हरियाणा में वेतन वृद्धि और पूंजीपतियों की चीख-पुकार

Published
Thu, 04/16/2026 - 15:50
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पिछले दिनों गुड़गांव के आई एम टी मानेसर में हरियाणा सरकार द्वारा लागू न्यूनतम वेतन वृद्धि को लागू करवाने के लिए मजदूरों हड़तालों का तांता लगा रहा। होंडा फैक्टरी से शुरू हुआ आंदोलन एक के बाद कई फैक्टरियों में फैलता गया। बढ़ती गैस की कीमतों ने आग में घी का काम किया। महंगाई की मार झेल रहे मजदूरों का सब्र का बांध टूट चुका था। इन मजदूर संघर्षों के दबाव में हरियाणा सरकार ने तुरत-फुरत में न्यूनतम वेतन वृद्धि लागू करने के लिए नोटिफिकेशन जारी कर दिया। 
    
न्यूनतम वेतन वृद्धि का नोटिफिकेशन जारी होते ही पूंजीपतियों के सीने पर सांप लोट गया। वे हाय-तौबा मचाने लगे हैं। जब सरकार ने 2 मार्च के बजट सत्र में 1 अप्रैल से न्यूनतम वेतन की नयी दरें लागू करने की घोषणा की थी तब उन्हें उम्मीद नहीं थी कि मजदूर इतनी जल्दी इन दरों को लागू करने के लिए सड़क पर उतर पड़ेंगे और सरकार पर इतना दबाव बना देंगे कि सरकार को न्यूनतम वेतन लागू करने का नोटिफिकेशन जारी करने के लिए मजबूर कर देंगे। सरकार को भी मजदूरों की तरफ से इस तरह की प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं थी। इसलिए वह भी अपनी प्रचार माध्यमों से वाहवाही लूट रही थी। लेकिन इस बार मामला पलट गया। महंगाई की मार झेल रहा मजदूर सड़क पर उतर आया। 
    
9 अप्रैल को जब सरकार ने न्यूनतम वेतन लागू करने का नोटिफिकेशन जारी किया तो उसके बाद 11 अप्रैल को हरियाणा में एम एस एम ई के उद्योगपतियों ने अपनी बैठक कर सरकार से इस न्यूनतम वेतन वृद्धि को अनुचित बताया। वे उद्योगों में नकदी प्रवाह कम होने, राज्य में भविष्य में निवेश कम होने, फैक्टरियों के दूसरी जगह स्थानांतरित होने और कई लघु एवं मध्यम उद्यम बंद होने का भय सरकार को दिखाने लगे। 
    
उन्होंने कहा कि न्यूनतम वेतन में जो 35 प्रतिशत की वेतन वृद्धि की गयी है वह वास्तव में उन्हें 45 प्रतिशत की पड़ेगी क्योंकि पी.एफ., ई.एस.आई., बोनस, ग्रेच्चुटी आदि भी मूल वेतन से जुड़े होते हैं। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब जैसे पड़ोसी राज्यों में न्यूनतम वेतन की दरें अभी भी 11,000 से 12,000 के बीच हैं। हरियाणा में 15,220 रुपये न्यूनतम वेतन से हरियाणा की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता में कमी आयेगी। 
    
उद्योगपतियों ने इस बात का भी रोना रोया कि यह वेतन वृद्धि एकदम से लागू की जा रही है। कि उद्योगपतियों को प्रशासनिक कार्यों के लिए समय नहीं दिया गया। कि इस वेतन वृद्धि को पांच वर्षों में चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाना चाहिए था ताकि वित्तीय दबाव से बचा जा सके। उन्होंने उत्पादन में कच्चे माल की लागत पहले से ही बढ़ने का राग अलापा। 
    
उद्योगपतियों की इस बैठक से एक बात को साफ हो गयी कि आखिर मजदूर 2 अप्रैल से आंदोलन करने को क्यों मजबूर हुए। दरअसल  सरकार व पूंजीपति दोनों ही इस न्यूनतम वेतन की वृद्धि को तत्काल ही लागू करने के मूड में नहीं थे। जैसा होता है कि सरकार घोषणा कर देती है लेकिन उसको लागू नहीं करती। इस बात को मजदूर अच्छी तरह से जानते हैं। इसलिए जब 1 अप्रैल को सरकार ने कोई नोटिफिकेशन जारी नहीं किया और मजदूरों के पूछने पर पूंजीपतियों ने नया न्यूनतम वेतन लागू करने से साफ मना कर दिया तो उनका गुस्सा भड़क उठा और वे सड़क पर आंदोलन करने को मजबूर हो गये। 
    
सरकार की नींद तब भी नहीं खुली और उसने सोचा कि वह मजदूरों के आंदोलन को दबा देगी। लेकिन मानेसर में एक के बाद एक फैक्टरी में हड़तालें होने लगीं और हरियाणा के पानीपत, फरीदाबाद में भी मजदूर हड़तालें करने लगे तब जाकर सरकार ने आनन-फानन में नोटिफिकेशन जारी किया लेकिन साथ ही उसने मजदूरों का दमन करना शुरू कर दिया और मजदूरों के साथ उनके आंदोलन में भागीदारी कर रहे मजदूर नेताओं की गिरफ्तारी शुरू कर दी। 
    
उद्योगपतियों का यह कहना बिल्कुल गले नहीं उतरता कि सरकार का यह फैसला तुरत-फुरत था कि प्रशासनिक कार्यों के लिए उन्हें समय नहीं मिलेगा। दरअसल 29 दिसम्बर 25 की बैठक में सरकार, उद्योगपति और मजदूर प्रतिनिधियों की बैठक में यह फैसला लिया गया था कि न्यूनतम वेतन 23,146 रुपये बढ़ाया जायेगा। लेकिन सरकार और उद्योगपतियों ने चुपचाप फैसला कर मात्र 15,220 रुपये न्यूनतम वेतन ही बढ़ाया। देखने में यह वृद्धि भले ही 35 प्रतिशत की लग रही है जिसे उद्योगपति 45 प्रतिशत तक की बता रहे हैं लेकिन एक तथ्य यह भी ध्यान में रखना पड़ेगा कि यह न्यूनतम वेतन 2020 में बढ़ाना था लेकिन उस समय भी कोरोना आने की वजह से न्यूनतम वेतन रिवाइज नहीं किया गया था। उस समय भी मजदूरों की कीमत पर उद्योगपतियों को सरकार ने लाभ पहुंचाया था। बढ़ती हुई महंगाई के हिसाब से 15,220 रुपये का न्यूनतम वेतन भी भुखमरी का वेतन ही है। वास्तव में मजदूरों को जीवन जीने के लिए इस समय 30,000 रुपये न्यूनतम वेतन लागू होना चाहिए। 
    
न्यूनतम वेतन वृद्धि का असर पूर्व उप मुख्यमंत्री दुष्यंत कुमार चौटाला पर भी पड़ा। उन्होंने अपना तर्क (या कहें कुतर्क) पेश किया कि हरियाणा में राज्य से जो लाभ मिलते हैं कि वह सालाना 1 लाख 80 हजार रुपये की आय से नीचे वालों को मिलते हैं। यदि मजदूरों की तनख्वाह 15 से ज्यादा हो जायेगी तो उनका सालाना वेतन 1 लाख 80 हजार से ज्यादा हो जायेगा और फिर उन्हें वे लाभ मिलना बंद हो जायेगें। कोई पूछे तो फिर दुष्यंत कुमार चौटाला लाभ प्राप्त करने की सालाना आय 1 लाख 80 हजार से ज्यादा करने की बात क्यों नहीं करते। बात पक्ष लेने की है। दरअसल दुष्यंत कुमार चौटाला अपने आपको पूंजीपतियों का सच्चा सेवक साबित करना चाहते हैं। 
    
अब पूंजीपति और मजदूर दोनों सरकार पर दबाव बना रहे हैं। एक पक्ष (पूंजीपति वर्ग) न्यूनतम वेतन कम करने या देर से लागू करने का दबाव बना रहा है और दूसरा पक्ष (मजदूर वर्ग) जल्द से जल्द न्यूनतम वेतन लागू करवाना चाहता है। सरकार ने न्यूनतम वेतन का नोटिफिकेशन तो जारी कर दिया है लेकिन वह अभी भी मजदूरों का ही दमन करने में जुटी है। 55 मजदूरों जिसमें 20 महिला मजदूर भी हैं, को गिरफ्तार कर सरकार जेल भेज चुकी है। इनमें 11 मजदूरों पर आगजनी व हत्या के प्रयास का मुकदमा दर्ज किया जा चुका है। आधा दर्जन से ज्यादा मजदूर नेताओं को गिरफ्तार कर 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज चुकी है। इन्हें मजदूरों को उकसाने के लिए दोषी करार दे चुकी है। भुखमरी का वेतन लागू करवाने के लिए भी मजदूरों को और लड़ने की जरूरत होगी। सम्मानजनक जीवन जीने का वेतन लागू करवाने के लिए तो उन्हें और ज्यादा व्यापक एकता की जरूरत होगी। 

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