पूंजीवादी-सुधारवादी और क्रांतिकारी

Published
Sat, 08/01/2026 - 15:50
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जंतर मंतर पर छात्रों-युवाओं का संघर्ष सफलता के साथ समाप्त हो गया है। संघर्ष की 3 मांगों पर सहमति के बावजूद तीसरी मांग पर अभी भी रस्साकसी जारी है। काकरोच जनता पार्टी की 3 मांगें इस प्रकार थीं- 1. शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा 2. आत्महत्या करने वाले नौजवानों के परिजनों को मुआवजा 3. छात्रांे-युवाओं पर संघर्ष के दौरान दर्ज सभी मुकदमे वापसी। जहां पहली 2 मांगें सरकार ने तत्काल मान लीं। पर तीसरी पर सरकार-प्रशासन से लेकर न्यायालय अपने पैतरे दिखाने लगे।
    
इस तीसरी मांग का संदर्भ राजसत्ता के संघर्षों के प्रति रुख से है और इस मामले में संघर्ष में शामिल पूंजीवादी-सुधारवादी व क्रांतिकारी ताकतों की धारणाओं में फर्क है जो उनकी समझ से उपजता है।
    
काकरोच जनता पार्टी मूलतः एक ईमानदार पूंजीवादी पार्टी की तरह कुछ सुधारों के जरिये शिक्षा व्यवस्था व समाज व्यवस्था को दुरुस्त करने का स्वप्न परोसती है। वह तमाम उन मुद्दों पर जिनसे वामपंथ या दक्षिणपंथ की पहचान होती है, चालाकी से चुप्पी साध लेती है। वह यकीन करती है कि मोदी सरकार पर दबाव डालकर, ईमानदार लोगों को सत्ता में पहुंचा बेहतर शिक्षा व्यवस्था व समाज व्यवस्था कायम की जा सकती है। पूंजीपति वर्ग उसके लिए कहीं से समस्याओं की जड़ में नहीं है। खुद इसके कई कार्यकर्ता या तो किसी निजी कम्पनी के चाकर या एनजीओ से जुड़े रहे हैं। ऐसे में राजसत्ता के अंगों से ये जनता के संघर्षों के प्रति कानून सम्मत ईमानदारी भरे रुख का ख्वाब पालते हैं। इसीलिए संघर्ष के बाद जब पुलिस से लेकर संघी वाहिनी छात्रों-छात्राओं की कुंडली खंगाल हमलावर होते हैं तो ये सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगा फिर से संघर्ष की धमकी देते हैं। 
    
सुधारवादी ताकतों में कुछ खुद को कम्युनिस्ट कहते हुए समाजवाद से जोड़ती हैं। ये क्रांति का नारा लगाते हुए क्रांति छोड़ चुकी ताकतें हैं। ये चुनावी राजनीति के जरिये मजदूर-मेहनतकशों की सत्ता या समाजवाद कायम होने का भ्रम फैलाती हैं। इस मामले में ये काकरोच जनता पार्टी से कुछ  आगे बढ़कर राजसत्ता के रुख से एक हद तक परिचित हैं पर चूंकि इन्हें भी इसी पूंजीवादी राजसत्ता को दुरुस्त कर ‘समाजवादी’ बनाना है या अपने शासन वाली पूंजीवादी राजसत्ता को समाजवादी कह देना है अतः इनका रुख बाकी पूंजीवादी दलों के प्रति खास तौर पर मिलनसार है। इण्डिया गठबंधन के जरिये ये मोदी सरकार व फासीवाद को हराने का स्वप्न देखते हैं। ये संघर्ष करते हैं पर संघर्ष के फल को अपनी बढ़ती सीटों में देखना चाहते हैं। 
    
तीसरी क्रांतिकारी ताकतें हैं जो जानती हैं कि यद्यपि मोदी सरकार ने सारे मुकदमे वापसी का वायदा कर दिया हो पर वह पहला मौका मिलते ही पलटवार करेगी। वह संघर्ष से छात्रों-युवाओं के दिलों में कायम आशा के खत्म करने का प्रयास करेगी। राजसत्ता सीधे नहीं तो टेढ़े तरीके से जनता के संघर्षों के खिलाफ उन्हें कुचलने को उतरेगी। इसीलिए इस राजसत्ता से मुकाबल किये बगैर इंकलाब की राह पर आगे नहीं बढ़ा जा सकता। कि पूंजीपति वर्ग से सत्ता मजदूरों-मेहनतकशों के हाथों में चुनावों के जरिये नहीं क्रांति के जरिये ही आ सकती है। 
    
अभी हिन्दू फासीवादी ताकतों के खिलाफ ये तीनों ताकतें भले ही एक साथ आगे बढ़ रही हों पर इनके संघर्ष के आगे बढ़ने पर यह फर्क निर्णायक भूमिका निभायेगा। जेन जी को यह फर्क समझना होगा व भगत सिंह की क्रांतिकारी राह चुननी होगी।  

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