प्रधानमंत्री मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले से जो भाषण दिया उस पर जंतर-मंतर संघर्ष की स्पष्ट छाप थी। जेन जी को भरमाने के लिए मोदी ने देश के विकास की झूठी गाथा के साथ मुफ्त कोचिंग व दिमागी नक्सल का शिगूफा छोड़ा।
प्रधानमंत्री ने पूरे देश के युवाओं को मुफ्त आनलाइन कोचिंग देने का वायदा किया और बताया कि अब वे बच्चे भी कोचिंग कर पायेंगे जो फीस के अभाव में कोचिंग नहीं कर पाते थे। कि मुफ्त आनलाइन सरकारी कोचिंग से हर छात्र को अपनी प्रतिभा साबित करने का मौका मिलेगा। कि अब मां-बाप को जमीन गिरवी रख कर या सारी जमा पूंजी खर्च कर बच्चों को कोचिंग भेजने की जरूरत नहीं रहेगी। कि इससे छात्रों का तनाव कम होगा।
बरगलाने में माहिर मोदी ने सोचा था कि मुफ्त कोचिंग के मास्टर स्ट्रोक से वे नयी पीढ़ी को खुश कर देंगे। पर मोदी लगता है कि अपनी ही दूसरी बात भूल गये कि सरकार पर संदेह करने, उससे लड़ने वाले दिमागी नक्सलों से सावधान रहने व उन्हें समाप्त करने की जरूरत है। अब दिमाग से सोचने वाले व सरकार से लड़ने वाला हर व्यक्ति ‘दिमागी नक्सल’ बन गया है तो दरअसल अंधभक्तों को छोड़ आज हर शिक्षित युवा दिमागी नक्सल है; और वह दिमाग से सोचने के चलते मुफ्त कोचिंग के शिगूफे पर नहीं फिसलने वाला।
मुफ्त कोचिंग तो आज सोशल मीडिया-ए आई के दौर में पहले से ही इण्टरनेट पर उपलब्ध होती जा रही है। अगर सरकार भी एक यू ट्यब चैनल बना मुफ्त कोचिंग देने लगे तो इससे क्या फर्क पड़ेगा? इससे न तो प्राइवेट कोचिंगों का मकड़जाल खत्म होगा और न ही प्रतियोगिता व छात्रों का तनाव जरा भी कम होगा। न ही इससे पेपर लीक कम होंगे और न ही छात्रों की आत्महत्यायें।
ऐसे में छात्रों का तनाव व प्रतियोगिता मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था में खत्म नहीं हो सकती। सबको गरिमामयी रोजगार की गारंटी ही इस प्रतियोगिता व तनाव को कुछ कम कर सकती है। पर हर हाथ को रोजगार केवल पूंजीपतियों पर शिकंजा कस कर व काम के घण्टे घटा कर दिया जा सकता है। पूंजीपतियों के हित में काम करने वाली सरकार यह सब नहीं कर सकती।
इसीलिए मुफ्त कोचिंग के शिगूफे पर अंधभक्त ही जश्न मना सकते हैं। दिमाग रखने वाले युवा तो इस पर अफसोस ही कर सकते हैं कि उनके देश का मुखिया सत्ता की मद में इस कदर मदहोश है कि तुगलकी घोषणाओं से युवाओं को बरगलाना चाहता है।
प्रतियोगिता मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था का सर्वव्यापी लक्षण है। यहां ऊपर चढ़ने की चाह मंे पूंजीपतियों, नेताओं से लेकर छात्र-युवा सब परस्पर प्रतियोगितारत हैं। ऐसे में इस व्यवस्था के अंत के बगैर न तो प्रतियोगिता खत्म होगी और न ही युवाओं का तनाव या आत्महत्यायें।
आज देश के हर कोने में युवा जंतर-मंतर बना रहे हैं। अपने मुद्दों के लिए लड़ रहे हैं। छात्रों-युवाओं को यह समझना होगा कि उनका जीवन पेपर लीक से लेकर स्कूली दुर्दशा में सुधार के संघर्षों को हर हाथ को गरिमामयी रोजगार व शिक्षा व्यवस्था व समाज व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन की मांग से जोड़ने से ही बदल सकता है।