इण्डोनेशिया में आर्थिक तंगी के चलते जनता में उबाल

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इण्डोनेशिया में मौजूदा विरोध प्रदर्शनों ने 14-15 वर्ष पूर्व अरब बसंत के ट्यूनेशिया की यादें ताजा कर दीं। ट्यूनेशिया में तब एक पुलिस कांस्टेबल के फल विक्रेता को थप्पड़ व बाद में उसके आत्महत्या करने ने पूरे देश में जो उबाल पैदा किया था उसमें तत्कालीन राष्ट्रपति को गद्दी छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। इण्डोनेशिया में राष्ट्रीय पुलिस की कार द्वारा बाइक पर सवार युवक कुर्नियावान को कुचल कर मार डालना देशव्यापी प्रदर्शनों की शुरूआत का ट्रिगर प्वाइंट बन गया। इण्डोनेशिया की सरकार इन प्रदर्शनों को थामने के लिए पूरा जोर लगा रही है पर प्रदर्शन दिनों दिन बढ़ते जा रहे हैं। 
    
21 वर्षीय कुर्नियावान नामक युवक इण्डोनेशिया की राजधानी जकार्ता में राइड शेयरिंग सेवा व भोजन वितरण सेवा में अपनी बाइक के जरिये काम करता था। 28 अगस्त को भी वह भोजन वितरण सेवा का आर्डर पूरा करने के लिए संसद के पास से गुजर रहा था। वहीं पर संसद के बाहर लोगों की भीड़ सांसदों के ऊंचे वेतन, कम कर व बेहद ज्यादा भत्ता के खिलाफ प्रदर्शन कर रही थी। प्रदर्शनकारी अपने लिए वेतन बढ़ोत्तरी व करों में कटौती की मांग कर रहे थे। वे वेतन में 10.5 प्रतिशत वेतन वृद्धि व छंटनी पर रोक की मांग कर रहे थे। कुर्नियावान इस भीड़ से अपना रास्ता बना कर गुजर ही रहा था कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए राष्ट्रीय पुलिस की मोबाइल ब्रिगेड इकाई की एक बख्तरबंद कार अचानक प्रदर्शनकारियों की भीड़ में तेजी से घुसी और कुर्नियावान को उसने टक्कर मार दी। कुर्नियावान गिर पड़ा पर कार इतने पर भी रुकने के बजाय उसे कुचलते हुए आगे बढ़ गयी। कुर्नियावान की कुछ ही देर में मौत हो गयी। 
    
कुर्नियावान की पुलिस द्वारा यह हत्या समूचे इण्डोनेशिया में लोगों के सड़कों पर उतरने का कारण बन गयी। जगह-जगह कुर्नियावान को श्रद्धांजलि के कार्यक्रम आयोजित होने लगे। जकार्ता का एक प्रमुख यातायात चौराहा लोगां की भीड़ से भर गया। 
    
इस बीच राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियान्टो ने शांति की अपील की। उन्होंने कुर्नियावान की मौत पर शोक व्यक्त करने के साथ गहन जांच करने व अधिकारियों पर कार्यवाही की बात की। पर उनकी इन बातों का आक्रोशित युवाओं व आम जनों पर कोई फर्क नहीं पड़ा। 29 अगस्त को प्रदर्शन हिंसा-तोड़ फोड़ व आगजनी में बदल गये। 
    
29 अगस्त को प्रदर्शनकारियों ने पुलिस मोबाइल ब्रिगेड के मुख्यालय तक मार्च निकाला और परिसर में घुसने की कोशिश की। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को पीछे धकेलने के लिए पानी की बौछारें और आंसू गैस के गोले दागे, जबकि प्रदर्शनकारियों ने उन पर बोतलें-पत्थर फेंके। 
    
इसी दौरान मध्य जकार्ता में पुलिस परिसर के पास एक पांच मंजिला इमारत में आग लग गयी जिसमें कई लोग अंदर फंस गये। इस आग में फंसे लोगों को बचाने के काम में छात्रों ने प्रदर्शन रोक सैनिकों व स्थानीय निवासियों की मदद की। वहीं अन्य प्रदर्शनकारी इस दौरान यातायात संकेतों व सरकारी सम्पत्ति में तोड़-फोड़ करते रहे। यातायात ठप कर दिया गया। 
    
प्रदर्शनों की यह लहर राजधानी जकार्ता से आगे बढ़कर अन्य शहरों में भी पुलिस से टकराव के रूप में फैल गयी। पूर्वी पापुआ क्षेत्र के सुरबाया, पोलो, योगकार्ता, मेदान, मकासर, मानदो, बाडुंग व मनोक्वारी में ये झड़पें देखी गयीं। 
    
दरअसल प्रदर्शनों की शुरूआत छोटे पैमाने पर सोमवार 26 अगस्त से हो चुकी थी जब युवाओं और नागरिकों को देश के सांसदों को मिलने वाले भारी वेतन-भत्तों का पता चला। रिपोर्टों से जनता को पता चला कि उनके 580 सांसदों को वेतन के अलावा भारी मासिक आवास भत्ता मिलता है। यह आवास भत्ता जकार्ता के न्यूनतम वेतन से 10 गुना अधिक है। 
    
अपने सांसदों के इस अय्याशी भरे भत्ते को देखकर इण्डोनेशिया के युवा और आम जन गुस्से से भर गये। एक ऐसे वक्त में जब सामान्य जनता जीवन यापन की बढ़ती लागत, भारी कर व बड़े पैमाने पर बेकारी से जूझ रही हो, सांसदों की इतनी कमाई ने लोगों के सब्र का बांध तोड़ दिया। अपने बदहाल होते जीवन की हताशा उन्हें सड़कों पर उतरने की ओर ढकेलने लगी। 
    
दरअसल इण्डोनेशिया की जनता व युवाओं के ये हालात पिछले कुछ दशकों से लागू उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों का परिणाम हैं। इन नीतियों ने एक ओर जीवनयापन के खर्चों में भारी बढ़ोत्तरी की है वहीं कल्याणकारी सरकारी खर्च को कमजोर किया है। वहीं बढ़ती बेकारी ने लोगों के जीवन को और बदहाल बनाया है। 
    
फिर भी इन प्रदर्शनों के प्रति राज्य का असंवेदनशील रुख और कुर्नियावान की हत्या वह बिन्दु बन गया जिसने युवाओं को एक झटके से बड़ी तादाद में सड़कों पर उतार दिया। इण्डोनेशिया तेजी से श्रीलंका व बांग्लादेश सरीखे उभार की ओर बढ़ता दिख रहा है। पुलिस व सरकार द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग व दमन युवाओं के गुस्से को बढ़ा रहा है। इण्डोनेशिया में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ आग्नेयअस्त्रों के प्रयोग, मनमानी गिरफ्तारी, हिरासत, यातना व न्यायेत्तर हत्याओं की खबरें आती रही हैं। ऐसे में सरकार व प्रशासन ने अगर अपना दमन का रुख नहीं बदला तो शीघ्र ही युवाओं का आक्रोश थामना सरकार के बूते से बाहर हो जायेगा। 
    
इण्डोनेशिया के युवाओं का यह आक्रोश अभी वर्गीय चेतना से लैस नहीं है। उनके निशाने पर पूंजीवादी व्यवस्था नहीं है। क्रांतिकारी चेतना से लैस हुए बगैर संघर्ष किसी वास्तविक बदलाव की ओर नहीं बढ़ सकता। फिर भी अन्याय और दमन के खिलाफ इण्डोनेशिया की जनता का संघर्ष स्वागत योग्य है। 

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