मध्य प्रदेश के हरदा में पटाखा फैक्टरी में विस्फोट

6 फरवरी को सुबह मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से 150 किलोमीटर दूर हरदा जिले के बैरागढ़ गांव में पटाखा बनाने वाली फैक्टरी में विस्फोट होने से 13 लोगों की मौत हो गयी (हालांकि स्थानीय निवासियों द्वारा मरने वाले लोगों की संख्या बहुत ज्यादा बताई जा रही है। इस विस्फोट में बच्चों के भी मारे जाने की पूरी संभावना है क्योंकि पटाखा उद्योग में बच्चे भी काम करते हैं)। फैक्टरी के मालिक सोमेश अग्रवाल और राजेश अग्रवाल को उस समय गिरफ्तार कर लिया गया जब वे मध्य प्रदेश छोड़कर दूसरे राज्य में भागने की कोशिश कर रहे थे।
    
हरदा स्थित इस फैक्टरी का लाइसेंस कुछ समय पहले निलंबित कर दिया गया था। तब राजेश अग्रवाल ने अपने भाई सोमेश अग्रवाल के नाम से लाइसेंस लिया था। लाइसेंस निलंबन के समय में भी इस फैक्टरी में काम कभी बंद नहीं हुआ। इस फैक्टरी में 2015 में हुए विस्फोट में 2 लोग मारे गये थे। मालिक राजेश अग्रवाल को इस मामले में 2021 में 10 साल की सजा भी हुई है। फिलहाल वो जमानत पर बाहर है। 2017 और 2022 में भी यहां विस्फोट होने से कई लोग मारे गये थे।
    
अपनी फैक्टरी लगाने से पहले राजेश अग्रवाल की पटाखों की एक दुकान हुआ करती थी। बाद में उसने फैक्टरी खोली अभी फिलहाल उसकी पांच फैक्टरियां हैं। उसके पास 15 किलो से लेकर 300 किलोग्राम तक के 12 अलग-अलग लाइसेंस थे पर वहां ट्रक भर-भर कर बारूद आता था। और जिस समय यह विस्फोट हुआ उस समय भारी मात्रा में बारूद तहखानों में जमा था। लेकिन सुरक्षा के नाम पर यहां कुछ भी इंतजाम नहीं थे। 
    
फैक्टरी के आस-पास रहने वालों के मकान भी इस विस्फोट के कारण भीषण रूप से प्रभावित हुए हैं। विस्फोट का प्रभाव 1 किलोमीटर तक के दायरे में है। विस्फोट के समय जो लोग रास्ते से गुजर रहे थे उनमें से भी कई लोग मारे गये हैं और घायल हुए हैं। ऐसे बच्चे हैं जिनके मां-बाप इस दुर्घटना में मारे गये हैं। स्थानीय निवासियों में फैक्टरी मालिक राजेश उर्फ़ राजू के प्रति बहुत गुस्सा है। वे बताते हैं कि किस तरह राजू स्थानीय शासन-प्रशासन को अपनी जेब में रखता था। मलबे में फैक्टरी मालिक का राशन कार्ड भी मिला है जिसमें राजेश अग्रवाल की आय महज़ 60 हज़ार रुपये दिखाई गयी है। 
    
इस घटना के बाद शासन-प्रशासन हरकत में आया और कई फैक्टरियों को उसने सील कर दिया। लेकिन कब तक। कुछ दिनों बाद ये घटना भी भुला दी जाएगी। और फिर किसी और जगह मौत की बारूद मजदूरों के लिए बिछा दी जाएगी। यह अकेली ऐसी घटना नहीं है जो रिहायश के इलाके में बनी फैक्टरी में हुई है।
    
आज जब देश का पूंजीपति वर्ग पूरे देश के स्तर पर मौजूद श्रम कानूनों को खत्म कर मज़दूरों के श्रम की बेतहाशा लूट की छूट चाहता है तब उसका एक परिणाम हमें आये दिन औद्योगिक दुर्घटनाओं के रूप में सामने दिख रहा है। कभी हमें ये फैक्टरियों में होने वाली ठंडी मौतों के रूप में दिखायी देती हैं तो कभी अचानक होने वाले विस्फोट लगातार मजदूरों की सुरक्षा के प्रति मालिकों द्वारा बरती गयी लापरवाही को दिखा देते हैं। कभी हमें ये दुर्घटनाएं देश के मारुती जैसे बड़े संस्थानों में दिखाई पड़ती है तो कभी गांव-देहात के स्तर पर मौजूद अदने से पूंजीपति वर्ग की फैक्टरी में। कभी हम देखते हैं कि केंद्र व राज्य सरकारें इन्हें प्रोत्साहन दे रही होती हैं तो कभी स्थानीय स्तर पर मौजूद शासन-प्रशासन। 
    
ऐसी घटनाओं पर सिर्फ और सिर्फ मज़दूर वर्ग ही अपनी संगठित एकता के दम पर लगाम लगा सकता है।
 

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