साम्प्रदायिक प्रसाद

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पवन कल्याण आंध्र प्रदेश की चन्द्रबाबू नायडू सरकार में उपमुख्यमंत्री हैं। उनकी पार्टी का नाम है जन सेना। राजनीति में आने से पहले वे तेलगू सिनेमा की एक प्रमुख हस्ती थे। जैसा कि दक्षिण भारत में अक्सर होता रहा है, उन्होंने भी अपनी सिनेमाई लोकप्रियता को भुनाने के लिए राजनीति में कदम रखा और किसी हद तक सफल रहे। पर अब वे अपनी इस सफलता को नई उड़ान देना चाहते हैं और इसके लिए उन्होंने मोदी-योगी का रास्ता चुना है। 
    
पिछले दिनों मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू ने पिछले चुनावों में हार से पस्त जगन मोहन रेड्डी को एक और पटखनी देने के लिए तिरुपति बालाजी मंदिर में मिलने वाले प्रसाद के लड्डू में मिलावटी घी का मुद्दा उछाला। मिलावट भी गाय और सूअर की चर्बी की। यह एक सोची समझी चाल थी क्योंकि आरोप का कोई पुख्ता सबूत नहीं था। जिस जांच रिपोर्ट के आधार पर आरोप लगाया गया था वह पूर्णतया संदिग्ध थी। 
    
यदि जांच सही भी होती तो इसके लिए पूर्व मुख्यमंत्री को सीधे दोषी ठहराने का कोई औचित्य नहीं था। पर चन्द्रबाबू नायडू जानते थे कि जगनमोहन रेड्डी के ईसाई होने के चलते मामले को तुरंत साम्प्रदायिक रंग मिल जाना था। वही हुआ भी। संघी साम्प्रदायिकों ने मामले को कुछ इस रूप में पेश किया मानो इसाईयों और मुसलमानों ने मिलकर हिन्दुओं का धर्म भ्रष्ट करने के लिए तिरुपति बालाजी मंदिर में गाय और सूअर की चर्बी मिला हुआ घी भिजवा दिया हो। 
    
चन्द्रबाबू नायडू तो एक योजना के तहत आरोप उछाल चुप लगा गये। शायद उन्हें लगा हो कि मामले के तूल पकड़ने पर आंच उनके और भाजपा के ऊपर भी आयेगी क्योंकि मंदिर प्रबंधन में उन्हीं के लोग भरे हुए हैं और जगन मोहन रेड्डी तो लगातार केन्द्र में मोदी सरकार का साथ देते रहे थे।
    
पर पवन कल्याण को इस तरह का कोई डर नहीं है। वे आंध्र की राजनीति के नव धनाढ्य हैं और अतीत का उनका बोझ कम है। इसीलिए उन्हें लगता है कि इस मुद्दे को तूल देकर और हिन्दू साम्प्रदायिक भावनाओं को भड़काकर वे अपनी राजनीति चमका सकते हैं। इसलिए वे उपमुख्यमंत्री होते हुए भी लगातार साम्प्रदायिक बयानबाजी कर रहे हैं और प्रायश्चित स्वरूप दो सप्ताह का उपवास रख रहे हैं। वैसे यह मजेदार है कि पाप करने के आरोप जगनमोहन रेड्डी पर है और प्रायश्चित का उपवास पवन कल्याण रख रहे हैं।
    
पवन कल्याण आंध्र प्रदेश की कापू जाति से आते हैं जो पहले शूद्र होते हुए भी आज क्षत्रिय होने का दावा करती है तथा वहां अगड़ी जाति में गिनी जाती है। इसकी आंध्र की आबादी में हिस्सेदारी बीस प्रतिशत से ज्यादा है। अविभाजित आंध्र प्रदेश की राजनीति में पहले रेड्डियों का दबदबा था फिर तेलगू देशम के जमाने में कामा (नायडू) का। अब विभाजित आंध्र प्रदेश में पवन कल्याण अपनी जाति कापू के बल पर बड़ा नेता बनने का सपना देखते हैं। पर केवल अपनी जाति के संख्या बल से काम नहीं चलेगा। इसीलिए उन्होंने हिन्दू साम्प्रदायिकता को शह देने का आसान रास्ता चुना है। शायद उन्हें लगता हो कि मोदी-योगी की तरह हिन्दू साम्प्रदायिकता की नैय्या उनका भी बेड़ा पार लगा देगी। 
    
किसी जमाने में पवन कल्याण चे ग्वेरा को अपना नायक बताते थे और मोदी की साम्प्रदायिकता का विरोध करते थे। आज उनका हिन्दू साम्प्रदायिकता की शरण में जाना यह दिखाता है कि दक्षिण भारत के प्रदेशों में भी इस साम्प्रदायिकता के फलने-फूलने की जमीन उर्वर हो रही है। 
    
हो सकता है कि पवन कल्याण का हिन्दू साम्प्रदायिकता का यह चोला बहुत कारगर न हो। हो सकता है कि वे पलटी मारकर कोई और चोला धारण कर लें। पर उनका यह कदम ही दिखाता है कि दक्षिण भारत में भी हिन्दू साम्प्रदायिकता का जहर असर दिखाने लगा है। जो लोग ये सोचते थे कि दक्षिण भारत हिन्दू फासीवादियों के लिए अभेद्य बना रहेगा उनका भ्रम टूट जाना चाहिए। यहां मामला हिन्दू फासीवादी भाजपा से किसी क्षेत्रीय पार्टी के अवसरवादी गठजोड़ का नहीं बल्कि किसी क्षेत्रीय पार्टी द्वारा हिन्दू साम्प्रदायिकता को आगे बढ़कर गले लगाने का है। यह साम्प्रदायिक प्रसाद बहुत जहरीला और खतरनाक है। 

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