्यापक रूप से आगजनी और तोड़फोड़ में तब्दील हो गया। यह आंदोलन नेपाल के सभी 77 जिलों के मुख्यालयों में फैल गया। अब तक 50 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और डेढ़ हजार से ऊपर घायल हो चुके हैं। आंदोलनकारियों के नारों में भ्रष्टाचार, ‘नेपोकिड्स’, ‘नेपोबेबी’ और बेरोजगारी मुख्य थे। वे एक तरफ व्यापक नेपाली आबादी की भयावह गरीबी और दूसरी तरफ राजनेताओं की संतानों का वैभव प्रदर्शन वाली असमानता का हवाला दे रहे थे। 
    
नेपाल की मौजूदा आर्थिक स्थिति यह है कि उसकी 3 करोड़ की आबादी में 20 प्रतिशत से अधिक आबादी भयावह गरीबी में जी रही है। नेपाल के सबसे धनी 10 प्रतिशत आबादी की आमदनी 40 प्रतिशत सबसे गरीब आबादी से तीन गुना अधिक है। 15 वर्ष से 24 वर्ष की आबादी के बीच 2022-23 में बेरोजगारी 22 प्रतिशत से अधिक थी। 20 लाख से अधिक नेपाली विदेशों में निर्माण और कृषि में मजदूरी का कार्य करने में विवश हैं। 2024 में विदेशों में काम करने वाले नेपालियों ने 11 अरब डालर नेपाल में भेजा। यह रकम नेपाल की अर्थव्यवस्था का करीब 26 प्रतिशत थी। नेपाल के भीतर कोई रोजगार नहीं। प्रतिदिन एक हजार से ज्यादा नेपाली बाहर मजदूरी करने जाने को विवश होते हैं। 
    
एक तरफ, नेपाल की गरीबी, बेरोजगारी और सत्ताधीशों का भ्रष्टाचार और दूसरी तरफ सरकारों द्वारा व्यापक मेहनतकश आबादी की समस्याओं के प्रति बेरुखी और दमनकारी रवैय्या युवाओं में असंतोष और गुस्से का कारण था। जब सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगा तो उनके गुस्से की चिंगारी इससे फूट पड़ी। उनका गुस्सा वास्तविक था। लेकिन इसका इस्तेमाल कुछ निहित स्वार्थी तत्वों ने किया। ये तत्व देशी और विदेशी दोनों हैं। देशी तत्वों में राजशाही वापसी चाहने वाली ताकतें हैं। ये ताकतें नेपाल के दस वर्षीय पूंजीवादी लोकतंत्र को खतम या विकृत करना चाहती हैं। अभी कुछ दिनों पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र को फिर से राज्य की बागडोर संभालने की मांग करने वाले प्रदर्शन हुए थे। ये ताकतें नेपाल के अंदर सक्रिय हैं। इसके साथ ही नेपाल को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने की मांग करने वाली ताकतें हैं। ये ऐसी प्रतिगामी ताकतें हैं जो नेपाल के पूंजीवादी जनतंत्र को समाप्त या विकृत करना चाहती हैं। 
    
ऐसी ताकतों को खाद-पानी देने का काम नेपाल के संविधान निर्माण के बाद से बनी हुयी सरकारों की असफलताओं और वायदा खिलाफी ने किया है। 2008 में प्रचंड के नेतृत्व में क्रांति के बाद राजशाही समाप्त हो गयी थी। माओवादियों ने नये नेपाल का जो सपना दिखाया था, वह नया नेपाल अस्तित्व में नहीं आया। राजनीतिक तौर पर लोगों को अधिकार मिले। दलितों, महिलाओं और जनजातियों की राजनीतिक सत्ता में एक हद तक भागीदारी बनी लेकिन 2015 में बने संविधान के बाद हर पूंजीवादी जनतंत्र की तरह ही नेपाल की माओवादी पार्टी के नेतृत्व में बनी सरकार भी उसी लूटतंत्र का नेतृत्व करने लगी। विभिन्न पूंजीवादी पार्टियों के साथ गठजोड़ करके वह क्रांति के मकसद से विश्वासघात करके पूंजीवाद की रक्षक के बतौर सामने आयी। इससे नेपाली समाज में असंतोष पैदा होना लाजिमी था। पिछले 10 वर्षों के दौरान सरकारें बदलती रहीं। सभी सरकारें लूट में भागीदार होती रहीं। भ्रष्टाचार के आरोप हर प्रधानमंत्री पर लगे। इस मामले में प्रचण्ड भी बरी नहीं थे। प्रचण्ड ने वायदा किया था कि वे सरकार में नहीं शामिल होंगे। लेकिन वे प्रधानमंत्री बने। उन्होंने कहा था कि माओवादी पार्टी की सांगठनिक संरचना ऐसी करेंगे जिससे नीचे से ऊपर की ओर और ऊपर से नीचे की ओर, दोनों तरफ से आलोचनाओं और मांगों को रखा जायेगा, लेकिन व्यवहार में ऐसा कुछ नहीं हुआ। यह जानी हुयी बात है कि भ्रष्टाचार और पूंजीवाद का चोली-दामन का साथ है। यह माओवादी पार्टी में और उसके नेतृत्व में बनी सरकारों में तथा अन्य सरकारों में भी हुआ। स्वाभाविक था कि एक समय के क्रांतिकारी अब जनता के विशेष तौर पर मेहनतकश जनता के विरोधी के बतौर सामने आये। प्रचण्ड, के पी शर्मा ओली, शेर बहादुर देउपा इत्यादि के बीच मात्रा का फर्क हो सकता है लेकिन सभी पूंजीवाद के ही पक्षधर हैं। लोगों का असंतोष, बेचैनी और गुस्सा पैदा होना स्वाभाविक था। यही गुस्सा 8 सितम्बर को भड़का और 9 सितम्बर तक यह स्वाभाविक गुस्सा हिंसक और तोड़फोड़ करने की ओर गया। इसे हिंसा और तोड़फोड़ की ओर ले जाने में नेपाली समाज की प्रतिगामी ताकतों की भूमिका रही है। 
    
इससे भी बढ़कर अंतर्राष्ट्रीय ताकतों की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। नेपाल एक चारों तरफ से जमीन से घिरा देश है। यह भारत और चीन के बीच स्थित है। अभी कुछ समय पहले तक इसके भारत के साथ ज्यादा गहरे रिश्ते रहे थे। लेकिन भारत की तुलना में इधर चीन के साथ इसके रिश्ते ज्यादा मजबूत होते गये। चीन की बेल्ट और रोड परियोजना का दक्षिण एशिया में नेपाल भागीदार है। चीन ने तिब्बत से काठमाण्डू तक की रेल परियोजना शुरू की है। इससे नेपाल की भारत पर निर्भरता कम हो जानी है। भारत चीन की बेल्ट और रोड परियोजना का हिस्सा नहीं है। भारत चीन की बढ़ती ताकत और प्रभाव से चिंतित है। अमरीकी साम्राज्यवादी और भारत मिलकर चीन के विरुद्ध एक मोर्चा बनाये हुए थे। अमरीकी साम्राज्यवादी चीन को चारों तरफ से घेरने की मुहिम में लगे हुए हैं। इसका मुकाबला चीनी साम्राज्यवादी विश्वव्यापी पैमाने पर अपनी विभिन्न परियोजनाओं के जरिए कर रहे हैं। नेपाल की सरकारें विशेष तौर पर के पी शर्मा ओली की सरकार की चीन से नजदीकी अमरीकी साम्राज्यवादियों की आंख की किरकिरी बनी हुई थी। अमरीकी साम्राज्यवादियों ने 2022 में श्रीलंका में, 2024 में बांग्लादेश में इसी तरह जन असंतोष का फायदा उठाकर वहां की सत्ताओं को उखाड़ फेंकने में भूमिका निभायी थी। इसी प्रकार, अमरीकी साम्राज्यवादियों ने यू.एस.एड के माध्यम से नेपाल में अकेले 2023 में 50 करोड़ डालर वितरित किये थे। यह नेपाल में सक्रियता को बढ़ाने के मद में खर्च किये गये थे। अमरीकी साम्राज्यवादियों द्वारा नेपाल को चीन के प्रभाव से मुक्त करने में इस विरोध आंदोलन के जरिए भूमिका निभायी गयी। इन बातों का कोई ठोस प्रमाण तो बाद में मिलेगा, लेकिन अमरीकी साम्राज्यवादियों का हित इससे सिद्ध होता है। दक्षिण एशिया में उसे चीन की घेरेबंदी करने में मदद मिलती है। 
    
इसे एक तथ्य से और समझा जा सकता है। इस जनरेशन-जेड के एक प्रमुख सूत्रधार बालेन्द्र शाह का नाम सामने आ रहा है। वह काठमाण्डू का मेयर है। इसका नाम भावी प्रधानमंत्री के बतौर पेश किया जा रहा है। लेकिन यह चूंकि सीधे अमरीकी साम्राज्यवादियों के प्रचार में रहा है। अमरीकी साम्राज्यवादी संरचनायें इसे लोकप्रिय नेता के तौर पर प्रचारित करती रही हैं। इसकी संस्था को अमरीकी एकाधिकार कम्पनियों से काफी धन मिलता रहा है। इसलिए अभी इसने अपने नाम को पीछे कर लिया है। इसी प्रकार, रवि लामिछाने नामक व्यक्ति को जेल से निकालकर उसे नेता के बतौर पेश किया गया है। यह भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में बंद था। इसे भी अमरीकापरस्त बताया जाता है। आंदोलनकारियों ने जेल से हजारों लोगों को छुड़ा लिया है।  
    
अभी एक पूर्व न्यायाधीश का नाम अंतरिम सरकार के मुखिया के बतौर पेश किया गया है। सेना ने यह घोषणा की है। यह जज सुशीला कार्की हैं। इसकी जनरेशन-जेड आंदोलन से सहानुभूति है और ये उनके सीधे सम्पर्क में रही हैं। ये भी अमरीकी साम्राज्यवाद की समर्थक व मोदी समर्थक बतायी जाती हैं। 12 अगस्त को कार्की ने अंतरिम प्रधानमंत्री की शपथ ग्रहण की। नेपाल के संसद सदस्यों व प्रमुख पार्टियों ने इस शपथ ग्रहण का बहिष्कार किया। कार्की ने कैबिनेट की पहली बैठक में संसद को भंग कर दिया और 5 मार्च 26 को नये चुनाव कराने की घोषणा की है। 
    
फिलहाल अमरीकी साम्राज्यवादियों और देशी प्रतिक्रियावादियों को कुछ सफलता मिलती प्रतीत हो रही है। भारतीय शासक भी अपने ढंग से भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि अभी अंतिम परिणाम आने तक शक्तियों की रस्साकसी देखने को मिलती रहेगी। 
    
खुद नेपाल में युवा समूह भी कई गुटों में बंटे हैं। इनमें राजतंत्र की वापसी की मांग करने वाले, अमेरिकी साम्राज्यवादी-भारतीय विस्तारवाद से समर्थित, हिंदू राष्ट्र की स्थापना की मांग करने वाले, भ्रष्टाचार मुक्त जनभागीदारी वाले लोकतंत्र की बात करने वाले आदि आदि कई धड़े हैं। ऐसे में आज नेपाल के सामने पीछे की ओर जाने का वास्तविक खतरा मौजूद है। 
    
ऐसी स्थिति में नेपाल के अंदर की ताकतें इन प्रतिक्रियावादी ताकतों की साजिशों और उनकी अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ संभावित सांठगांठ के विरुद्ध क्या करती हैं, इस पर नेपाल का भविष्य निर्भर करेगा। पर इससे नेपाली युवाओं के जन विद्रोह का महत्व कम नहीं हो जाता है। पीछे से कार्यरत शक्तियों की जन विद्रोह में चाहे जो भी नकारात्मक मंशा हो, यह बात साफ है कि आम युवा अपने जीवन में बेहतरी, बेहतर रोजगार-बेहतर जीवन की आस में सड़कों पर उतरे थे। यह भी स्पष्ट है कि ये आम युवा क्रांतिकारी विचारधारा से प्रेरित नहीं थे। उनकी यह वैचारिक कमजोरी ही पीछे से कार्यरत लुटेरी ताकतों को जन विद्रोह का इस्तेमाल अपने पक्ष में कर लेने की राह साफ कर रही है। पर फिर भी कहना होगा कि जनता अपनी ताकत पहचानती जा रही है। पूंजीवादी लोकतंत्र का लुटेरा चेहरा अधिकाधिक उजागर होता जा रहा है। ऐसे में कल यही जनता जब सुस्पष्ट क्रांतिकारी विचारधारा से लैस होकर सड़कों पर उतरेगी तो उसके निशाने पर पूंजीवादी व्यवस्था होगी। तब इस लुटेरी व्यवस्था के साथ पीछे से सक्रिय लुटेरी ताकतों का षड्यंत्र भी ध्वस्त हो जायेगा। और समाजवाद के नये सवेरे का उदय होगा। भारत के सभी पड़ोसी मुल्कों के युवा-आम मेहनतकश अपनी पहलकदमी दिखा चुके हैं। अगला नम्बर निश्चय ही भारत का होगा।     

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