हिन्दू फासीवाद के लंपट दस्ते

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दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ की अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की नवनिर्वाचित संयुक्त सचिव दीपिका झा द्वारा अम्बेडकर कालेज के एक प्रोफेसर सुजीत कुमार को थप्पड़ मारने की घटना पर विद्यार्थी परिषद की लंपटता एक बार फिर चर्चा में है। प्रोफेसर सुजीत कुमार जो अम्बेडकर वि.वि. की अनुशासन समिति के प्रमुख भी हैं, कालेज में विद्यार्थी परिषद के लंपटों की गुण्डागर्दी पर कार्यवाही के चलते डी यू छात्र संघ की संयुक्त सचिव की लम्पट हिंसा का शिकार हुए। गौरतलब है कि अंबेडकर कालेज में एन एस यू आई के नवनिर्वाचित कालेज काउंसिल के अध्यक्ष के साथ भी स्थानीय विद्यार्थी परिषद के लंपट मारपीट से गुरेज नहीं कर रहे थे। और शिकायत पर प्रोफेसर सुजीत कुमार ने कालेज अध्यक्ष को इस मारपीट से बचाया था। 
    
विद्यार्थी परिषद की इस लंपटता के जे एन यू, हैदराबाद वि.वि. से लेकर अनगिनत कालेजों के छात्र-शिक्षक-कर्मचारी आये दिन शिकार होते रहे हैं। हर ऐसे हमले के वक्त सत्ताधारी भाजपा सरकार इन लंपटों की रक्षा में सामने आती रही है। इस बार भी कालेज प्रशासन व वि.वि. प्रशासन सभी इन लंपटों पर किसी कार्यवाही से आनाकानी करने में जुटे हैं। वि.वि. प्रशासन का यह रुख संघी लंपटों के हौंसले और बढ़ा रहा है। 
    
कैम्पसों पर संघी संगठन की लंपटता और सड़कों पर बजरंग दल सरीखे संघी संगठनों की बढ़ती लम्पटता दिखाती है कि आज संघी ताकतों को आगे बढ़ाने का सर्वप्रमुख हथियार ये लंपट संगठन बन चुके हैं। ये फासीवादी दस्ते आज संघ-भाजपा की मुख्य जरूरत बन चुके हैं। इसीलिए संघ के सभी अनुषांगिक संगठनों में हिंसक लम्पटों की संख्या बढ़ रही है या बढ़ायी जा रही है तो कुछ संगठनों का तो लंपटता ही मुख्य काम तय कर दिया गया है। वर्षों से दशहरे पर हथियार पूजने, शाखाओं में लाठी भांजने वाले संघ को पता था कि एक दिन इस सबकी जरूरत पड़ेगी। और इन्हें लगता है कि अब इसकी जरूरत आ पड़ी है। 
    
आखिर संघी फासीवादियों के लिए ये लंपट दस्ते आज इतने जरूरी क्यों होते जा रहे हैं? दरअसल वैसे तो लंपटता संघ की हर दंगा वाहिनी का अनिवार्य हिस्सा रहा है। राम का नारा लगाते हुए किसी की लिंचिंग करना, किसी को बलात्कार की धमकी देना, किसी मस्जिद के आगे मां-बहन की गालियां देना, आदि कामों के लिए एक अक्ल से पैदल, हिन्दू राष्ट्र की भावना से ओत प्रोत हिंसक-लंपट दस्ते की जरूरत होती है। ऐसा दस्ता जिसके सदस्य किसी तर्क को सुनने के बजाय अपने दिमाग में ठूंसे मिथकों के शिकार होते हैं जो एक ही सांस में राष्ट्र सेवा, धर्मरक्षा, गौरक्षा के लिए किसी की जान लेने को भी उतारू हो जाते हैं। ऐसे दस्ते आज इसलिए भी जरूरी हो गये हैं कि इन दस्तों के कारनामे ही एक हद तक साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के शिकार हो चुके समाज को लगातार इस ध्रुवीकरण में बनाये रखते हैं। ये दस्ते जब शासन सत्ता                                        का, पुलिस- प्रशासन का सहयोग-समर्थन पा जाते हैं तो हर विरोधी-विपक्षी पर आतंक कायम करने का जरिया बन जाते हैं। ये विरोध की हर आवाज को डर के साये में धकेलते हैं। इस तरह समाज में उस भय-आतंक को कायम करने का जरिया बन जाते हैं जिस भय-आतंक की हिन्दू फासीवादी हिन्दू राष्ट्र के लिए बहुत जरूरत है। 
    
ये दस्ते मुसलमानों को आतंकित करने के लिए तो जरूरी हैं ही साथ ही साथ दलितों-आदिवासियों- महिलाओं-ट्रेड यूनियन नेताओं-कम्युनिस्टों-छात्रों- शिक्षकों सबको आतंकित करने के लिए जरूरी हैं। आतंक का यह माहौल इन्हें इनकी ताकत से कई गुना बढ़ा-चढ़ाकर अजेय के बतौर पेश कर देता है। इस आतंक के माहौल के चलते कोई भी सामान्य व्यक्ति इनसे बैर मोल लेने की हिम्मत नहीं करता। इस आतंक का कमाल ही होता है कि विपक्षी दल-विरोधी भी इनके कारनामों का खुलकर मुकाबला करने की हिम्मत नहीं कर पाते। सामान्य इंसान की तो बात ही क्या की जाये। 
    
पिछले कुछ वर्षों में केन्द्रीय विश्वविद्यालयों ने इनकी लंपटता का मुंहतोड़ जवाब दिया है। इसीलिए ये वि.वि. इनके खास तौर पर निशाने पर हैं। ये मानते हैं कि तर्क के इन केन्द्रों को अगर ये खामोश कर देंगे तो पूरे समाज में ही अपने विरोध को खामोश कर अपना आतंक कायम करने में कामयाब हो जायेंगे। इनकी सोच में एक हद तक सच्चाई का कुछ अंश भी है। 
    
इनके कर्मों से आज जय श्री राम का नारा किसी भगवान की पूजा का नहीं लंपटता व आतंक का नारा बनता जा रहा है। इस नारे पर हिन्दू पॉप पर नाचते लंपट किसी मुसलमान की लिंचिंग कर सकते हैं, किसी मस्जिद के आगे गालियां बक सकते हैं, किसी लड़की से सामूहिक बलात्कार कर सकते हैं, किसी शिक्षक-छात्र की सरेआम पिटाई कर सकते हैं।
    
पर जब शासक डर-भय-आतंक से जनता को नियंत्रित-खामोश करने में जुट जायें तो ऐसे शासकों की यह बहादुरी नहीं जनता से भय का परिणाम होता है। ये भय इस हकीकत से उपजता है कि जनता दिल से नहीं भय से उनके साथ है। और एक दिन इस भय को एकजुट जनता भूल जायेगी और इन लंपट शासकों का वही अंजाम करेगी जो हिटलर-मुसोलिनी का किया गया था। कहने की बात नहीं कि भारत के फासीवादियों की बढ़ती लंपटता-गुण्डागर्दी-भय-आतंक का माहौल जनमानस में इनके प्रति नफरत बढ़ा रहा है। ऐसे में ये नफरत सड़कों पर उतारने के लिए जरूरी है कि इनकी हर लम्पटता, हर हिंसा का बहादुरी से मुकाबला किया जाये। इनके आतंक के साये में समाज को जाने से बचाने के लिए इनकी हर करतूत-काले कारनामे को तर्क-विज्ञान के सहारे उजागर किया जाये। इनके खिलाफ वैचारिक संघर्ष छेड़ने में कालेज परिसर पहले भी अग्रणी बने थे और आगे भी बनेंगे। 

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