बढ़ती गरीबी-बेकारी के बीच विकास की लफ्फाजी

अंतरिम बजट 2024-25

1 फरवरी 2024 को वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने चुनावी वर्ष के लिए अंतरिम बजट पेश किया। पूर्ण बजट नई सरकार बनने के बाद पेश होगा। चुनावी वर्ष होने से बहुत से लोगों को उम्मीद थी कि वोट की खातिर ही सही मोदी सरकार कुछ जन राहत के कार्यों (मोदी की भाषा में चुनावी रेवड़ियां) में थोड़ी बढ़ोत्तरी करेगी। बेरोजगारों, किसानों, मजदूरों के लिए कुछ राहत की इस बजट से लोगों को उम्मीद थी। पर अफसोस कि बजट में जनराहत के चंद छींटे मारने से भी मोदी सरकार ने परहेज किया। पूंजीपतियों की सेवा में निर्लज्जता से जुटी इस सरकार ने बीते 10 वर्षों में आम जन के जीवन में भारी बदहाली पैदा की है। आम मेहनतकश की थाली की सूखी रोटियों को भी छीन कर सरकार अम्बानी-अडाणी को सौंप उनकी दौलत बढ़ाने में जुटी रही है।
    
गरीबों के मुंह से रोटी का निवाला छीनती सरकार साम्प्रदायिक उन्माद पैदा कर लोगों को धार्मिक नशे में डुबोने पर तुली हुई है। राम मंदिर के बाद ज्ञानव्यापी फिर कोई और मसला उठाकर यह रोटी-रोजगार के सवाल को पीछे धकेलने की कोशिश कर रही है। जो लोग साम्प्रदायिक उन्माद में नहीं बह रहे हैं उन्हें साधने के लिए विकास के झूठे अर्द्ध सत्य, मनमाने तरीके से गढ़े गये आंकड़े सरकार पेश कर रही है। इस वर्ष का बजट भी ऐसे ही आंकड़ों-लफ्फाजी से भरा हुआ रहा।
      
वित्त मंत्री ने 22 जनवरी राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के मोदी के भाषण को आंकड़ों की बाजीगरी के साथ फिर से दोहराकर उसे ही बजट का नाम दे दिया। मसलन् सरकार के लिए देश में महज 4 जातियां- गरीब, किसान, महिला, युवा हैं, कि इन्हीं के कल्याण में सरकार जुटी है। कि मोदी काल से पूर्व का शासन आर्थिक विकास के लहजे से अंधकार का दौर था। मोदी पूर्व दशक को खोया दशक करार दे वित्तमंत्री ने उस पर श्वेत पत्र लाने की भी बात की। कि बीते 10 वर्ष में 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आ गये। कि 2047 तक विकसित भारत बनने की ओर देश तेजी से बढ़ रहा है। कि बीते 1 दशक में लोगों की आय 50 प्रतिशत बढ़ गयी। कांग्रेसी शासन की बुराई और अपने शासन की तारीफ के पुलिंदे बांधने में ही बजट भाषण खप गया।
    
बजट भाषण की लफ्फाजियों से इतर अगर बजट की मुख्य बातों पर गौर करें तो यह साफ नजर आने लगता है कि मजदूर-किसान-युवा-महिला सबके खिलाफ यह बजट चंद पूंजीपतियों की सेवा में समर्पित बजट है। जनराहत पर खर्च बढ़ाना तो दूर यह तरह-तरह से कटौती का प्रावधान करता है।
    
यह बजट बीते वर्ष में लगभग 7 प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर की बात करता है। 2024-25 में अनुमान के मुताबिक भारत का सकल घरेलू उत्पाद 327 लाख करोड़ रु. हो जायेगा। 2024-25 के लिए बजट 47.66 लाख करोड़ रु. का पेश किया गया है। यानी सरकार आगामी वर्ष में कुल 47.66 लाख करोड़ रु. खर्च करेगी। इस राशि में कुल करों से सरकार 26.02 लाख करोड़ रु. जुटायेगी। उधार से 16.85 लाख करोड़ रु. जुटायेगी व शेष राशि अन्य तरीकों से जुटायेगी।
    
अब अगर खर्च की प्रमुख मदों की बात की जाये तो विभिन्न तरीके की सब्सिडियों में सरकार ने कटौती कर दी है। उर्वरक, खाद्यान्न व पेट्रोलियम तीनों क्षेत्रों की सब्सिडियां कम कर दी गयी हैं। उर्वरक की मद में गत वर्ष सरकार ने 1.88 लाख करोड़ रु. सब्सिडी के रूप में खर्च किये थे जो इस बजट में घटाकर 1.64 लाख करोड़ रु. करने का प्रावधान किया है। खाद्यान्न के मद में सरकार 2.12 लाख करोड़ रु. की राशि की सब्सिडी घटा कर 2.05 लाख करोड़ करने जा रही है। पेट्रोलियम सब्सिडी 12,240 करोड़ रु. से घटा 11,925 करोड़ रु. करने जा रही है। (देखें तालिका-1)
    
खाद्यान्न सब्सिडी घटाने के बाद भी सरकार 80 करोड़ लोगों को 5 किलो मुफ्त राशन बांटने का दम्भ भर रही है और इसे आगामी वर्ष में भी जारी रखने को अपनी उपलब्धि बता रही है। दरअसल सरकार शहर-देहात में अपनी नीतियों से पैदा हुई दुर्दशा को जानती है। इसीलिए वह कंगाली को विस्फोटक रूप लेने से रोकने के लिए मुफ्त राशन बांटने को मजबूर होती रही है।
    
शिक्षा की मद की बात करें तो गत वर्ष सरकार ने 1.16 लाख करोड़ रु. बजट में खर्च हेतु रखे थे। अब सरकार बता रही है कि महज 1.08 लाख करोड़ रु. ही खर्च होंगे। यानी बजट के 2 प्रतिशत से भी कम की राशि सरकार शिक्षा पर खर्च नहीं कर पायी। इस वर्ष इसमें नाम मात्र की बढ़ोत्तरी कर इसे 1.24 लाख करोड़ रखा गया है। यही हाल स्वास्थ्य क्षेत्र का रहा जहां बजट में तय 88,956 करोड़ रु. की राशि के उलट महज 79,221 करोड़ रु. खर्च किये गये। इस वर्ष स्वास्थ्य मद में 90,171 करोड़ का बजट रखा गया है। स्पष्ट है कि शिक्षा-स्वास्थ्य दोनों ही सरकार की प्राथमिकता में नहीं हैं। सरकार इन क्षेत्रों को निजी पूंजी की लूट के लिए खुला छोड़ रही है। सरकारी स्कूल-कालेजों की दुर्दशा पर खड़े होकर ही प्राइवेट कालेज-अस्पताल जनता को चूस भारी मुनाफा कमा रहे हैं। इस पर भी सरकार कुछ मेडिकल कालेज, कुछ आईआईटी खोलने को भारी उपलब्धि के बतौर पेश करती रही है।
    
जहां तक राज्यों को खर्चे हेतु राशि हस्तांतरित करने का प्रश्न है मोदी सरकार का प्रदर्शन इस मामले में बीते 10 वर्षों में बेहद बुरा रहा है। अब तो यह तथ्य भी सामने आ गया है कि सरकार राज्यों को कमजोर करने के लिए उन्हें तय राशि भी खर्च हेतु नहीं देती रही है। बीते वर्ष भी यही हुआ। राज्यों के लिए तय 3.21 लाख करोड़ रु. की राशि में मात्र 2.73 लाख करोड़ रु. ही उन्हें बीते वर्ष में दिये गये। नये वित्त वर्ष में तो सरकार ने इस राशि को ही गिराकर 2.86 लाख करोड़़ रु. कर दिया। जाहिर है मोदी सरकार राज्यों को केन्द्र पर पूरी तरह निर्भर बनाने को प्रयासरत है।
    
कृषि की मद में भी सरकार ने गत वर्ष 1.44 लाख करोड़ रु. खर्च का बजट प्रावधान किया था जिसमें से सरकार ने मात्र 1.40 लाख करोड़ खर्च किये। इस वर्ष 1.47 लाख करोड़ का बजट रखा गया है। महंगाई को देखते हुए यह वास्तव में खर्च में कमी ही है। मनरेगा की मद में सरकार ने 60,000 करोड़ का बजट रखा था पर खर्च 86,000 करोड़ रु. किये। अब सरकार ने इस वर्ष भी 86,000 करोड़ रु. ही इस मद में बजट रखा है। यह देखते हुए कि कई राज्यों को केन्द्र सरकार मनरेगा का पैसा समय पर नहीं दे रही है। यह मनरेगा मजदूरों की स्थिति को और दयनीय बनाने वाला आवंटन है।
    
मोदी सरकार की मुस्लिम अल्पसंख्यकों से बेरुखी इस बजट में भी साफ दिखाई पड़ती है। मदरसों, मुफ्त कोचिंग, अल्पसंख्यक छात्रवृत्ति आदि तमाम मदों में इस वर्ष भी भारी कटौती की गयी है। इस तरह मोदी सरकार बजट आवंटन के जरिये भी मुस्लिमों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने पर उतारू है।
    
मध्यम वर्ग की आयकर छूट सीमा को भी बढ़ाने से मोदी सरकार ने परहेज किया है। वहीं कारपोरेट टैक्स में जरूर कुछ रियायत दे पूंजीपतियों को खुश करने की कोशिश की है।
    
कृषि में नैनो यूरिया को बढ़ावा, बायो गैस को बढ़ावा, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा, सेमीकण्डक्टर उत्पादन को बढ़ावा आदि के जरिये सरकार उद्योगों को खुश करने में जुटी रही है।
    
जनता को वह लखपति दीदी का ख्वाब दिखा रही है। मोदी सरकार के अनुसार स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी 8-9 करोड़ महिलाओं में 1 करोड़ लखपति बन गयी हैं। इस आंकड़े की असलियत अपने इर्द-गिर्द के स्वयं सहायता समूहों के हाल देख कोई भी समझ सकता है। वैसे भी जब अंबानी-अडाणी सब कुछ बना कर बेचने को उतारू हों तो बेहद कम पूंजी से गांव की गरीब महिलायें उनसे भला कैसे प्रतियोगिता कर सकती हैं। यही बात 40 करोड़ मुद्रा लोन से स्वरोजगार पर भी लागू होती है। पकौडा रोजगारों की दुर्दशा जगजाहिर है।
    
दरअसल मोदी सरकार के पूंजीपरस्त कारनामों से भारतीय अर्थव्यवस्था मांग की कमी से जूझ रही है। एक बड़ी आबादी कंगाली में बाजार से कुछ खरीदने की हालत में नहीं है। ऐसे में उद्योगों का उत्पादन भी कुछ खास बढ़ नहीं सकता, नये उद्योग लगाना तो दूर की बात है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए मांग में वृद्धि जरूरी है। जो रोजगार, कृषि आदि क्षेत्रों में सरकारी खर्च बढ़ा, जनराहत पर सरकारी खर्च बढ़ा कर ही पैदा हो सकती है। पर फासीवादी सरकार इसके बजाय दूसरे तरीके से चल रही है। वह मेहनतकशों को और कंगाल बना उनकी कमाई छीन पूंजीपतियों को तो दे ही रही है सरकारी खर्च भी सीधे पूंजीपतियों के कम मुनाफे की भरपाई में लगा रही है। इससे पूंजीपति खुश हैं। रही बात कंगाली-बेकारी की मार झेल रही जनता की तो सरकार 5 किलो मुफ्त राशन व साम्प्रदायिक उन्माद से उनका मुंह बंद कर रही है। पर यह सब लम्बे वक्त तक नहीं चल सकता। जीवन की हकीकत से लोग सरकार की विकास की लफ्फाजी पहचान रहे हैं और जिस दिन बड़ी आबादी इस हकीकत को पहचान जायेगी तो फासीवादी सरकार और उसके आका पूंजीपतियों को कोई साम्प्रदायिक उन्माद नहीं बचा पायेगा। सरकार की सारी लफ्फाजी धरी रही जायेगी। पूंजीवादी व्यवस्था जनता के ज्वार के आगे ध्वस्त हो जायेगी।

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