कोविन पोर्टल का डाटा चोरी

कोरोना महामारी के वक्त लोगों को टीका लगाने के लिए सरकार ने कोविन, आरोग्य सेतु सरीखे पोर्टल तैयार किये थे। इनमें टीका लगवाने वाले 110 करोड़ लोगों के नाम, मोबाइल नम्बर, आधार कार्ड नम्बर, वोटर आई डी, टीका लगवाने का सेंटर, टीके की तारीख आदि डाटा जुटाया गया था। बगैर इन जानकारियां को दिये लोगों को टीका लगवाने की अनुमति नहीं थी। उस वक्त भी इन पोर्टलों द्वारा जुटाई जा रही इतनी ज्यादा जानकारियों पर कई लोगों ने सवाल उठाये थे पर सरकार ने इन पर विचार से इंकार कर दिया था। अब खबर आयी है कि टेलीग्राम पर उक्त पोर्टलों का डाटा चोरी करके लीक कर दिया गया है। 
    

हालांकि सरकार दावा कर रही है कि उक्त पोर्टलों का डाटा पूरी तरह सुरक्षित है व टेलीग्राम पोर्टल पर जारी हुआ डाटा उक्त पोर्टलों से शुरूआती समय में चुराया गया था। इस तरह सरकार खुद ही यह भी बता रही है कि उक्त पोर्टलों से पहले भी डाटा चोरी होता रहा है। इस पर सरकार की तरफ से कोई कार्यवाही हुई या नहीं, सरकार के प्रतिनिधि इस पर चुप्पी साध गये। 
    

कोविन पोर्टल शुरू होते वक्त ही कुछ लोगों ने इतना ज्यादा डाटा एक जगह इकट्ठा करने को बेवकूफी भरा कदम बताया था। दुनिया में कहीं भी टीकाकरण के नाम पर इतना डाटा नहीं जुटाया गया। अब चोरी हुआ डाटा, जो आज की दुनिया में खुद एक माल बन चुका है भारी मुनाफा कमाने से लेकर तरह-तरह की धोखाधड़ी में इस्तेमाल हो सकता है। 
    

मसलन वित्तीय धोखाधड़ी, बैंक से पैसा निकालने सरीखे मामलों में इस डाटा की मदद से काफी वृद्धि हो सकती है। अब व्यक्ति के पास आने वाले फोन पर आधार कार्ड, पता, वोटर आई डी आदि विवरण फोन करने वाला खुद देकर आसानी से व्यक्ति का यह विश्वास जीत सकता है कि वह, बैंक या वित्तीय संस्था से बोल रहा है और व्यक्ति आसानी से उसे अपना ओटीपी, पासवर्ड देकर धोखा खा सकता है। इसी तरह आधार, वोटर आई डी के जरिये किसी भी व्यक्ति के नाम का बैंक खाता खोला जा सकता है, उसके नाम पर नया सिम कार्ड लिया जा सकता है। इस तरह तरह-तरह की धोखाधड़़ी उक्त डाटा की मदद से की जा सकती है। 
    

उक्त डाटा चोरी दिखलाती है कि कैसे आने वाले वक्त में डाटा तरह-तरह के अपराधों में मददगार बनेगा। कि कैसे सरकार के पास भी मौजूद नागरिकों का इतना व्यापक डाटा होना न केवल कभी भी चोरी हो सकता है बल्कि गलत इस्तेमाल भी हो सकता है। पर फासीवादी मोदी सरकार को इस सबकी चिंता इसीलिए नहीं है क्योंकि सरकार खुद इतने व्यापक पैमाने पर डाटा इकट्ठा कर नागरिकों की निगरानी का इरादा रखती है। वह नागरिकों की निगरानी इसलिए करना चाहती है ताकि अपने एक-एक विरोधी की पहचान कर सके व इनसे निपट सके। फासीवाद की ओर बढ़ती हुकूमत से इससे अलग उम्मीद भी नहीं की जा सकती है। 

आलेख

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

/titali-effect-kuch-itihaas-se-kucha-vartaman-mein

तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?