अभी ज्यादा कुछ दिन नहीं हुए थे कि भाजपा ने पांच में से तीन राज्यों खासकर प.बंगाल में बम्पर जीत हासिल की थी। अब इस बात को छोड़ दिया जाए कि भाजपा ने जीत कैसे हासिल की। भाजपा का हौंसला आसमान छू रहा था और वह एक के बाद एक पार्टी में फूट कराके संसद में तीन-चैथाई बहुमत की जुगत भिड़ा रही या साजिश रच रही थी। फिर जो हुआ वह सबके सामने है। छात्र-युवा उभार ने न केवल एक मंत्री का इस्तीफा बल्कि मोदी सरकार का इकबाल भी छीन लिया।
छात्र-युवा उभार ने जितना हतप्रभ मोदी एण्ड कम्पनी को किया उतना ही हतप्रभ भारत के बड़े-बड़े राजनैतिक विश्लेषकों को भी किया। इसमें शेखर गुप्ता, तवलीन सिंह, वीर सांघवी जैसे कई नामी-गिरामी शामिल हैं। ‘हवा बदल रही है’ का शोर मचने लगा है। राहुल गांधी का ग्राफ ऊपर चढ़ने लगा तो मोदी की नाकामियों का हिसाब लगाया जाने लगा है। और इस गणित में सारे गुणा-भाग का आधार मौजूदा छात्र-युवा उभार है। और इस उभार ने सोशल मीडिया में जो रील, मीम्स का बवंडर खड़ा किया है उसे इसके प्रमाण के तौर पर पेश किया जा रहा है। विपक्षी पार्टियों के हौंसले बुलंद हैं और तीन सप्ताह से संसद ठप्प है और ऐसे में जब बिहार और मध्य प्रदेश में भाजपा अपनी सारी मशीनरी के बाद भी चुनाव हार गयी तो इसे बदलती हवा का एक और प्रमाण बताया गया।
बदलती हवा की कहानी ऐसी है कि मोहन भागवत को खुद कमान संभालनी पड़ी है। ‘जेन-जी’, ‘जेन-अल्फा’ शुद्ध गैर हिन्दू-भारतीय संस्कृति वाले लफ्जों का पीछा करना पड़ा है। अब क्या तो मोदी और क्या तो भागवत ‘जेन-जी’ शब्दावली के ग्राहक और प्रवक्ता बनने की हास्यास्पद कोशिशें कर रहे हैं। समय बीत रहा है और हवा कहीं आंधी न बन जाये इसका डर सता रहा है। राजनैतिक विश्लेषकों ने जो कि अपने को महज मौसम वैज्ञानिक समझते हैं, घोषणा कर दी है कि हवा बदल रही है और बदली हवा के अनुरूप उन्होंने अपने को अभी से ढालना शुरू कर दिया है। नये मौसम के अनुरूप वे अपने वस्त्र, अपनी चाल-ढाल सब तय कर रहे हैं।