न दिन में चैन, न रात को आराम

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‘वर्कफ्रोम होम’ (घर से काम) को कुछ वर्ष पहले बड़े मजे की चीज समझा जाता था। अब हालात ऐसे हो गये हैं कि लोग इससे निजात चाहते हैं। पहले सोचा था कि क्या मजे की बात है कि अपने घर में रहो; घर में रह कर काम करो; न आने-जाने का झंझट; न अपनों से-अपने परिवार से दूर रहना। एक साथ दोनों काम; दोनों हाथों में लड्डू। अब समझ में आने लगा है कि असल में अब कोई ऐसा वक्त नहीं है जब आप काम से ‘फ्री’ हों। और अपने मन से अपना जीवन जी सकें। काम हर समय आपके कंधों पर सवार रहता है। कभी भी ‘बॉस’ मीटिंग बुला लेता है और आप हर वक्त मजबूर हैं काम करने को। दोनों हाथों में भले ही लड्डू हों पर आप उन्हें खा नहीं सकते।
    
आज से डेढ़ शताब्दी से अधिक समय पहले दुनिया में ‘आठ घण्टे काम; आठ घंटे आराम; आठ घंटे मनोरंजन’ का नारा गूंजा था। धीरे-धीरे यह बात दुनिया में स्थापित हो गयी थी। पर फिर दुनिया का चक्का घूम गया। काम के घंटे बढ़ते गये, आराम हराम हो गया, मनोरंजन की सोचना भी ऐय्याशी हो गया। हमारे देश में असंगठित व अनौपचारिक क्षेत्र में हालात कभी खास नहीं बदले थे पर अब तो संगठित व औपचारिक क्षेत्र में मजदूरों-कर्मचारियों-तकनीशियनों-बुद्धिजीवियों यानी ‘ब्लू’ व ‘व्हाइट कालर’ जॉब वाले एक जैसे हो गये। फैक्टरी में काम करने वाले मजदूरों के काम के घंटे बारह से सोलह तो ‘वर्क फ्राम होम’ करने वाले ‘व्हाइट कालर’ वालों के काम के घंटे भी कुछ-कुछ इतने ही हो गये। दोनों में बहुत फर्क था पर अब काम के घण्टों में फर्क नहीं रहा। 
    
‘वर्क फ्राम होम’ ने ‘कोविड-19’ महामारी के बाद महामारी का रूप धारण किया। उसके पहले यह थोड़ा-बहुत ही था। वह भी इसलिए संभव हो पाया था कि इक्कीसवीं सदी में इण्टरनेट, लैपटाप, वीपीएन, ई-मेल, आदि के जरिये ‘वर्क फ्राम होम’ की एक संभावना पैदा हो गयी थी। बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में जो कुछ कारपोरेट क्षेत्र के प्रबंधन के स्तर पर था वह ‘कोविड-19’ के बाद सेवा क्षेत्र में आम कार्य संस्कृति का हिस्सा बन गया। अब तो हालात यह हैं कि सरकारी क्षेत्र में भी कर्मचारी-अफसर ‘वर्क फ्राम होम’ की जद में आ गये हैं। सरकारी कर्मचारियों खासकर ‘स्कीम वर्करों’ व अस्थायी कर्मचारियों को घर में भी काम करते हुए देखा जा सकता है। काम के घण्टों ने आराम व मनोरंजन के घण्टों को निगल लिया। निजी जीवन, निजी पल, निजता यानी जिसका पूंजीवाद बहुत गुणगान करता है पर वह मजदूरों-कर्मचारियों के लिए वस्तुतः कुछ न तो इनको मानता है और न कुछ शेष रहने देता है। नई श्रम संहिताओं में महिला मजदूरों के लिए रात्रि पाली का महान दरवाजा खोलकर उसने उन्हें निजी जीवन से मुक्त करने का रास्ता खोल दिया। पहले तो एक की कमाई से परिवार चलना मुश्किल किया और फिर परिवार का चलना ही मुश्किल कर दिया।
    
आज ‘वर्क फ्राम होम’ की कार्य संस्कृति के खिलाफ पूरी दुनिया में एक आवाज उठ रही है। कई देशों में ‘राइट टू डिसकनेक्ट’ (Right To Disconnect) की बात उठ रही है और कई देशों में इस सिलसिले में कानून भी बनने लगे हैं। फ्रांस, बेल्जियम, इटली, ग्रीस, पुर्तगाल, स्पेन, आस्ट्रेलिया आदि देशों में ‘राइट टू डिसकनेक्ट’ (कार्य के घण्टों के बाद अलग होने का अधिकार) दे दिया गया। शुरूवात फ्रांस से शुरू हुयी। वहां ‘राइट टू डिसकनेक्ट’ का अधिकार 2017 से है। ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ (10 दिस.) के अनुसार सबसे सख्त कानून पुर्तगाल में है। यहां कर्मचारियों से बिना इमरजेंसी के सम्पर्क करना गैर कानूनी है। यहां कर्मचारियों को रोजाना 11 घण्टे का लगातार आराम सुनिश्चित किया गया है। 
    
‘राइट टू डिसकनेक्ट’ के अधिकार की लड़ाई दुनिया में फिलवक्त जारी है। भारत में अभी यह आम मांग नहीं है। मजदूर-कर्मचारी संगठनों में इस मांग के प्रति जागरूकता का अभाव है। वैसे भारत की संसद में ‘राइट टू डिसकनेक्ट’ नाम से एक निजी बिल (प्राइवेट बिल) 5 दिसम्बर को एनसीपी की सांसद सुप्रिया सुले ने पेश किया है। इसका मोदी राज में क्या भविष्य होगा इसकी कल्पना करना मुश्किल नहीं है। और फिर कोई अच्छा कानून बन जाने मात्र से कुछ नहीं होता। जमीनी लड़ाई ही तय करती है कि वह कानून लागू होगा कि नहीं। महिलाओं के लिए कई दशक पूर्व बना समान काम का समान वेतन’ कानून इस बात का गवाह है। इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में भी समान काम का समान वेतन नहीं मिलता। और यह बात न केवल महिलाओं के लिए बल्कि काम करने वाले स्थायी, अस्थायी, कैजुअल, ठेके, स्कीम वर्करों पर भी लागू होती हैं। यह पूंजीवाद का आम चरित्र है कि उसमें आम मजदूर-मेहनतकशों के लिए बने कानून व्यवहार में लागू नहीं होते। व्यवहार में लागू करवाने के लिए कदम-कदम पर संघर्ष करना जरूरी होता है। 
    
फ्रांस, बेल्जियम, स्पेन, पुर्तगाल जैसे देशों में ‘राइट टू डिसकनेक्ट’ का अधिकार यूं ही नहीं मिला है और जाहिर सी बात है भारत में भी यूं ही नहीं मिलेगा। 

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