नेपाल में युवाओं का विद्रोह

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नेपाल के युवा इतिहास रच चुके हैं। दो दिन के उनके संघर्ष ने सरकार को भागने पर मजबूर कर दिया। तीनों प्रमुख पार्टियों के नेता, संसद, राष्ट्रपति भवन, अदालत कोई भी युवाओं के गुस्से की आग का शिकार होने से नहीं बच पाया। सेना और राष्ट्रपति ही किसी तरह युवाओं की मांगों को सुनने की बात कर खुद को बचा पाये।
    
नेपाल के युवाओं ने श्रीलंका-बांग्लादेश की फेहरिस्त में अपना नाम जुड़वा लिया। ये युवा क्यों सड़कों पर उतरे? क्योंकि बेकारी-तंगहाली के अपने जीवन के आगे भ्रष्ट नेताओं-उनकी औलादों की बेशर्म अय्याशी को बर्दाश्त करने की उनकी सीमा चुक गयी। ऐसे में अपनी बातों के इजहार के मंच सोशल मीडिया पर पाबंदी के खिलाफ उनका गुस्सा फूट पड़ा। इस गुस्से को और भड़काने का काम पुलिस की हिंसक गोली बारी ने किया जिसमें 19 छात्र-युवा मारे गये। अब गुस्सा उस तूफान में बदल गया जिसे रोक पाने की कूबत किसी में नहीं थी। 
    
इस गुस्से को संगठित करने में पीछे से भांति-भांति के युवा संगठन-व्यक्ति लगे थे। इसमें अमेरिकी साम्राज्यवादियों के पाले एन जी ओ मार्का संगठन भी थे तो घरेलू प्रतिक्रियावादी और भारतीय विस्तारवादियों द्वारा समर्थित राजा समर्थक व हिन्दू राष्ट्र समर्थक तत्व भी थे। इसमें अधिक जनभागीदारी वाले लोकतंत्र की मांग करने वाले लोग भी थे। पर पीछे से षड्यंत्र करने में चाहे जो भी ताकतें लगी हों, युवाओं का आक्रोश अगर दावानल बन कर भड़क उठा तो ये उसके जीवन के बुरे हालात थे- उनकी भारी बेरोजगारी थी; हर रोज काम की खातिर हजारों की तादाद में विदेश जाने की मजबूरी थी। 
    
नेपाल के युवा इस बदहाल जीवन का शिकार क्यों हुए? उसी वजह से जिस वजह से बांग्लादेश-श्रीलंका और हमारे देश भारत के छात्र-युवा बदहाली-बेकारी के शिकार हैं। पूंजीवादी शासकों की घोर पूंजीपरस्त उदारीकरण-वैश्वीकरण की नीतियां कम या ज्यादा द.एशिया ही नहीं दुनिया के ज्यादातर देशों को विस्फोटक स्थिति की ओर धकेल रही हैं। मजदूर-मेहनतकश-छात्रों-युवाओं का बदहाल होता जीवन और पूंजीपतियों-नेताओं की बेशुमार बढ़ती दौलत-अय्याशी वह विरोधाभास खड़ा करता जा रहा है कि जनता-युवा विद्रोह को मजबूर हो जा रहे हैं। 
    
अभी तक श्रीलंका-बांग्लादेश-नेपाल में विद्रोह सरकारों को, कुछ नेताओं को हटा सेना की मदद से पूंजीवादी दायरे में समेट लिया गया। पीछे से षड्यंत्र करने वाली कुछ ताकतें भी अपने मन का कुछ करने में सफल होती दिख रही हैं। पर वे इस गलतफहमी का शिकार हैं कि विद्रोह उन्होंने रचा था और अब युवा-जनता आगे विद्रोह नहीं करेंगे। दरअसल जिन कारणों के चलते युवा सड़कों पर उतरे वे जस के तस हैं। उनका हल न तो नेपाल की नई मुखिया सुशीला कार्की के पास है न बांग्लादेश के युनूस या श्रीलंका के मौजूदा शासकों के पास। ऐसे में मेहनतकश जनता-युवा पिछले विद्रोह की कमियों से सबक लेकर फिर सड़कों पर उतरेंगे। और अबकी षड्यंत्र करने वाली ताकतों को भी निशाने पर लेंगे। 
    
इन विद्रोहों की कमजोरी यही है कि ये क्रांतिकारी विचारधारा से लैस नहीं हैं। इनके पास सुंदर भविष्य की मांग है पर उसके लिए पूंजीवादी व्यवस्था का ध्वंस कर समाजवादी समाज कायम करने की समझ नहीं है। इसीलिए सरकार, नेताओं पर हमला करते-करते ये सेना के आगे ठहर जाते हैं। इसीलिए पीछे से षड्यंत्र करने वाले इन्हें बरगला लेते हैं। क्रांतिकारी चेतना से लैस संगठनों के नेतृत्व में ही ये विद्रोह किसी वास्तविक बदलाव की ओर बढ़ सकते हैं। 
    
अपने आस-पास उठते तूफानों से भारत का शासक पूंजीपति वर्ग व उसकी सरकार भयभीत है। वह भारत के युवाओं-मेहनतकशों को भारतीय लोकतंत्र की महानता दिखा विश्वास दिलाने में जुटी है कि भारत में ऐसा नहीं होगा। उनका यह झूठ देश के किसान-मजदूर-युवा देश के अलग-अलग हिस्सों में हर रोज सड़कों पर उतर पुलिस की लाठियां खा झुठला रहे हैं। स्पष्ट है भारत में भी हर कोने में छोटे-छोटे विद्रोह हर रोज फूट रहे हैं। जरूरत है इन्हें एक साथ पिरो कर देशव्यापी दावानल बनाने की। आज नहीं तो कल यह होकर रहेगा। कोई ताकत इसे रोक नहीं सकती।      

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