भटकती आहत भावनाएं
पिछले कुछ वर्षों से देश में अलग-अलग लोगों की भावनाएं समय-समय पर आहत होती रहती हैं। यह भावनाएं हैं कि किसी विशेष मामलों में आहत होती है। शायद यह भावनाएं किसी खास मौके पर आ
पिछले कुछ वर्षों से देश में अलग-अलग लोगों की भावनाएं समय-समय पर आहत होती रहती हैं। यह भावनाएं हैं कि किसी विशेष मामलों में आहत होती है। शायद यह भावनाएं किसी खास मौके पर आ
पिछले दिनों भारत के हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज सवालों के घेरे में आ रहे हैं। ये सवाल अलग-अलग कोणों से उठ रहे हैं। इनमें भ्रष्टाचार से लेकर संवैधानिक दायित्वों त
यह कितना अजीब लगता है कि बाइस-तेइस साल से राजसी ठाठ-बाट के साथ रहने वाला आदमी हर मौके-बेमौके सारी दुनिया को बताता है कि उसका बचपन कितनी गरीबी में बीता। ऐसा लगता है मानो व
भारत के गृहमंत्री अमित शाह ने लोकसभा में धमकी भरे अंदाज में फरमाया ‘भारत कोई धर्मशाला नहीं है कोई जब चाहे यहां आकर रह जाए’ं अमित शाह को शायद पता हो न हो कि भारत के अमीर भ
कश्मीर इस समय भयंकर नशे की चपेट में है। और यह नशा शराब या भांग का नहीं है बल्कि ज्यादा घातक नशीले पदार्थों का है। युवा आबादी इस नशे की चपेट में ज्यादा है।
17 मार्च को महाराष्ट्र के नागपुर में साम्प्रदायिक हिंसा भड़क उठी। हिंसा में पुलिसकर्मी और नागरिक घायल हुए। कई इलाकों में पथराव, आगजनी, तोड़फोड़ हुई। इसके बाद कई इलाकों में क
मनुस्मृति अपने जमाने में हिन्दू धर्म की कानूनी संहिता थी जिसमें चार वर्णों के लिए अपराध के लिए अलग-अलग दण्ड प्रावधान थे। जाहिर है यह वर्ण-जाति वर्चस्व का सबसे संगठित ग्रं
पिछले दिनों एक मजेदार वाकया घटा। हुआ यह कि तमिलनाडु का बजट पेश करते हुए वहां के मुख्यमंत्री स्तालिन ने रुपये के प्रतीक को बदलकर तमिल भाषा में लिख दिया। उनके इस काम से भार
हिंदू फासीवादियों ने तो जैसे कसम ही खा रखी है कि अब हर हिंदू त्यौहार को सांप्रदायिकता की आंच में सेंके बिना नहीं मनाएंगे। कि अब त्यौहार शांति, सद्भावना के प्रतीक न रहकर न
आजकल दक्षिण भारत के राज्यों में खासकर इन राज्यों में सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं में बहुत बेचैनी है। यह बेचैनी कभी परिसीमन, कभी नई शिक्षा नीति, कभी भाषा के सवाल पर फूट पड़ती
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।
भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और
उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।