पाक नियंत्रित कश्मीर में खूनी चुनाव

Published
Sat, 08/01/2026 - 15:50
/pak-niyantrit-kashmir-mein-khooni-chunaav

कश्मीर के लोगों को लम्बे वक्त से फौजी बूटों के साये में जीना पड़ रहा है। बात चाहे भारत के नियंत्रण वाले कश्मीर की हो या पाक नियंत्रित कश्मीर की, हालात दोनों जगह एक से हैं। भारत सरकार ने धारा 370 को समाप्त कर कश्मीर को खुली जेल में बदल दिया है तो पाक सरकार प्रांतीय चुनाव के नाम पर अपने नियंत्रण वाले कश्मीर में खून की होली खेल रही है। 
    
27 जुलाई से पाक नियंत्रित कश्मीर मंे 3 चरण वाले प्रांतीय चुनाव शुरू हो गये हैं। 53 सदस्यीय विधानसभा में 45 सीटों पर प्रत्यक्ष मतदान होना है। 8 सीटें विभिन्न समूहों के लिए आरक्षित हैं। 12 विधानसभा सीटें पाकिस्तान स्थित शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं।
    
कश्मीर के इस चुनाव में कश्मीरी अवाम की भागीदारी न के बराबर है। संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी चुनाव के इस मौके पर मानवाधिकार हनन, राजनैतिक स्वतंत्रता व संवैधानिक सुधार के मसलों पर संघर्ष कर रही है। उसकी मांग 12 पाक शरणार्थियों की आरक्षित सीटें रद्द करने की व कश्मीर में सैन्य दमन बंद करने की है। उसके अनुसार इन आरक्षित सीटों के जरिये पाकिस्तान कश्मीर में अपनी पसंद की सरकार बना लेता रहा है। 
    
शुरूआत में पाक सरकार ने अवामी एक्शन कमेटी से वार्ता की पर वार्ता विफल होने पर उसे आतंकी संगठन की तरह प्रतिबंधित कर दिया। बाद में अवामी एक्शन कमेटी ने चुनाव बहिष्कार करते हुए संघर्ष तेज कर दिया। इस संघर्ष में व्यापक जनभागीदारी के चलते पाक सरकार किसी भी कीमत पर इसके दमन पर उतारू हो चुकी है। प्रदर्शनकारियों पर सेना सीधे गोलियां चला रही है। 2 माह में 90 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। सैकड़ों लोग जेलों में ठूंस दिये गये हैं। चुनाव के वक्त 2 गोलीकांडों में 32 लोग मारे गये। 
    
पाकिस्तानी रक्षा मंत्री प्रदर्शनकारियों को भारत सरीखा दुश्मन बना उन पर गोली चलाने का समर्थन कर रहे हैं। चुनाव में जगह-जगह से बूथ कैप्चरिंग व अन्य धांधली की खबरें आ रही हैं। इंटरनेट जगह-जगह प्रतिबंधित कर दिया गया है। चुनाव में कश्मीरी दलों के बहिष्कार के चलते जनभागीदारी बेहद कम हो गयी है। 
    
जहां अंतर्राष्ट्रीय संस्थायें इस खूनी चुनाव पर चिंता जता रही हैं। वहीं भारत सरकार इस हिंसा पर बयान दे रही है कि यह हिंसा कश्मीर पर पाक के जबरन कब्जे का सबूत है। यह बयान देते हुए भारत सरकार अपने नियंत्रण वाले कश्मीर के हालात व वहां सैन्य हिंसा की खबरें भूल जा रही है।
    
हकीकत यही है कि भारत व पाक दोनों के शासकों ने धरती के स्वर्ग कश्मीर को वहां के नागरिकों के लिए नरक बना दिया है। कश्मीरी अवाम के नित नये हत्याकांड रच ये शासक अपने-अपने देश में अंधराष्ट्रवाद की राजनीति फैलाते हैं। कश्मीरी अवाम इन दोनों देशों की रस्साकसी में दमन-उत्पीड़न का खौफ झेलते हुए अपनी मुक्ति के लिए संघर्षरत है। 

आलेख

/titali-effect-kuch-itihaas-se-kucha-vartaman-mein

तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?

/west-asia-ke-sankat-ka-vaishawik-prabhaav

अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं। 

/west-asia-mein-badalata-shakti-santulan-samajhautaa-gyapan-ke-baad-ki-sthiti

अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

/war-anay-sadhanon-se-politics-ka-hi-jaari-roop-hai

अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।