न्यूजीलैण्ड में महा हड़ताल

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23 अक्टूबर को न्यूजीलैण्ड में एक महाहड़ताल का आयोजन किया गया। इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के लगभग 1,10,000 लोग शामिल हुए। हड़ताली लोगों में 60 हजार शिक्षक, 30 हजार नर्सें, 5 हजार डॉक्टर व 20 हजार अन्य स्वास्थ्यकर्मी शामिल थे। हड़ताल में देश की कुल कामगार आबादी के लगभग 3.5 प्रतिशत ने भागीदारी की। यह 1979 के बाद देश की सबसे बड़ी हड़ताल बन गयी। 
    
यह हड़ताल दक्षिणपंथी सरकार द्वारा सार्वजनिक सेवाओं में की जा रही क्रूर कटौती, सैन्य खर्च दोगुना करने तथा अति धनवानों की पक्षधर नीतियों के विरोध में आहूत की गयी थी। 
    
बढ़ती महंगाई के बीच सरकार सार्वजनिक क्षेत्र में नाम मात्र की वेतन वृद्धि को तैयार नहीं हैं जो वास्तव में महंगाई के मद्देनजर एक तरह से वेतन कटौती है। सरकार सभी को 1-2 प्रतिशत वेतन वृद्धि का झुनझुना थमा रही है। शिक्षकों, स्वास्थ्य सेवा कर्मचारियों सभी ने लगभग 4.6 प्रतिशत खाद्य कीमत वृद्धि के मद्देनजर इसे ठुकरा दिया है। 
    
आकलैण्ड में इस दौरान 20 हजार लोगों ने आओटिया स्क्वायर पर रैली निकाल क्वीन स्ट्रीट तक मार्च किया। लोग अस्पतालों-स्कूलों में बढ़़ रही अव्यवस्था, बढ़ते बेघरों की संख्या, महंगे भोजन व अन्य जरूरी वस्तुओं से आक्रोशित थे। हैमिल्टन शहर में दस हजार लोगों ने प्रदर्शन किया। वांगारेई, टोरंगा, नेपियर, रोटोरूआ, गिस्बोर्न, न्यू प्लायमाउथ, काइतिया आदि शहरों में भी हजारों लोगों ने प्रदर्शन किया। 
    
इस संयुक्त हड़ताल की तरफ यूनियनें कर्मचारियों के दबाव में अनिच्छा से बढ़ी थीं। सरकार ने स्वास्थ्यकर्मियों व शिक्षकों की हड़ताल को मरीजों व छात्रों को हुई असुविधा के मद्देनजर क्रूर करार दिया। इसी तरह हड़ताल में फिलिस्तीन के प्रति एकजुटता को भी सरकार ने आड़े हाथ लेने का काम किया। 
          
हड़ताल में सरकार के अमेरिका के साथ मिल चीन को घेरने के प्रयासों व इस पर 13 अरब डालर खर्च करने की निन्दा की गयी। गौरतलब है कि यह खर्च सेना पर बढ़ाया जा रहा है। विपक्षी लेबर पार्टी की यूनियनें भी इस मसले पर खामोश रहीं क्योंकि वे भी सैन्यवादी नीतियों के समर्थन में हैं। इसी तरह यूनियनें फिलिस्तीन के मसले पर भी चुप्पी साधे रही। 
    
कुल मिलाकर यह महा हड़ताल न्यूजीलैण्ड के कर्मचारियों के आक्रोश के साथ दुनिया भर में पश्चिमी साम्राज्यवाद की करतूतों के विरोध में उभार का एक हिस्सा थी। कर्मचारियों को अपने समझौतापरस्त नेतृत्व के चंगुल से बाहर आ स्वतंत्र तौर पर एकजुट होने की जरूरत है तभी वे कोई कारगर संघर्ष छेड़ सकते हैं।  

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