चुनाव आयोग की ‘एन आर सी’ का विरोध जरूरी

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25 जून से भारत के चुनाव आयोग ने बिहार में मतदाता सूची में गहन पुनरीक्षण की शुरूआत की घोषणा की है। बिहार में कुछ महीनों बाद विधानसभा चुनाव होने हैं। इसके साथ ही यह खबर भी आ रही है कि बिहार के बाद चुनाव आयोग बंगाल समेत उन 5 राज्यों में भी यह पुनरीक्षण कार्यक्रम चलायेगा जहां भविष्य में चुनाव होने हैं। 
    
मतदाता सूची में चुनाव से पूर्व नये मतदाताओं के नाम दर्ज करना व मृतक व बाहर चले गये लोगों के नाम काटना एक सामान्य प्रक्रिया रही है जिसका हर चुनाव से पहले प्रयोग किया जाता रहा है। पर अबकी बार चुनाव आयोग इस सामान्य प्रक्रिया के बजाय गहन पुनरीक्षण करा रहा है जिससे लाखों लोगों के मताधिकार के छिनने का खतरा पैदा हो गया है। 
    
अभी तक किसी को मतदाता सूची में नाम दर्ज कराना होता था तो एक सामान्य सा फार्म भरकर, अपने निवास का प्रमाण व एक शपथ देकर नाम दर्ज हो जाता था। पर अब इस गहन पुनरीक्षण के तहत चुनाव आयोग ने बताया कि चूंकि इस तरह का गहन पुनरीक्षण बिहार में इससे पूर्व 2003 में हुआ था इसलिए 2003 की मतदाता सूची को ही प्रमाणित सूची माना जायेगा और इसके बाद जिन व्यक्तियों के नाम मतदाता सूची में दर्ज हुए हैं उन्हें अपनी नागरिकता का प्रमाण पेश करना होगा। 
    
इस प्रमाण के लिए 1 जुलाई 1987 से पहले जन्मे लोगों को अपनी जन्म तिथि व जन्म स्थान का प्रमाण देना होगा। 1 जुलाई 1987 से 2 दिसम्बर 2004 तक जन्मे लोगों को अपने माता-पिता में से किसी एक की जन्म तिथि-स्थान का प्रमाण पेश करना होगा तथा 2 दिसम्बर 2004 के बाद जन्मे लोगों को अपने माता-पिता दोनों की जन्म तिथि-स्थान का प्रमाण देना होगा। चुनाव आयोग ने 1955 के नागरिकता अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप ये प्रमाण मांगे हैं। 
    
इस प्रक्रिया हेतु बूथ स्तरीय अधिकारी घर-घर जाकर सर्वेक्षण व दस्तावेज जुटाने का काम करेंगे। इनके आधार पर निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी मतदाता सूची में व्यक्ति का नाम जोड़ने या न जोड़ने को तय करेंगे। 
    
इस समूची कवायद के लिए चुनाव आयोग ने बढ़ते शहरीकरण, प्रवास, नये मतदाता, अघोषित मौतों के साथ विदेशी अवैध प्रवासियों के नाम शामिल होने को कारण के बतौर बताया है। बिहार से शुरू होने वाली इस कवायद को असम, केरल, पुदुचेरी, तमिलनाडु व पं. बंगाल में भी लागू किया जायेगा जहां इसी वर्ष चुनाव होने हैं। 
    
चुनाव आयोग व भाजपा सरकार की इस सारी कवायद से मंशा एकदम स्पष्ट है। वह यह है कि 1987 से पहले भारत से बाहर जन्मे, या 87-2004 के बीच भारत पर माता-पिता दोनों के भारत में न जन्म लेने वाले लोगों, व 2004 के बाद भारत में जन्मे पर माता-पिता में किसी एक के भी भारत में न जन्म लेने वाले लोगों को मतदाता सूची से बाहर कर दिया जाये। इसके साथ ही यह कवायद उन तमाम लोगों को भी मतदाता सूची से बाहर कर देगी जो उक्त प्रावधानों को पूरा तो करते हैं पर उसका प्रमाण उन पर नहीं है। जाहिर है इसका शिकार संपत्तिविहीन गरीब मजदूर-मेहनतकश बनेंगे।
    
यह कवायद चुनाव आयोग पर पूर्व में लगते रहे इस आरोप को भी पुष्ट करती है कि वह संघ-भाजपा के हितों के अनुरूप मतदाता सूची में लाखों की तादाद में नये नाम जोड़ने व ढेरों नागरिकों के नाम काटने का काम करता है। संघी सरकार इस तरह चोर दरवाजे से राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एन आर सी) लागू करने की कवायद कर रही है। अवैध अप्रवासियों का जिक्र कर चुनाव आयोग ने इशारा दे दिया है कि इसके निशाने पर मुसलमान व बांग्लाभाषी लोग अधिक होंगे। उन्हें ही कागज दिखाने के लिए तंग किया जायेगा। 
    
इस अघोषित एन आर सी का विपक्षी दलों द्वारा विरोध भी शुरू हो गया है। बंगाल की मुख्यमंत्री ने तो इस कवायद के निशाने पर बंगाल के लोगों के होने की बात करते हुए विरोध किया। जाहिर है इसके लागू होने पर बंगाल में ही सबसे ज्यादा लोगों के नाम मतदाता सूची से कटने की संभावना है। 
    
फासीवादी मोदी सरकार एक ओर देश भर में रोहिंग्या, बांग्लादेशी लोगों की धरपकड़ के नाम पर गरीब मेहनतकशों को तंग करने में जुटी है; दूसरी ओर चोर दरवाजे से एन आर सी लागू कर लाखों गरीब मेहनतकशों की नागरिकता छीनने की तैयारी कर रही है। उसकी इस कवायद का इसी आधार पर विरोध किया जाना चाहिए कि जो भी जब भी भारत में दो वक्त की रोटी कमाने के लिए आया हो, उसे भारत का नागरिक माना जाना चाहिए। 
    
जरूरत है कि सरकार की इस विभाजनकारी-मेहनतकश विरोधी परियोजना के खिलाफ खुल कर खड़ा हुआ जाये और एक बार फिर नारा बुलंद किया जाये कि ‘हम कागज नहीं दिखायेंगे’। 

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